पितरों के आशीर्वाद से कंगला भोगे बन गया समृद्धः श्राद्ध महात्म्य की पौराणिक कथा

पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंशास्त्रों में मनुष्य के लिए तीन प्रकार के ऋण कहे गए हैं- देव ऋण, ऋषि ऋण एवं पितृ ऋण. पितृ ऋण को श्राद्ध करके उतारा जाना आवश्यक है. वर्ष में एक बार पितरों की मृत्यु तिथि को चल, तिल, जौ, कुश और पुष्प से श्राद्ध करके गौग्रास देकर, तीन या पंच ब्राह्मणों को भोजन करा देने मात्र से यह ऋण उतर जाता है.
पितृगण इतने ही कार्य से प्रसन्न होकर अनुकंपा करते हैं. पुत्र को चाहिए कि वह माता-पिता की मृत्यु की तिथि को दोपहर काल में जब सूर्य की किरणें पैरों पर स्पर्श करती हों, श्राद्ध तर्पण करना चाहिए.
जिस स्त्री के पुत्र न हो वह स्वयं पति का श्राद्ध तर्पण कर सकती है. श्राद्ध की महत्ता बताती एक पौराणिक कथा सुनें.
जोगे तथा भोगे दो भाई थे. दोनों अलग-अलग रहते थे. जोगे धनी था और भोगे निर्धन. दोनों में परस्पर बड़ा प्रेम था. जोगे की पत्नी को धन का अभिमान था, किंतु भोगे की पत्नी बड़ी सरल हृदय थी.पितृ पक्ष आने पर जोगे की पत्नी ने उससे पितरों का श्राद्ध करने के लिए कहा तो जोगे इसे व्यर्थ का कार्य समझकर टालने की चेष्टा करने लगा, किंतु उसकी पत्नी समझती थी कि यदि ऐसा नहीं करेंगे तो लोग बातें बनाएंगे.
फिर उसे अपने मायके वालों को दावत पर बुलाने और अपनी शान दिखाने का यह उचित अवसर लगा. अतः वह बोली- आप शायद मेरी परेशानी की वजह से ऐसा कह रहे हैं, किंतु इसमें मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. मैं भोगे की पत्नी को बुला लूंगी. दोनों मिलकर सारा काम कर लेंगी.
फिर उसने जोगे को अपने पीहर न्यौता देने के लिए भेज दिया. दूसरे दिन उसके बुलाने पर भोगे की पत्नी सुबह-सवेरे आकर काम में जुट गई. उसने रसोई तैयार की. अनेक पकवान बनाए फिर सभी काम निपटाकर अपने घर आ गई. आखिर उसे भी तो पितरों का श्राद्ध-तर्पण करना था.
इस अवसर पर न जोगे की पत्नी ने उसे रोका, न वह रुकी. शीघ्र ही दोपहर हो गई. पितर भूमि पर उतरे. जोगे-भोगे के पितर पहले जोगे के यहां गए तो क्या देखते हैं कि उसके ससुराल वाले वहां भोजन पर जुटे हुए हैं. निराश होकर वे भोगे के यहां गए.वहां क्या था? मात्र पितरों के नाम पर ‘अगियारी’ दे दी गई थी. पितरों ने उसकी राख चाटी और भूखे ही नदी के तट पर जा पहुंचे. थोड़ी देर में सारे पितर इकट्ठे हो गए और अपने-अपने यहां के श्राद्धों की बढ़ाई करने लगे. जोगे-भोगे के पितरों ने भी अपनी आपबीती सुनाई.
फिर वे सोचने लगे- अगर भोगे समर्थ होता तो शायद उन्हें भूखा न रहना पड़ता, मगर भोगे के घर में तो दो जून की रोटी भी खाने को नहीं थी. यही सब सोचकर उन्हें भोगे पर दया आ गई. अचानक वे नाच-नाचकर गाने लगे- ‘भोगे के घर धन हो जाए। भोगे के घर धन हो जाए.’
सांझ होने को हुई. भोगे के बच्चों को कुछ भी खाने को नहीं मिला था. उन्होंने मां से कहा- भूख लगी है. तब उन्हें टालने की गरज से भोगे की पत्नी ने कहा- जाओ! आंगन में हौदी औंधी रखी है. उसे जाकर खोल लो और जो कुछ मिले, बांटकर खा लेना.
बच्चे वहां पहुंचे, तो क्या देखते हैं कि हौदी मोहरों से भरी पड़ी है. वे दौड़े-दौड़े मां के पास पहुंचे और उसे सारी बातें बताईं. आंगन में आकर भोगे की पत्नी ने यह सब कुछ देखा तो वह भी हैरान रह गई.इस प्रकार भोगे भी धनी हो गया, मगर धन पाकर वह घमंडी नहीं हुआ. दूसरे साल का पितृपक्ष आया. श्राद्ध के दिन भोगे की स्त्री ने छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाएं. ब्राह्मणों को बुलाकर श्राद्ध किया. भोजन कराया, दक्षिणा दी.
जेठ-जेठानी को सोने-चांदी के बर्तनों में भोजन कराया. इससे पितर बड़े प्रसन्न तथा तृप्त हुए. रात को जेठानी भोगे द्वारा किए श्राद्ध की प्रशंसा करने लगी तो जोगे ने कहा- उसने सिर्फ श्राद्ध नहीं किया तुम्हारे मुंह पर थूका भी है.
जोगे की पत्नी को अपनी भूल का आभास हुआ. उसने निश्चय किया कि श्राद्ध के नाम पर मायके के सामने अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन करने के स्थान पर विधिवत श्राद्ध करेगी. अगले साल पितर आए और दोनों बेटों द्वारा किए श्राद्ध से प्रसन्न होकर उन्हें सुख-संपत्ति और आज्ञाकारी संतान का आशीर्वाद दिया.
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