यदि शत्रु अकारण ही बहुत परेशान कर रहा हो तो हनुमानजी की शरण में जाकर, पूरे श्रद्धाभाव से शत्रुंज्य स्तोत्र के पाठ का विधान कहा गया है. इसे लांगूलास्त्र शत्रुंजय स्तोत्र भी कहा जाता है. इसे उग्र और शक्तिशाली स्तोत्र की श्रेणी में रखा जाता है. लांगूल का अर्थ है पूँछ. इस स्तोत्र के द्वारा हनुमानजी से याचना की जाती है कि वे अपनी पूँछ के प्रहार से शत्रुओं का नाश कर दें.
मंदिर या घर में आसन बिछाकर भी पाठ कर सकते हैं लेकिन पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर पाठ का विशेष विधान कहा गया है.
।। श्री हनुमद् शत्रुंजय स्तोत्रम् ।।
श्रीमन्तं हनुमन्तम् आर्तरिपुभिद्-भूभृत्-तट-भ्राजितं
च-अल्प-द्वालधि-बन्ध-वैरिनिचयं चामीकराद्रिप्रभम् ।।
अष्टौ रक्तपिशङ्ग नेत्रनलिनं भ्रूभङ्ग-भङ्ग-स्फुरत्
प्रोद्यत्-चण्ड-मयूख-मण्डल-मुखं दुःखापहं दुःखिनाम् ॥ ॥
कौपीनं कटिसूत्र-मौञ्ज्यजिन युग्देहं विदेहात्मजा-
प्राणाधीश पदारविन्द निरतं स्वान्तः कृतान्तं द्विषाम् ।
ध्यात्वा-एवम् समराङ्गण-स्थितम् अथानीय स्व-हृत्-पङ्कजे
सम्पूज्य-अखिलपूजनोक्तविधिना सम्प्रार्थयेत्-अर्चितम्॥
हनुमत्-अञ्जनासूनो महाबलपराक्रम ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥१॥
मर्कटाधिप मार्तण्ड मण्डल-ग्रासकारक ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥२॥
अक्षक्षपण पिङ्गाक्ष क्षितिजासु-क्षयंकर।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥३॥
रुद्रावतार संसार-दुःखभारापहारक ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥४॥
श्रीराम-चरणाम्भोज-मधुपायितमानस ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥५॥
वालि-कालरद-क्लान्त-सुग्रीव-उन्मोचन-प्रभो ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥६॥
सीताविरह-वारीश-भग्न-सीतेश-तारक ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥७॥
रक्षोराज प्रतापाग्नि-दह्यमान-जगत् वन ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥८॥
ग्रस्ताशेष जगत्स्वास्थ्य राक्षसाम्भोधि-मन्दर ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥९॥
पुच्छगुच्छ-स्फुरद्वीर जगद्दग्धारि-पत्तन ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥१०॥
जगन्मनो-दुरुल्लङ्घ्य-पारावारविलङ्घन ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥११॥
स्मृत-मात्र-समस्त-इष्ट-पूरक प्रणतप्रिय ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥१२॥
रात्रिञ्चर-चमूराशि-कर्तनैकविकर्तन ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥१३॥
जानकी जानकीजानि-प्रेमपात्र परन्तप ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥१४॥
भीमादिकमहावीर-वीरावेश-अवतारक ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥१५॥
वैदेही विरह आक्रान्त-रामरोषैकविग्रह ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥१६॥
वज्राङ्ग नख दंष्ट्रेश वज्रि वज्राव गुण्ठन ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥१७॥
अखर्व गर्व गन्धर्व पर्वत उद्भेदनस्वर ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥१८॥
लक्ष्मणप्राण-सन्त्राण त्रात-तीक्ष्ण-करान्वय।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥१९॥
रामादि-विप्रयोगार्त-भरतादि-आर्ति-नाशन ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥२०॥
द्रोणाचल समुत्क्षेप-समुत्क्षिप्त-अरि-वैभव ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥२१॥
सीताशीर्वादसम्पन्न समस्तावयवाक्षत ।
लोलल्लाङ्गूल-पातेन ममारातीन्निपातय ॥२२॥
इत्येवमश्वत्थतलोपविष्टः
शत्रुञ्जयं नाम पठेत्स्वयं यः ।
स शीघ्रम् एव अस्त-समस्त-शत्रुः
प्रमोदते मारूतज-प्रसादात्॥२३॥
॥ इति श्रीलाङ्गूलास्त्र-शत्रुञ्जयं हनुमत्स्तोत्रम् ॥
