जानिए अंजाने में भी गौमाता का अपमान होने पर भोगने पड़ते हैं कौन से कष्ट

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गऊ माता के अपमान से अनर्थ हो सकता है तो वहीं उनकी सेवा से सब कुछ पाया जा सकता है. महाराजा दिलीप गो सेवा न करते तो रघुकुल ही न चलता फिर राम कहां से होते. रोचक कथा
भगवान राम के वंशजों में राजा दिलीप बहुत प्रतापी राजा थे. पर जब बरसों तक उनको कोई संतान न हुई तो उन्हें लगा कि जरूर मुझसे कोई जाने-अनजाने पाप हुआ है जिसके चलते मैं अभी तक निःसंतान हूं. मुझे इसका पताकर पापमुक्त होना पड़ेगा.
अपनी शंका लेकर राजा दिलीप अपने गुरु वशिष्ठ के पास पहुंचे. जिस बात की आशंका थी वही निकली. गुरु वशिष्ठ बहुत सोच विचार करने के बाद कहा, अनजाने में ही सही आपसे एक अपराध हुआ हैं इसीलिए आप को अब तक कोई संतान नहीं है.
गुरु वशिष्ठ ने बताया, एक बार आप देवराज इंद्र के बुलावे पर देवताओं की तरफ से असुरों से लड़ने स्वर्ग गये थे, वापसी में कामधेनु मिली. धरती पर पहुंचने की जल्दी में न तो तुमने उनकी ओर ध्यान दिया न उन्हें प्रणाम किया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अपनी इस उपेक्षा से दुखी कामधेनु ने तब दूसरी गायों को सुनाते हुये कहा था- अगर मेरी संतानें इस पर कृपा न करें तो यह संतानहीन ही रह जाएगा. राजन, आपको बचपन से सिखाया था कि गौवंश दिखे तो उनको राह देते हुए दायें होकर प्रणाम करना चाहिए.
गौ अपराध, कामधेनु का श्राप और गुरु आज्ञा का पालन न करने से आपको संतान संकट झेलना पड़ेगा. दिलीप रोने लगे- बोले वंश कैसे चलेगा. कोई उपाय बताइए इस शाप मुक्ति का. गुरु वशिष्ठ बोले- गौ अपराध का प्रायश्चित गौ सेवा ही हो सकती है.
वशिष्ठ ने कहा, महाराज, अब कुछ समय तक आश्रम में रुक कर यहां कामधेनु की पुत्री होम धेनु नंदिनी की सेवा कीजिये. महाराज ने बात मान ली. महाराज का साथ देने महारानी भी वहां आ गयीं. दोनों मिलकर नंदिनी की सेवा में लग गये.
वे सुबह नंदिनी की पूजा करतीं, दिलीप नंदिनी को चराने जंगल ले जाते, उसके पीछे पीछे चलते, कीट, पतंगे, मक्खी, मच्छर भगाते, हाथों से हरा चारा खिलाते. साफ पानी पिलाते और शाम को उनकी पूजा कर घी का दीपक जलाते.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक दिन जंगल में महाराजा दिलीप की नजर जरा हटी नहीं कि उधर नंदिनी गौ पास की गुफा में घुस गयीं. गुफा में एक शेर था. शेर ने नंदिनी को पकड़ लिया. करुण पुकार कर नंदिनी के डकारने लगी तो दिलीप दौड़ कर वहां पहुंचे.
शेर नंदिनी को दबोचे बैठा था. दिलीप ने तुरंत बाण तान दिया. इससे पहले कि बाण छूटता शेर आदमी की बोली में बोला- बेकार की कोशिश मत करो. मैं कोई ऐसा वैसा शेर नहीं मां पार्वती की कृपा है मुझ पर.
शेर ने बताया- मैं पार्वती माता के हाथों से लगाए देवदारू के पेड़ों की रखवाली में हूं. जो भी जीव जंतु इधर आए उसे खाने की आज़ादी है मुझे. राजा दिलीप ने जब सुना कि यह सिंह माता पार्वती की सेवा में है तो बड़े धर्मसंकट में पड़ गए.
दिलीप ने कहा- हे वनराज! आप माता पार्वती के सेवक हैं इसलिए आपको प्रणाम करता हूं. परंतु यह मेरे गुरु की गाय है. यदि मैं इसकी रक्षा न कर पाया तो मुझे दोष लगेगा. आप कृपा कर इस गाय को छोड़ दें. मुझे खाकर अपनी भूख शांत करें.
शेर बोला- आप राजा हैं, आप पर प्रजा की जिम्मेदारी है. आप युवा हैं. जीवन में बहुत सुख भोगने बाकी हैं, फिर एक गाय के लिए अपने प्राण क्यों देते हैं. आप तो इस गाय के बदले हजार गायें अपने गुरु को दे सकते हैं. पर दिलीप न माने.
दिलीप बोले- ऐसे व्यक्ति का जीवन धिक्कार है जिसके सामने कोई गाय मार दी जाए. फिर यह तो मेरे गुरु की गाय है. मुझे सुख भोग की लालसा नहीं तुम तो मेरे प्राण ले लो और गाय को छोड़ दो. यह कहकर सिर झुका कर वहीं बैठ गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शेर ने कहा- आपको बुद्धिमान समझ मैंने आपको समझाने का अपना फर्ज निभाया. आगे आपकी इच्छा. मुझे तो भोजन चाहिए. गाय न सही आप ही सही. राजा दिलीप उम्मीद कर रहे थे कि उन पर शेर झपटने ही वाला होगा पर उनपर फूलों की बारिश होने लगी.
वह चौंककर उठे. शेर कहीं नहीं था. सामने नंदिनी खड़ी कह रही थी, तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए ही मैंने माया रची थी. अब उठो. पेड़ से पत्ता तोडो. उसमें दूहकर मेरा थोड़ा दूध पी लो. तुम्हें तेजस्वी संतान प्राप्त होगी.
दिलीप ने उठकर नंदिनी को पैर छूकर प्रणाम किया और बोले- देवि, आपके दूध पर पहला अधिकार बछड़े का है. उसके बाद गुरु वशिष्ठ का. बछड़े के पी लेने के बाद यदि गुरुजी की आज्ञा होगी तभी दूध ग्रहण कर सकता हूं.
शाम को महाराज दिलीप नंदिनी को लेकर वन से लौटे तो सारी कथा गुरु वशिष्ठ को सुनाई. वह बहुत खुश हुए. उनसे आशीर्वाद और आज्ञा लेकर दिलीप ने नंदिनी का दूध पिया और अद्भुत गो सेवा के पुण्य से उन्हें रघु जैसे पराक्रमी और सत्यनिष्ठ पुत्र प्राप्त हुए. उन्हीं के नाम पर रघुकुल हुआ जिसमें जन्मे भगवान श्रीराम.
(स्रोत: कालिदास रचित महाकाव्य रघुवंश)
संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश
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