धीरे-धीरे क्यों कुरूप दिखने लगते हैं हम

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एक पागल आदमी था. वह अपने को बहुत ही सुंदर समझता था. जैसा कि सभी पागल समझते हैं, वैसा उसे लगता था कि पृथ्वी पर उसके जैसा रूपवान इंसान दूसरा कोई है ही नहीं.
स्वयं को इतना रूपवान समझने के बावजूद भी वह व्यक्ति कभी आईना नहीं देखता था. उसे आईने से डर लगता था. इतना डर कि कभी भूले से कोई उसके सामने से आईना लिए नजर भी आ जाए तो वह उसका आईना तुरंत तोड़ देता था.
लोग उससे झगड़ते. मार-पीट भी हो जाती. एक भले इंसान को लगा कि शायद इस व्यक्ति का जीवन बर्बाद होने के पीछे हो न हो आईना जरूर कोई कारण रहा हो तभी इसे इतनी चिढ़ है.
उसने पागल से पूछ लिया कि तुम्हें आईने से इतनी नफऱत क्यों है? पागल ने उत्तर दिया- मैं अपूर्व सुंदर हूं, मेरी सुंदरता का कोई मुकाबला ही नहीं कर सकता पर ये आईना ही कुछ ऐसी गड़बड़ करता है कि मुझे कुरूप बना देता है!
जब मैं इसमें अपनी छवि देखता हूं तो मैं उतना सुंदर नहीं दिखता. ये आईना मुझे कुरूप बनाने और साबित करने की कोशिश करता है! मैं किसी आईने को बर्दाश्त नहीं करूंगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मैं संसार के सारे आईने तोड़ दूंगा! मैं सुंदर हूं, और ये आईने मुझे कुरूप करते हैं! मनुष्य भी उस पागल की तरह व्यवहार करता रहा है. आईना वही छवि दिखाता है जो सही है। आईना वही बताता है, जो मैं हूं.
आईने के पास कोई कारण नहीं कि वह किसी को कुरूप कर दे. बजाय अपनी वास्तविक छवि को देखकर स्वीकार करने के हम आईने तोड़ने में लगे हैं.
जो लोग संसार को छोड़कर भाग जाने को उतारू लोग हैं वे और कोई नहीं आईने को तोड़ने वाले लोग हैं. अगर संसार दुखद मालूम पड़ता है तो याद रखें कि संसार एक दर्पण से ज्यादा नहीं. वही दिखायी पड़ता है, जो हम हैं.
जब हम सुख के जीवन में होते हैं तो उन्माद में और उमंग में मस्त रहते हैं. लगता है कि संसार में सब ओर सुख है. किसी के कष्टों में सहानुभूति नहीं रखते. अपने उन्माद में दूसरों को पीड़ा पहुंचाते हैं और उसके लिए कोई न कोई खोखला तर्क भी खोज लेते हैं.
समय तो करवट लेगा ही. जिन खोखले तर्कों की आड़ में आप संसार के साथ जैसा व्यवहार कर रहे थे, वही तर्क इस बार दूसरे इस्तेमाल कर रहे होते हैं तो आपको सब बिखरता हुआ लगता है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.चिंता न करें. कल उस व्यक्ति के साथ कोई तीसरा व्यक्ति उसी तर्क का सहारा लेकर पीड़ित करेगा. यही क्रम चलता रहेगा. ऐसे में निराशा के अलावा कोई और अपेक्षा रखना उचित ही नहीं.
जो सरल हृद्य होते हैं, सच्चे मन के होते हैं वे किसी को पीड़ित करने के लिए खोखले तर्क नहीं खोजते. हो सकता है उनकी तरक्की की गति थोड़ी कम हो लेकिन स्थाई होती है. स्वयं से कब तक छल करेगा कोई!
जीवन का कोई आह्वान नहीं करता. जीवन को छोड़ देने, जीवन से पलायन करने, जीवन को तोड़ देने और नष्ट कर देने की बहुत-बहुत चेष्टाएं जरूर की गयी हैं. इस लोक और मोक्ष वाले परलोक दोनों को यहीं जीने का प्रयास कीजिए.
स्वर्गकी जो कल्पना आपके मन में आती हो उसके वाशिंदे तो तभी हो सकते हैं जब आपमें देवत्व आए. अपने अंदर देवत्व का भाव जगाए रखिए. संभव है कि कुछ देर लगे लेकिन स्वर्ग का संतोष भी यहीं मिलने लगेगा.
लालच, घृणा, कपट, हिंसा, मोह इनसे जरा सी दूरी बनाने का प्रयास करके तो देखिए. इस प्रयास के दौरान ही आपको सुखद अनुभूति होने लगेगी. संतोष की अनुभूति. यही तो देवत्व है.
संकलनः अऩुराग शर्मा
संपादनः राजन प्रकाश
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