नवरात्र व्रत के एक दिन का पुण्यफल इतना! नवरात्र व्रत का अद्भुत माहात्म्य.
पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
प्रभु शरणम् की पोस्ट प्राप्त करते रहने के लिए हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें. इससे आप तक हमारे पोस्ट पहुंचते रहेंगे. फेसबुक का लिंक इसी लाइन के नीचे है.एक गांव में भगवती दुर्गा का परम भक्त ब्राह्मण रहता था. गांव का नाम था पीठत और देवीभक्त ब्राह्मण का नाम था अनाथ. वह हर दिन बड़े विधि विधान से जगदंबा देवी की पूजा करता था.
अनाथ की सुमति नामक एक बेटी थी, जो रोज़ पिता की पूजा की तैयारी में हाथ बंटाती और पूजा में शामिल भी होती थी.
एक दिन बालिका सुमति अपनी सहेलियों के संग खेलने लगी. खेल में ऐसी खो गई कि उसे समय का ध्यान ही न रहा. पूजा में समय से पहुंच नहीं पाई.
पिता को पूजा में बेटी के न होने से बड़ी परेशानी हुई तो वह बहुत क्रोधित हो गया.
अनाथ ने उसे डांटते कहा- सुमति तूने आज भगवती का पूजन नहीं किया. यदि ऐसा ही रहा तो देखना मैं किसी दरिद्र और कुष्ठ रोगी से तेरा ब्याह कर दूंगा.
पिता ने सुमति को ऐसे कड़वे और शापित वचन कहे तो उसे बहुत दुःख हुआ. वह विलाप करने लगी. उसे विचार आया कि वह तो प्रतिदिन मां जगदंबा की भक्तिपूर्वक सेवा करती है, परंतु आज ऐसा कैसे हो गया.
उसने अपने पिता से क्षमा मांगी- पिताजी, नादानी में मुझे समय का ध्यान नहीं रहा मैं इसके लिये आपसे क्षमा मांगती हूं. मुझे लगता है कि मां जगदंबा भी मेरी इस भूल को माफ कर देंगी.
पर उसके पिता ब्राह्मण अनाथ का गुस्सा शांत न हुआ.वह बोला- मां जगदंबा की पूजा मेरे लिये जीवन और सब बातों से बढ कर है. मैं उसमें किसी भी तरह की कमी बर्दाश्त नहीं कर सकता. अब मैंने अगर ऐसा कह दिया तो देखना मैं तेरा विवाह किसी निर्धन कुष्ठ रोगी से ही करुंगा.
क्षमा मांगने के उपरांत भी पिता ऐसे शाप दे रहे हैं. यह बात सुमति को अंदर तक तोड़ गई.
इस पर सुमति ने अनाथ से कहा- आपकी कन्या होने के नाते मैं हर तरह से आपके अधीन हूँ. आप जिससे चाहें मेरा ब्याह कर सकते हैं, किन्तु होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा होगा. आप उसको नहीं बदल सकते.
भूल करने के बाद बहस भी कर रही है. यह सोचकर अनाथ का क्रोध और बढ़ गया.
उसने वहीं पर प्रण कर लिया कि अब सुमति को दंड देकर ही मानूंगा. उसका विवाह दरिद्र कुष्ठ रोगी से ही होगा.
कुछ बरस बाद उसने ढूंढकर सुमति का ब्याह एक दरिद्र कुष्ठ रोगी से कर दिया.
सुमति ने इसे भाग्य का लेखा मानकर स्वीकार लिया. दरिद्र शादी कर के अपनी पत्नी को लेकर जाता भी कहाँ इसलिये सुमति और उसके पति ने विदायी के बाद वह रात जंगल में बड़े दुःख तकलीफ से गुजारी.
वह रात अत्यंत पीड़ा में बीती. उसकी पीड़ा देखकर मां अंबे वहां प्रकट हो गयीं. असल में अनाथ के साथ सुमति ने भी मां जगदंबे की बहुत दिनों तक मन लगा कर पूजा की थी इसलिये उसके उसकी ऐसी दशा देख भगवती प्रकट हुई थी.
मां अंबे ने उससे कहा, कि हे दीन ब्राह्मणी, मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, जो माँगना हो मांग ले.
माता सुमति के समक्ष थीं. उसे इस बात का विश्वास ही न होता था. प्रसन्नता के मारे तो उसकी बुद्धि काम ही नहीं कर रही थी.
भावावेश में उसने माता से प्रश्न कर दिया-हे मां मुझ दीन-हीन पर आपने ऐसी कृपा कैसे की? मेरे ऐसे कौन से पुण्य हैं माता जिससे मुझ पर ऐसा अनुग्रह हुआ?
अपनी भक्त के इस प्रश्न पर मां हंस पड़ीं. देवी मां ने बताया- पुत्री मैं ही आदिशक्ति माँ हूँ, ब्रह्मा, विद्या और सरस्वती भी हूँ. इस जन्म में तुमने अपने किशोरावस्था के दौरान सच्चे मन से जो मेरी पूजा की और साथ ही तेरे पिछले जन्म के कर्म भी बहुत अच्छे थे, इसलिए मैंने तुझे दर्शन दिए.
पिछले जन्म में तू एक केवट की पतिव्रता औऱ धर्मनिष्ठ पत्नी थी. तुम सदा मेरी भक्तिभाव में रहती और नित्य पूजा करती.
एक दिन तेरे पति ने चोरी की और उसे राजा के सिपाहियों ने पकड़ लिया. तुम दोनों को जेलखाने में बंद कर दिया गया.
सिपाहियों ने वहां तुम दोनों को खाने को कुछ भी न दिया. उन दिनों नवरात्र चल रहे थे.अगले कुछ दिनों तक भी उन्होंने जल के अलावा तुम दोनों कुछ भी न दिया. तुम दोनों मेेरी स्तुति करते रहे. इस तरह से तुम दोनों का नौ दिन का व्रत हो गया.
उस व्रत के प्रभाव से मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूं और आज तुम्हें मनचाहा वर दे रही हूं. मांगो क्या मांगती हो?
सुमति ने देवी मां से कहा- मां दुर्गा आप मेरे पति को पूरी तरह स्वस्थ कर दें. देवी ने उससे कहा तू नवरात्र के अपने एक दिन के व्रत का प्रभाव अपने पति को दे दे. सुमति ने कहा ठीक है और अपने पति को अपने एक दिन के नवरात्र व्रत का प्रभाव दे दिया.
बस एक दिन के ही व्रतपुण्य के प्रभाव से उसका पति तुरंत ही स्वस्थ हो गया. सुमति और उसके पति ने मिलकर जगदंबे मां की खूब स्तुति की तो अंतर्धान होने से पहले मां ने उसे व्रत विधि बताई और शीघ्र ही पुत्रवती होने का वर भी दे दिया.
सुमति के स्वस्थ पति ने स्वस्थ पति ने मेहनत कर धन कमाया और समय आने पर सुमति को एक सुंदर सा बेटा हुआ जिसका नाम उसने उदालय रखा.
बोलो जयकारा माँ शेरावाली का. बोलो साँचे दरबार की जय.
स्रोत: लोकश्रुत
प्रभु शरणम् एप्पस का लिंकः
Android मोबाइल ऐप्प के लिए यहां क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए यहां क्लिक करें
मां दुर्गा लक्ष्मी शरणम् एंड्रॉयड प्ले स्टोर से या नीचे लिंक से करें डाउनलोडः
Android मोबाइल ऐप्प के लिए यहां क्लिक करें
ये भी पढेंः
सप्तश्लोकी दुर्गा के सात श्लोकों में मिल जाता है श्रीदुर्गासप्तशती के सम्पूर्ण पाठ का फलः
सम्पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ के समान फलदायी है सिद्ध कुंजिकास्तोत्र-माहात्म्य व जप विधि
ब्रह्माजी के वरदान कवच में छुपा असुर, भगवती ने दुर्गा रूप में किया संहारः दुर्गा अवतार की कथा
