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कालियानाग और काकभुशुंडि को क्यों मिली इतनी ईश्वर कृपा?

कालियानाग और काकभुशुंडि को क्यों मिली इतनी ईश्वर कृपा?


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एक बार राजा बहुलाश्व ने नारदजी से पूछा कि भगवान विष्णु की जिस चरणधूलि लेने के लिये देवतागण भी तरसते रहते हैं वह चरण कालिया नाग को सिर पर कैसे प्राप्त हुआ? किस पुण्य के कारण एक विषधर नाग को ऐसा सौभाग्य प्राप्त हुआ?

नारदजी ने कहा- हे राजन! इसकी एक कथा है जो मैं आपको सुनाता हूं. बात स्वायंम्भुव मनवंतर की है. उसमें एक प्रसिद्ध मुनि हुए वेदशिरा. जितना बड़ा नाम उतना ही बड़ा आश्रम. भृगु वंश के ये मुनि थोड़े गुस्सैल भी थे.

एक दिन उनके आश्रम पर अश्वशिरा नाम के मुनि आये. प्रसिद्धि में वे भी कुछ कम न थे. वेदशिरा कहीं गये हुए थे. विंध्याचल पर स्थित अश्वशिरा का आश्रम बड़ा रमणीय था. वेदशिरा को यह आश्रम अपनी तपस्या के लिए जंच गया.

वेदशिरा ने अपने प्रभाव से अश्वशिरा की मंशा भांप ली और इस बात से बहुत नाराज हुए कि अश्वशिरा उसी आश्रम में रहकर तपस्या करना चाहते हैं. उन्होंने आपत्ति जताई- क्या कोई और जगह धरती पर नहीं है, मेरे आश्रम पर ही क्यों?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.वेदशिरा ने साफ-साफ कह दिया कि मेरे आश्रम में रहकर तपस्या करने की सोची भी तो ठीक न होगा. किसी और स्थान पर जाकर तपस्या करो. वेदशिरा की यह दो टूक सुनकर अश्वशिरा भी गरम हो गए.

अश्वशिरा ने कहा- मुनिवर सभी भूमि महाविष्णु की है न तुम्हारी न मेरी. इस धरती पर जाने कितने मुनियों ने तप अनुष्ठान किए पर उन्होंने कभी नहीं टोका. तुम बेवजह सांप की तरह फुफकारने लगे हो. जाओ सदा के लिए सर्प बन जाओ और हमेशा गरुड से भयभीत रहो.

शापित वेदशिरा क्रोध से जलने लगे- छोटी गलती पर बड़ा दंड़ देने को उतारू अश्वशिरा तुम्हारी नीयत ही खोटी है. अपना काम कैसे बन जाए हमेशा यही सोचते रहते हो. दूसरों की संपत्ति पर नजर गड़ाए कौए की तरह डोलते हो. जाओ कौआ हो जाओ.

दो विष्णुभक्तों के बीच बात बढती देख भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हो गए. उनके प्रकट होने से दोनों का क्रोध शांत हुआ. एक दूसरे को शाप देने के बाद दोनों थोड़े लज्जित भी थे.

श्रीहरि ने कहा- तुम दोनों मेरे वैसे प्रिय भक्त हो जैसे किसी इंसान की दो बाहें.मैं अपना वचन तो एक बार झूठा कर दूं पर भक्त का वचन खाली जाए यह नहीं हो सकता इसलिए वेदशिरा को सांप और अश्वशिरा को कौआ बनना ही पड़ेगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.पर तुम दोनों भक्त चिंता न करो. वेदशिरा तुम सांप बनोगे तो तुम्हारे सिर पर मेरे दोनों चरणों की छाप बनी रहेगी जिससे तुम्हें गरुड का भय नहीं रहेगा.

अश्वशिरा तुम कौआ बनोगे ज़रूर पर तुम्हें इस अवस्था में भी इतना ज्ञान मिलेगा कि भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता यानी त्रिकालदर्शी कहलाओगे.

भगवान विष्णु यह कहकर चले गए तब अश्वशिरा मुनि योगींद्र काकभुशुण्डि हो गए. वे वहां से उड़कर नील पर्वत पर जाकर रहने लगे. परम विद्वान तथा रामभक्त बने और गरुड़ को रामकथा उन्हीं ने सुनाई.

उधर दक्ष ने अपनी जो कन्यायें महर्षि कश्यप को सौंपी उन्हीं में से एक कद्रू थीं जिनसे हजारों सर्प जन्मे. इन्हीं सापों में वेदशिरा भी कालिय नाग हो कर जन्मे.

कद्रू की सर्प संतानों में सबसे बड़े थे शेष. इन्हीं शेष से भगवान विष्णु ने कहा- एक तुम्हीं हो जो इस धरती को अपने सिर पर उठाए रख सकते हो. तुम्हें लोगों के हित में यह काम ज़रूर करना चाहिए.

शेष ने कहा- भगवन आपके आज्ञा सिर माथे पर पर मैं इसे कब तक उठाए रखूंगा और धरती को तो मैं उठा लूंगा पर अपना पांव कहां धरूंगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इस पर भगवान विष्णु ने कहा- शेष तुम हर दिन अपने हजार मुंह से मेरे उस एक नाम को जो मेरे गुण बताता हो, कहना. जब सारे नाम खत्म हो जायें समझो तुम्हारा काम पूरा.

तुम धरती को उठा लो मैं कछुआ बन कर तुम्हें धरती समेत आधार दिए रहूंगा. यह सुनकर शेष पाताल के लाख योजन नीचे जा कर धरती को केवल एक फन पर ही उठा लिया. यह देख उनके साथी नाग, अतल, वितल, सुतल, महातल, तलातल और रसातल जहां भी जगह मिली चले गए.

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश

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