जानिये किसके अभाव में आप का ज्ञान व्यर्थ है.

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रौबदार व्यक्तित्व का एक युवक संत कबीर के पास आया. कबीर उस समय आंखें मूंदे भक्ति भजन में मगन थे. उनके साथ कई और लोग सत्संग कीर्तन में डूबे थे.
युवक बोला- गुरुजी! मैंने उच्च शिक्षा ली, पर्याप्त ज्ञान ग्रहण किया. विवेकशील हूं. अच्छे-बुरे का फर्क समझ सकता हूं. फिर भी मेरे माता-पिता मुझे सत्संग जाने को कहते हैं. इतना ज्ञानवान हो जाने पर मुझे रोज सत्संग की क्या जरूरत है?
कबीरदासजी उस युवक की बात सुनते रहे और मंद-मंद मुस्कुराते रहे. युवक को लगा कि शायद अपना परिचय देने में कुछ कमी रह गई. कुछ और बताना चाहिएयुवक ने फिर कहना शुरू किया- जब मैं पढ़ाई करता था तब लोग मेरे पास परामर्श के लिए आते थे. अपने विवेक से उत्तर देकर मैं उन्हें संतुष्ट करता था. अब मेरे जैसे बुद्धिमान के लिए इन सत्संगों में सीखने को क्या रह गया है?
कबीरदासजी ने कहा कुछ नहीं बस चुपचाप उठे. वहां रखी एक हथौड़ी उठाई और पास ही जमीन पर गड़े एक खूंटे पर जोरदार मार दी. युवक को लगा कि शायद महाराजजी ने मौन व्रत लिया है. वह चला गया.अगले दिन वह फिर आया और बोला- मैंने आपसे कल एक प्रश्न पूछा था, किंतु आपने मौन धारण किया था इसलिए उत्तर नहीं दिया. क्या आज आप उत्तर देंगे?
कबीरदास ने आज भी कुछ नहीं बोला बस फिर से खूंटे के ऊपर हथौड़ी मार दी. युवक ने सोचा कि संत पुरुष हैं, शायद मौन दो दिनों का चलता हैं.
वह तीसरे दिन फिर आया और अपना प्रश्न दोहराया. कबीरदास ने फिर से खूंटे पर हथौड़ी चला दी लेकिन बोले कुछ नहीं. युवक का धैर्य जवाब दे गया.
परेशान होकर उसने कहा- मैं तीन दिन से आपसे प्रश्न पूछ रहा हूं. आखिर आपका मौन टूटेगा कब? मुझे बताएं, मैं उसी दिन आउंगा पर मेरे प्रश्न का जवाब देना पड़ेगा.
कबीरदास जी बोल पड़े- तुम तो ज्ञानवान हो इसलिए मैंने सोचा संकेत भी समझते होगे. मैं तो तुम्हें रोज जवाब दे रहा हूं, पर शायद तुम समझ नहीं पा रहे हो.सुनो, मैं इस खूंटे पर हर दिन हथौड़ी मारकर जमीन में इसकी पकड़ मजबूत करता हूं. यदि ऐसा नहीं करता तो इससे जो पशु बंधते हैं उनके खींचतान से या किसी की ठोकर लगने से या जमीन में हल्की सी हलचल से भी यह निकल जाएगा.
ठीक यही काम सत्संग हमारे लिए करता है. वह हमारे मनरूपी खूंटे पर निरंतर प्रहार करता है ताकि हमारी पवित्र भावनाएं मजबूती से जमी रहें.युवक ने कबीरदासजी के पैर पकड़ लिए और कहा- मैंने ज्ञान तो लिया था लेकिन बोध नहीं. आपने आज राह दिखाकर मेरा बोध पूर्ण करा दिया.
सांसारिक बंधन प्रतिदिन हमें कुछ विकारों की ओर घसीटते हैं. हमें विविश होकर उधर जाना पड़ता है. परंतु मन में सत्य को दृढ़ करने और असत्य को मिटाने का प्रयास प्रतिदिन जरूरी है.
भक्ति और सत्संग से मन और आत्म पवित्र होकर यह महसूस करती है कि ईश्वर की सत्ता सर्वोपरि है. वह सर्वसमर्थ होकर परोपकार में लगे रहते हैं. यही हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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