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नए साल पर बहुत कुछ नया होगा, भक्तिरस में नई ऊंचाइयां छूने की तैयारी- पढ़ें और जानें कि क्या होने वाला है

नए साल पर बहुत कुछ नया होगा, भक्तिरस में नई ऊंचाइयां छूने की तैयारी- पढ़ें और जानें कि क्या होने वाला है

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नववर्ष पर प्रभु शरणम् ने भक्तिरस में आपको सराबोर करने के बहुत से नए प्रयासों का निर्णय किया है. भक्तों के चरित की एक विशेष शृंखला आरंभ हो रही है. इसके अलावा संतों पर एक शृंखला और हमारे तीर्थस्थानों पर विशेष शृंखला आरंभ होगी.

भक्त चरित शृंखला में हम आपको पुराणों में वर्णित भक्तों की अद्भुत कथाओं और उनकी अद्वितीय भक्ति से परिचित कराएंगे. इसमें एक भगवान की दूसरे के प्रति भक्ति से लेकर, भगवान के मानव, असुर, गंधर्व भक्तों की कथाएं भी होंगी जो मन को हर्षित करेंगी.

संत हमारे हिंदू समाज के पुरोधा हैं. सनातन के अग्रदूत हैं. हम हिंदुओं को सौभाग्यशाली अनुभव करना चाहिए हैं जिन्हें संत परंपरा की छत्रछाया अनंतकाल से मिली. आज की ही बात लें तो दुनिया के श्रेष्ठ उद्यमी आध्यात्मिक और वैचारिक जागरण के लिए भारत के संतों की शरण लेते हैं.

इस शृंखला में हम संतों की महिमा, उनके त्याग और समाज व धर्म को मिले उनके योगदान की चर्चा होगी. संत परंपरा बड़ी समृद्ध है. चंद उदाहरणों को देखकर आप पूरी संत परंपरा को दूषित न समझें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इसके अलावा मैं मंदिरों-तीर्थ स्थानों की शृंखला आरंभ करूंगा. इसका उद्देश्य है हिंदुओं को अपने पवित्रस्थलों के दर्शन को सुगम करने में सहयोगी बनना. हमारे तीर्थों और मंदिरों, मठों में एक सकारात्मक ऊर्जा मौजूद रहती है. उस ऊर्जा का हमें लाभ लेना चाहिए.

आप पर्यटन को किसी स्थान पर जा रहे हों और आपके पर्यटनस्थल के समीप मार्ग में ही कोई चमत्कारिक तीर्थस्थान हो जिसकी प्रसिद्धि आपके कानों तक न पड़ी हो लेकिन वह तीर्थस्थान तेजराशि से युक्त है तो वहां आपको जाना चाहिए. उसकी सकारात्मक ऊर्जा का लाभ लेना चाहिए.

सिद्धजन बहुत गोपनीय रूप से वास करते हैं. हमें उन्हें खोजकर उनके तप का लाभ लेना चाहिए. मैं स्वयं इन तीर्थों, मंदिरों आदि के दर्शन करके उनकी महिमा का बखान करूंगा. आप भी अपने आसपास स्थिति ऐसे तीर्थों, मंदिरों आदि के बारे में लिखें. आपके लेखों का स्वागत रहेगा.

जल्द ही मैं एक दो तीर्थों, मंदिरों आदि के बारे में लिखकर आपको बताउंगा ताकि आपको आइडिया मिले कि आखिर किस प्रकार से इस शृंखला में जानकारी देनी है. सभी भक्तजनों से अपील है कि सनातन के प्रचार अभियान में सक्रिय रूप से सहयोग दें. ईश्वर हमारा मार्गदर्शन करें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मैं आपके फिर कहता हूं कि पुराणों में जो लिखा है, उसे चुनौती देने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है. पुराण महर्षि वेद व्यास जी द्वारा रचित हैं. क्या सत्य, क्या असत्य मैं इसमें पड़ना व्यर्थ मानता हूं.

प्रभु शरणम् का उद्देश्य है धर्मग्रंथों को सहज और सरल रूप से आपके सामने कथाओं के रूप में प्रस्तुत करना ताकि रोचकता के साथ हम ग्रंथों से जुड़े रहें. मानो तो देव न तो पत्थर. भक्ति में शंका का स्थान नहीं होता.

किसी शुभकार्य का आरंभ प्रथमपूज्य गणेशजी का नाम लेकर उनके आशीर्वाद से करना चाहिए. इसलिए भक्तचरित शृंखला का आरंभ भगवान गणपति का स्मरण करते हुए कर रहे हैं.

इस शृंखला में कथाओं के संकलन का भार रंजना श्रीवास्तवजी ने अपने ऊपर लिया है. रंजनाजी शिक्षिका हैं और धर्म के विषय पर लंबे समय से लेखन कार्य कर रही हैं. प्रभु शरणम् उनका आभारी है. प्रभु हमें मार्ग दिखाएं.

राजन प्रकाश
प्रभु शरणम्हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भूमि पर श्रीराम नाम लिखकर उसकी परिक्रमा कर प्रथम पूज्य घोषित हुए थे गणपति!

करुणासागर भगवान जीवों पर कृपा करके स्वयं उनको अपनाते हैं. संसार के विभिन्न प्रकार के कष्टों में पड़े जीवों को सही मार्ग पर लाने तथा उनके उद्धार के लिए विभिन्न लीलाएँ किया करते हैं।

अपने आचरण से भक्ति का मंगलमय मार्ग दिखलाते हैं. ऐसे ही लीला रूपों में एक रूप है श्री गणेशजी का सभी आराधनाओं एवं मंगलकार्यों में प्रथमपूज्य माने जाते हैं। श्री गणेश के प्रथमपूज्य होने की अनेक कथाएँ मिलती हैं।

भगवान गणपति रुद्रगणों के अधिपति हैं, अतः उनकी प्रथम पूजा करने से कार्य निर्विघ्न समाप्त होता है। उस कार्य में रुद्रगण कोई विघ्न उपस्थित नहीं करते। सृष्टि के आरंभ में जब यह प्रश्न उठा कि प्रथमपूज्य किसे माना जाए, तब सभी देवता ब्रह्माजी के पास गए।

ब्रह्मा जी ने कहा पूरी पृथ्वी की परिक्रमा जो सबसे पहले कर ले वही प्रथम पूज्य माना जाए।सब देवता अपने-अपने वाहनों पर बैठकर प्रदक्षिणा के लिए चल पड़े। गणेशजी का शरीर स्थूल है, वे लंबोदर हैं और उनका वाहन है चूहा। अनेक देवताओं के वाहन पक्षी हैं।हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.कुछ रथ पर, कुछ अश्व पर या हाथी पर विराजते हैं। उन सबके साथ भला गणेश जी कैसे दौड़ सकतेथे? देवर्षि नारदजी की सम्मति से गणेशजी ने भूमि पर ‘राम’ भगवान का यह नाम लिखा औऱ उसी की प्रदक्षिणा करके ब्रह्मा जी के पास पहुँच गए।

सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने उन्हीं को प्रथम पूज्य बताया क्योंकि ‘राम’ नाम तो साक्षात् श्रीराम का स्वरूप है औऱ श्रीराम के तो रोम-रोम में कोटि-कोटि ब्रह्मांड हैं। श्री गणेश जी ने राम-नाम की परिक्रमा करके समस्त ब्रह्मांडों की परिक्रमा कर ली थी।

एक कथा यह भी है कि श्री गणेश जी ने अपने माता-पिता की ही प्रदक्षिणा की क्योंकि ‘माता साक्षात् क्षितेस्तनुः’ अर्थात् माता साक्षात् पृथ्वीस्वरूप एवं पिता प्रजापति के स्वरूप हैं। कल्पभेद से दोनों ही कथाएँ सत्यस्वीकृत हैं। (कल्याण से साभार)

संकलनः रंजना श्रीवास्तव

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