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ब्रह्मा ने सोचा कि इस विवाद का रास्ता निकालने के लिए विष्णुजी की ओर बढा दिया जाए. सभी को साथ लेकर ब्रह्माजी श्रीहरि के पास पहुंचे और सारा हाल कह सुनाया.

श्रीहरि ने कहा- बल में दोनों की बराबरी है, बस बुद्धि में अंतर का निर्णय करना होगा. बुद्धि का निर्णय तो तर्क के आधार पर ही हो सकता है. जो इसमें श्रेष्ठ रहा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा.

यदि मैंने तर्क के आधार पर कोई निर्णय दिया तो पक्षपात का आरोप लग सकता है क्योंकि मैं भी देवताओं की श्रेणी में ही आता हूं. इसलिए निर्णय एक साधारण सी परीक्षा से होना चाहिए.

सभी तैयार हो गए. देवताओं और असुरों की सहमति से एक निर्णायक मंडल बना. श्रीहरि प्रतियोगिता में शामिल न होकर निर्णायक मंडल में रहे ताकि यह आरोप न लगे कि उन्होंने देवों को युक्ति बता दी.

एक विशाल परात में लड्डू रखे गए. पहले असुरों को बुलाया गया. उनके हाथों में इतना बड़ा चम्मच बांघा गया कि कोहनी मुड़ नहीं सकती थी. एक घंटे में लड्डुओं को खाना था.
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