चित्रकेतु ने कर दिया शिव का अपमान, पार्वती ने दिया असुर होने का शाप- कौन था इंद्रद्रोही वृतासुर?

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इंद्र ने वृतासुर का वध कर दिया. एक बार फिर ब्रह्महत्या का पाप इंद्र का पीछा करने लगा. विश्वरूप की हत्या का पाप तो धरती, जल, स्त्रियों और वृक्षों ने उठा लिया था.
इंद्र फिर से संकट में थे. ऋषियों ने इंद्र को कहा कि वह यज्ञों के माघ्यम से इस पाप से मुक्ति कराएंगे. ब्रह्म हत्या के दोष पीड़ित इंद्र को कहीं शरण न मिल रही थी.
हारकर इंद्र मानसरोवर में एक कमल की डंठल में छिप गए. मानसरोवर लक्ष्मीजी द्वारा रक्षित है इसलिए ब्रह्महत्या का दोष वहां प्रवेश नहीं कर सका.
इंद्र ने मानसरोवर में हज़ार वर्षों तक तप करके पाप का प्रायश्चित किया. इस दौरान इंद्र यज्ञों में समर्पित हविष से वंचित रहे. स्वर्ग इंद्रविहीन हो गया था.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ब्रह्मा ने इसका निदान दिया कि जब तक इंद्र पापमुक्त नहीं होते तब तक पुरुरवा पुत्र राजा नहुष इंद्र के पद पर विराजमान रहेंगे. किन्तु नहुष इंद्र की पत्नी पर आसक्त हो गए और स्वर्ग से निष्कासित हुए. (यह कथा बाद में सुनाएंगे)
शुकदेव से भागवत कथा सुन रहे परीक्षित ने पूछा- वृटासुर असुर होने के बाद भी ब्रह्मज्ञानी कैसे निकला? मुझे उसकी कथा सुनाइए. शुकदेव ने वृटासुर के पूर्वजन्म की कथा सुनाई.
सूरसेन के राजा चित्रकेतु धर्मपालक राजा थे. उनकी अनेक रानियां थीं लेकिन कोई संतान न हुई. राजा वंशहीन होने से बहुत दुखी रहते थे.
एकबार ऋषि अंगिरा नारदजी के साथ चित्रकेतु के पास आए. अंगिरा ने कहा- आपकी प्रजा सुखी है कितु आप दुखी. इस कारण प्रजापालक होने के पुण्य से आप वंचित हो रहे हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.चित्रकेतु ने बताया- मैं संतानहीन हूं. इसी चिंता में रहता हूं कि मेरे बाद प्रजा का पालन कौन करेगा. अंगिरा ने राजा को एक चरू दिया और कहा इसे अपनी प्रिय रानी को दे दो. वह माता बनेगी.
राजा ने वह चरू अपनी प्रिय पत्नी कृतद्युति को दिया. रानी एक पुत्र की माता बनीं. चित्रकेतु का अधिकांश समय कृतद्युति के साथ बीतने लगा जिससे अन्य रानियों को ईर्ष्या हुई.
ईर्ष्या से एक दिन सब रानियों ने मिलकर राजकुमार को जहर देकर मार दिया. राजा रानी और पूरा राज्य शोक में डूब गया. अंगिरा के सारी बातें पता चलीं. वह नारद के साथ आए.
अंगिरा बोले-जिस बालक से दूर होकर आप इतने दुखी हैं, वह आपका कौन था? आप और वह दो अलग-अलग जीवात्माएं हैं. आपका संबंध इतना ही था कि इस जन्म में वह कुछ समय के लिए आपका पुत्र बना.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जैसे नदी में पड़े पत्ते और तिनके कुछ दूर साथ चलने के बाद अलग हो जाते हैं वैसे ही हम भी इस संसार में किसी न किसी बंधन से बंधे साथ आते हैं और समय पर अलग हो जाते हैं.
ये उपदेश सुनकर भी चित्रकेतु को शान्ति न मिली. तब नारद ने अपनी शक्ति से उस जीवात्मा का आह्वान किया जो चित्रकेतु का पुत्र बनकर आया था.
नारद ने आत्मा से कहा- तुम्हारे पिता शोक संतप्त हैं. उन्हें धैर्य बंधाओ. यदि तुम चाहो तो मैं पुनः इस शरीर में प्रवेश करा सकता हूं ताकि पुत्र बनकर अपने माता-पिता को सुख दे सको.
आत्मा ने कहना शुरू किया- आप मेरे किस माता-पिता की बात करते हैं. मैंने तो अनगिनत जन्म लिए हैं. मेरे अनेक माता-पिता रहे हैं. मैं किस-किस को प्रसन्न करूं?
इन दोनों शरीरों को मैं आपना माता-पिता कैसे मान लूँ? देह त्यागते ही मेरा इनसे कोई नाता न रहा. मैं किसी का पुत्र नहीं न ही कोई मेरा माता-पिता. मैं इनके घर नहीं आना चाहता.
आत्मा की बात सुनकर चित्रकेतु का मोहभंग हुआ. नारदजी ने राजा को नारायण मन्त्र की दीक्षा दी. चित्रकेतु ने मंत्र का अखंड जप करके नारायण को प्रसन्न किया.
भगवान ने दर्शन देकर एक दिव्य विमान दिया. चित्रकेतु भगवद् दर्शन से चैतन्य होकर सिद्धलोक आदि में भी विचरण करते रहते.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक बार वह विमान में बैठकर कैलाश के ऊपर से गुजर रहे थे कि उनकी नज़र शिवजी पर पड़ी. महादेव सिद्ध आत्माओं को उपदेश दे रहे थे. पार्वतीजी उनकी गोद में बैठी थीं.
यह देख चित्रकेतु हंसे और कहा- सिद्धों की सभा में महादेव स्त्री का आलिंगन किए बैठे हैं! आश्चर्य है कि इन ज्ञानियों ने भी इन्हें ऐसे अमर्यादित कार्य से नहीं रोका!
महादेव ने तो अनदेखी कर दी लेकिन पार्वतीजी को क्रोध हो आया. उन्होंने चित्रकेतु को शाप दिया- जिसकी निंदा की योग्यता स्वयं श्रीहरि में नहीं तुम उसकी निंदा करते हो. तुम असुर कुल में चले जाओ.
चित्रकेतु पार्वतीजी के पास आए और प्रणाम कर कहा- माता मैंने मूर्खता में आपका अपमान किया. इसका दंड मिलना ही चाहिए. मैं इस शाप को भी श्रीहरि की कृपा की तरह लेता हूं.
महादेव ने पार्वतीजी से कहा- यह हरिभक्त है. किसी भी जीवन से उन्हें भय नहीं होता. नारायण भक्तों के हृदय में निवास करते हैं.
शुकदेवजी परीक्षित से बोले- हे राजन। चित्रकेतु में इतनी शक्ति थी कि वह इस शाप पर क्रोधित होकर माता को शापित कर सकते थे किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया.
वही चित्रकेतु जगदंबा के शाप के कारण वृटासुर हुए थे. नारायण नाम को धारण करने के कारण उनमें पूर्वजन्म का ज्ञान शेष था. इंद्र के साथ शत्रुता भी वह नारायण का आदेश समझकर निभा रहे थे.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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