शिवपुराणः भस्म, त्रिपुंड और रूद्राक्ष पर क्या कहता है शिवपुराण? इन मंत्रों से घारण करें रूद्राक्ष
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नैमिषारण्य में ऋषियों ने सूतजी से शिवलिंग और शिवलिंग की पूजा के संदर्भ में ज्ञान देने को कहा. हमें ज्ञान दें कि शिवलिंग की प्रतिष्ठा कैसे करनी चाहिए.
शिवलिंग के आकार-प्रकार, परिमाण संबंधित जो भी स्थापित परंपरा उसके बारे में ज्ञान देने के बाद सूतजी ने भस्म और रूद्राक्ष की जानकारी देनी आरंभ की. भस्म धारण करना शिवजी की पूजा का आवश्यक अंग है.
सूतजी बोले- सभी प्रकार के मंगलों को प्रदान करने वाली भस्म दो प्रकार की होती है- महाभस्म और भस्म.
भस्म के भी तीन प्रकार होते हैं- श्रौत भस्म, स्मार्त भस्म तथा सामान्य भस्म. श्रौत और स्मार्त भस्म के प्रयोग का अधिकार केवल साधक ब्राह्मणों को है.
श्रौत और स्मार्त भस्मों को मंत्रों के उच्चारण के साथ ही धारण करना चाहिए. सामान्य भस्म लगाने के लिए मंत्रपाठ करना कोई आवश्यक नहीं.
गाय के गोबर के उपले या कंडे को अग्नि से जलाने से जो भस्म प्राप्त होती है वह आग्नेय भस्म कहलाती है. इसी भस्म से मस्तक पर त्रिपुंड लगाना चाहिए.
स्वयं भगवान शिव, श्रीविष्णु, मां पार्वती तथा लक्ष्मी आदि प्रमुख देवगण एवं देवियां अपने मस्तक पर भस्म धारण किए रहते हैं. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि सभी वर्णों, संकर वर्णों औऱ गर्भवती स्त्रियों को भी अपने मस्तक पर त्रिपुंड लगाने का अधिकार है.
साधक को भस्म लगाते समय मानस्तोक मंत्र का उच्चारण करना चाहिए.
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के लोगों को अपने शरीर के शीर्ष, दोनों कंधों,ललाट, कंठ और वक्ष आदि अंगों, शूद्रों और स्त्रियों को दोनों घुटनों, दोनों पैर, पीठ तथा कमर आदि भागों में भस्म लगाना उचित है.सूतजी बोले- यहां तक कहा गया है कि शरीर पर रूद्राक्ष और मस्तक पर भस्म का त्रिपुंड धारण करने वाला चांडाल भी सबके द्वारा पूज्य हो जाता है क्योंकि रूद्राक्ष और त्रिपुंड के प्रभाव से उसकी निकृष्य वृति का नाश हो जाता है. वह शुद्ध हो जाता है.
त्रिपुंड की महिमा बड़ी प्रभावी है. त्रिपुंड की तीन रेखाएं तीन देवों की प्रतीक हैं. प्रथम रेखा अकारवाची है, यह ऋग्वेद का प्रतिनिधित्व करती है और उसके देवता महादेव हैं.
द्वितीय रेखा उकारवाची है जो यजुर्वेद का प्रतिनिधित्व करती है और उसके देवता महेश्वर हैं. तृतीय रेखा मकारवाची है. वह सामवेद का प्रतिनिधित्व करती है और उसके देवता शिव हैं.
इसके अलावा त्रिपुंड की तीन रेखाओं को क्रमशः उपासना, कर्म और ज्ञान- इन तीन शक्तियों का प्रतीक समझना चाहिए. शिवजी ने विधान कर रखा है कि रूद्राक्ष और त्रिपुंड को धारण करने वालों को यमलोक की यातना भोगनी नहीं पड़ती.
सूतजी बोले- ब्राह्मणों मैंने आपको भस्म और त्रिपुंड के धारण करने की विधि व महिमा बताई जो मैंने अपने गुरू नंदीश्वरजी के मुख से सुनी थी.
सूतजी द्वारा त्रिपुंड और भस्म की महिमा सुनकर वहां उपस्थित सभी तपस्वी धन्य और आनंदित हो गए. उन्होंने सूतजी से रूद्राक्ष की महिमा का बखान करने की विनती की.
सूतजी बोले- ऐसा प्रश्न स्वयं पार्वतीजी ने भोलेनाथ से किया था. पार्वतीजी को शिवजी ने रूद्राक्ष के तेरह प्रकारों का परिचय देते हुए कहा-
रूद्राक्षाः विविधाः प्रोक्तास्तेषां भेदान् वदाम्यहम्।
शृणु पार्वति सद् भक्तया भुक्तिमुक्तिफलप्रदान्।।देवी रुद्राक्षके चौदह भेद हैं.
एकमुख रूद्राक्ष को साक्षात शिव का रूप समझना चाहिए. उसके तो दर्शन होने से ही दुरितों का नाश होता है.
द्विमुखी रूद्राक्ष का नाम देवदेवेश है, जिसके दर्शन से सभी साधन सुलभ हो जाते हैं.
चतुर्मुखी रूद्राक्ष को ब्रह्माजी का प्रतीक समझना चाहिए जिसके दर्शन से चौतरफा फल की प्राप्ति होती है.
पंचमुखी रूद्राक्ष का नाम कालाग्नि है जो पंचानन शिव का प्रतीक है.
षड्मुखी रूद्राक्ष कार्तिकेयजी का प्रतीक है और इसे दाहिनी भुजा में धारण करना चाहिए.
सप्तमुखी रूद्राक्ष का नाम अनंगी है और यह कामदाहक शिव का प्रतीक है.
अष्टमुखी रुद्राक्ष का नाम वसुमूर्ति है और यह भैरवजी का प्रतीक है.
नवमुखी रूद्राक्ष कपिलमुनि का प्रतीक है.
दसमुखी रूद्राक्ष स्वयं भगवान नारायण का प्रतीक है.
एकादश मुखी रुद्राक्ष भगवान रूद्र का प्रतीक है.
द्वादशमुखी यानी बारह मुख वाला रूद्राक्ष भगवान सूर्य का प्रतीक है.
त्रयोदशमुखी यानी 13 मुख वाला रूद्राक्ष विश्वेदेव का प्रतीक है.
चतुर्दशमुखी यानी चौदह मुखी रूद्राक्ष परमशिव का प्रतीक है.रुद्राक्ष के प्रकारों के बारे में बतलाकर शिवजी बोले- देवी रूद्राक्ष में बड़ी शक्ति है. यह पापियों के पाप को नष्ट करने का सामर्थ्य रखता है. इसे धारण
करने से न सिर्फ मनुष्य के पाप कटते हैं बल्कि वह मेरा प्रिय भी हो जाता है.
अब मैं आपको किस रूद्राक्ष को धारण करते समय किस मंत्र का प्रयोग करना चाहिए इसके विषय में बताता हूं.
एकमुखी रुद्राक्ष के लिए- ऊँ ह्रीं नमः
द्विमुखी रूद्राक्ष के लिए- ऊँ नमः
त्रिमुखी रूद्राक्ष के लिए- ऊँ क्लीं नमः
चतुर्मुखी रूद्राक्ष के लिए- ऊँ ह्रीं नमः
पंचमुखी रूद्राक्ष के लिए- ऊँ ह्रीं नमः
षड्मुखी रूद्राक्ष के लिए- ऊँ ह्रीं हुं नमः
सप्तमुखी रूद्राक्ष के लिए- ऊँ हुं नमः
अष्टमुखी रुद्राक्ष के लिए- ऊँ हुं नमः
नवमुखी रुद्राक्षके लिए- ऊँ ह्रीं हुं नमः
दशमुखी रूद्राक्ष के लिए- ऊँ ह्रीं नमः
एकादशमुखी रूद्राक्ष के लिए- ऊँ ह्रीं हुं नमः
द्वादश मुखी रूद्राक्ष के लिए- ऊँ क्रौं क्षौं रौं नमः
त्रयोदशमुखी रूद्राक्ष के लिए- ऊँ ह्रीं नमः
चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष के लिए- ऊँ नमः
इतनी कथा सुनाने के बाद सूतजी बोले- गले में रूद्राक्ष, मस्तक पर त्रिपुंड धारण करने वाले और पंचाक्षर शिवमंत्र- नमः शिवाय का उच्चारण करने वाले को परमपूज्य ही समझना चाहिए.
मुनियों स्वयंमहादेवजी द्वारा भगवती जगदंबा को बताई रुद्राक्ष और भस्म की महिमा मैंने आपसे कही. श्रद्धाभक्तिपूर्वक आप रूद्राक्ष धारण कर स्वयं को कृतकृत्य करें.
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