मां दंतेश्वरी ने बनाया था अन्नमदेव को अजेय
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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंदेश में बस्तर ऐसी जगह है जहां दशहरे के मतलब ‘राम की रावण पर विजय’ नहीं बल्कि मां दंतेश्वरी की पूजा आराधना का पर्व है. दंतेश्वरी माता मां दुर्गा का ही रूप हैं.
राजा अन्नमदेव को माता दंतेश्वरी का ऐसा वरदान हासिल था कि हर जगह उनकी ही जीत होती थी. इतिहास की किताबों में दर्ज है कि कई राजा तो उनसे लड़े बिना हार स्वीकार लेते थे. मां की कृपा हर पल उनके साथ रहती थी.
एक बार की बात है महाप्रतापी राजा अन्नमदेव आंध्रप्रदेश के वारंगल से अपने विजय अभियान पर निकले. रास्ते में पड़ने वाले सभी राज्यों को वे जीतते जा रहे थे. हर जीत का जश्न वे मां के पूजन से करते.
मां दंतेश्वरी का आशीर्वाद साथ लिये राजा अन्नमदेव अपनी विजय पताका फहराते हुए चले जा रहे थे. उनका लाव लश्कर अब बस्तर की ओर बढ चला था. हर दिन नये गढों पर कब्जा करते हुए बढते जा रहे अन्नमदेव को माता दंतेश्वरी ने वरदान दिया था कि तुम आगे बढते रहो मैं तुम्हारे पीछे पीछे हूं.माता ने यह भी कह था कि जब तक तुम पीछे मुड कर नहीं देखोगे, तब तक मैं तुम्हारे साथ रहूंगी. मेरी मौजूदगी का अहसास मेरे पैरों के नुपूर या बिछुवे की आवाज तुम्हें कराती रहेगी. फिर भी यदि तुमने पीछे मुड़ कर देख लिया तो समझो कि मैं चली.
राजा अन्नमदेव लगातार विजय पथ पर बढते रहे, बढते रहे, माता के पैरों की नूपूर की ध्वनि पीछे से लगातार आती रही, राजा का उत्साह दिन दूना रात चौगुना बढता रहा. पर बस्तर पहुंच कर शंखिनी-डंकिनी नदी के तट पर राजा अन्नमदेव के कानों में नूपूर की आवाज आनी अचानक बंद हो गई.
वारांगल से सैकडों कोस दूर आने तक और पूरे बस्तर में अपना राज्य स्थापित करने तक महाप्रतापी राजा अन्न्मदेव के कानों में नुपूर की ध्वनि गूंजती रही थी. उनके कानों को जैसे उसकी आदत सी पड़ गयी थी. नूपूर ध्वनि के बंद हो जाने से राजा अन्न्मदेव चौंक गये.
हड़बड़ाहट और भविष्य में हार के भय की घबराहट तथा यह जानने की उत्सुकता कि ऐसा क्या हुआ कि मां के पैरों के नुपूर की आवाज आनी बंद हो गयी, अन्नम ने बिना कुछ सोचे समझे पीछे मुड़ कर देखा. ऐसे में वरदान की बात याद ही नहीं रही.राजा ने पीछे देखा तो नदी तट पर दूर उनके सैनिक रेत उड़ाते आते दिखे. नदी तट पर बालू और रेत ही रेत थी. राजा ने सोचा, हो सकता है माता का पांव शंखिनी-डंकिनी नदी की रेत में फंस गया हो, इसी से आवाज न आयी हो.
राजा नदी तट से आगे बढा पर जब उसे नुपूर की कोई आवाज न सुनायी दी तो उसने वहीं समूची सेना को रोक दिया. रात में अन्नमदेव को लगा माता ने साक्षात दर्शन दिये पर वह स्वप्न था. माता ने कहा ‘अन्नमदेव तुमने नियम तोड़ा, पीछे मुड कर देखा, अब मैं जाती हूं. ‘
राजा अन्नमदेव माता के चरणों में लोट गये. बोले माता अब मैं युद्ध में विजय की कामना ले कर आगे बढुंगा ही नहीं पर आप मेरे साथ ही रहें. राजा के बहुत रोने धोने पर माता पसीज गयीं और वहीं पर अपना अंश स्थापित किया जबकि अन्नमदेव ने यहीं अपनी विजय यात्रा समाप्त कर दी.
डंकिनी-शंखनी के तट पर यहीं माता दंतेश्वरी का मंदिर बना. यह 52 शक्तिपीठों में से एक है. दंतेवाड़ा का नाम इस देवी के नाम पर पड़ा पौराणिक कहानियों के अनुसार यह वही जगह है जहाँ देवी सती का दांत गिरा था.
स्रोत: कथा इतिहास और किवदंतियां
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