श्रमणा के जूठे बेर खा लिए थे श्रीराम ने- आज की रामकथा में शबरी का जीवन परिचय

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भील परिवार में जन्मी शबरी का असली नाम था श्रमणा. श्रमणा बचपन से ही श्रीराम की बड़ी भक्त थी.
वन में उसके निवास के पास ही ऋषिय़ों के आश्रम और गुरुकुल थे. गुरुकल के छात्रों को पूजा-अर्चना करते देख उसने पूजा विधि सीख ली.
श्रमणा को जब भी समय मिलता, भगवान श्रीराम भगवान की पूजा-आरती करती. उसकी भक्ति उसके परिजनों को ज्यादा सुहाती न थी.
बड़ी होने पर श्रमणा का विवाह हो गया. अब वह जिस माहौल से आती थी, जाहिर है विवाह भी वैसे ही परिवार में हुआ.
पति के मन के अनुरूप नहीं मिला. ससुराल के लोग अत्यंत अनाचारी और हिंसक प्रवृति के थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.लूट−मार तथा हत्या के काम में लिप्त रहते. संत स्वभाव की श्रमणा इससे बहुत दुखी रहती और ससुराल से उसे दुत्कार ही मिलती.
उस गन्दे माहौल में श्रमणा जैसी सात्विक स्त्री का रहना बड़ा कष्टकर हो गया था. वह उस माहौल से निकल भागना चाहती थी.
लेकिन समस्या यह थी कि यदि वह घर के घुटन से निकल भी भागी, तो किसके पास जाकर आश्रय के लिए शरण मांगेगी! कहां मिलेगा ठिकाना?
श्रमणा का धैर्य एकदिन जवाब दे गया और वह घर से निकलकर पास के ही मतंग ऋषि के आश्रम में जा पहुंची.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अछूत होने के कारण वह आश्रम के अंदर प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा सकी और वहीं दरवाज़े के पास गठरी−सी बनी बैठ गई.
ऋषि आश्रम में नहीं थे. क़ाफी देर बाद मतंग ऋषि वहां पहुंचे तो श्रमणा को देखकर चौंक पड़े. उन्होंने श्रमणा से आने का कारण पूछा.
श्रमणा ने रोते-रोते बता दिया कि श्रीराम भक्ति के कारण उसका बड़ा निरादर और अपमान हो रहा था इसलिए उसने घर ही छोड़ दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मतंग ऋषि सोच में पड़ गए. लेकिन उसकी रामभक्ति को देखकर उन्होंने श्रमणा को अपने आश्रम में रहने की अनुमति प्रदान कर दी.
श्रमणा के व्यवहार आश्रमवासी बड़े प्रसन्न रहते. वह सबकी प्रिय बन गई. इस बीच जब उसके पति को पता चला कि वह मतंग ऋषि के आश्रम में रह रही है तो वह आग−बबूला हो गया.
श्रमणा को आश्रम से उठा लाने के लिए वह अपने कुछ हथियारबंद साथियों को लेकर चल पड़ा. मतंग ऋषि को इसके बारे में पता चल गया.
श्रमणा भयभीत थी. उसे लग रहा था कि जिस दलदल को छोडकर भागी है दोबारा उसी वातावरण में जाना पड़ेगा.
ऋषि उसका दर्द समझ रहे थे. उन्होंने उसकी रक्षा का वादा किया उसके चारों ओर अग्नि पैदा कर दी.
जैसे ही उसका पति आगे बढ़ा, उस आग को देखकर डर गया और वहां से भाग खड़ा हुआ. इस घटना के बाद उसने फिर कभी श्रमणा की तरफ क़दम नहीं बढ़ाया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.दिन गुजरते रहे. भगवान श्रीराम माता सीता की खोज में मतंग ऋषि के आश्रम में जा पहुंचे. मतंग ने दोनों भाइयों का यथायोग्य सत्कार किया.
मतंग ने श्रमणा को बुलाकर कहा, ‘जिस श्रीराम की तुम बचपन से पूजा करती आ रही थीं, वही राम आज साक्षात तुम्हारे सामने खड़े हैं.
श्रमणा भागकर कंद−मूल लेने गई. कुछ क्षण बाद वह लौटी. उसे बेर के सिवा कुछ और न मिल सका.
भगवान को खाने के लिए वह बेरों को देने का साहस नहीं कर पा रही थी. उसे आशंका थी कि कहीं बेर ख़राब और खट्टे न हों. प्रभु ठहरे राजकुमार. वह ऐसे जंगली बेर क्यों खाएंगे भला.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.अंतर्यामी भगवान सब समझ गए. उन्होंने श्रमणा से कहा- बड़ी भूख लगी है. आपके पास जो बेर हैं वही खाने को दे दो.
संकोच में श्रमणा पके और मीठे बेर चुनने लगी. लेकिन जिसके दर्शन के लिए इतने सालों से आंखे तरस रही थीं उसके चेहरे से नजर हटाने का जी नहीं करता था.
उसने अंजाने में मीठे बेरों का पता लगाने के लिए उन्हें चखना आरंभ कर दिया. जो बेर चखने के बाद मीठे लगते उसे प्रभु को अर्पण कर देती.
भक्तवत्सल श्रीराम भी उसकी सरलता पर मुग्ध थे. वह भी श्रमणा के जूठे बेर खाते रहे.
जब श्रमणा को अहसास हुआ कि उसने भगवान को जूठा खिला दिया है, तो वह यह सोचकर रोने लगी कि इस पाप के लिए उसे नर्क भोगना पड़ेगा.
प्रभु ने उसे चुप कराया और कहा आपने वैसा ही व्यवहार किया है जैसा एक मां अपने बच्चे के साथ करती है.
इस संसार में आपका जीवनकाल पूरा हुआ. अब आप स्वर्गलोक में निवास करें. श्रीराम की कृपा से श्रमणा का उद्धार हो गया.
यही श्रमणा शबरी के नाम से जानी जाती हैं. शबरी के बेर खाकर प्रभु ने जाति-भेद बंधन मिटाने का अच्छा संदेश दिया था.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली
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