रावण के पक्ष से युद्ध करने आईं थीं जगदंबाः राम के कमलनयन बनने की कथा
राम कमलनयन क्यों कहे जाते हैं: जब 108वें नीलकमल की जगह श्रीराम ने अर्पित किया अपना नेत्र
प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्तों के मन में प्रायः यह जिज्ञासा उठती है कि राम कमलनयन क्यों कहे जाते हैं और इसके पीछे कौन सी अलौकिक शास्त्रीय घटना जुड़ी है। इसका सीधा संबंध लंका युद्ध के उस रोमांचक प्रसंग से है, जब रावण के पक्ष में स्वयं जगदंबा के आ जाने पर श्रीराम ने 108 नीलकमल से शक्ति पूजा का संकल्प लिया था।
भगवान श्रीराम की वानर सेना और रावण की राक्षस सेना के बीच युद्ध खिंचता चला जा रहा था। श्रीराम के तीव्र आघात से रावण युद्धभूमि में अचेत होकर गिर पड़ा। चेतना लौटने पर उसने भगवती देवी की घोर स्तुति की और सहायता के लिए पुकारा।
देवी ने उसे पूर्व तपस्या के फलस्वरूप वरदान दिया था कि जब भी वह घोर संकट में कातर होकर स्मरण करेगा, वे प्रकट होंगी। आज रावण के लिए उस वरदान का लाभ लेने का अवसर था।
देवी ने जब रावण को दर्शन दिए, तो वह बालकों की भांति बिलख-बिलख कर रोने लगा। उसने देवी की स्तुति कर प्रार्थना की—“हे माता! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी एक अभिलाषा पूर्ण कर दीजिए। मैं आपकी छत्रछाया में युद्ध करना चाहता हूं। आप मेरे रथ पर अपने आशीर्वाद के छत्र समान विद्यमान रहें।”
भगवती अपने दिए वचन से विवश थीं। रावण माता को साथ लेकर रथ पर सवार हुआ और अजेय भाव से ललकारता हुआ रणभूमि में लौटा।

रावण के रथ पर शक्ति के दर्शन और प्रभु श्रीराम की चिंता
भगवान श्रीराम ने जब देखा कि स्वयं आद्याशक्ति रावण के रथ पर विराजमान हैं, तो उन्होंने तुरंत अपना धनुष नीचे रख दिया और माता को प्रणाम किया। शिवा (भगवती) के रावण के पक्ष में खड़े होने से स्वयं श्रीराम भी चिंतित हो उठे।
भगवान ने विभीषण से कहा—“सखे! आज शिवा स्वयं रावण की रक्षा में आ गई हैं। अब तो इसका संहार असंभव है। अब क्या किया जाए?”
श्रीराम दल में चिंता छा गई और स्वर्ग में देवतागण भी व्याकुल हो उठे। यदि भवानी की शक्ति से संपन्न रावण का वध नहीं हुआ, तो यह अवतार अधूरा रह जाएगा। समस्त देवता चिंतित होकर ब्रह्मलोक पहुंचे।
ब्रह्माजी ने उपाय बताते हुए कहा—“गौरी देवी की विशेष आराधना करनी होगी। श्रीराम को स्वयं देवी का अनुष्ठान कर उनसे विजय का आशीर्वाद मांगना होगा।” इसके पश्चात इंद्रदेव के साथ ब्रह्माजी रणभूमि में प्रभु श्रीराम के पास आए और उन्हें शक्ति पूजा का गुप्त विधि-विधान समझाया।
108 नीलकमल की कथा और चंडी अनुष्ठान
रात्रि के अंतिम प्रहर में भगवान श्रीराम ने स्नान कर चंडी देवी का अनुष्ठान आरंभ किया। उन्होंने मिट्टी से देवी की मूर्ति बनाई और विधिपूर्वक स्तुति की। वानर सेना ने भी नृत्य-गान से देवी की आराधना की, परंतु श्रीराम को आत्मिक संतुष्टि नहीं मिली।
उन्होंने विभीषण से परामर्श किया। विभीषण बोले—“प्रभु! भगवती को नीलकमल अत्यंत प्रिय हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए हमें 108 नीलकमल अर्पण करने चाहिए। इससे देवी अवश्य प्रसन्न होंगी।”
समस्या यह थी कि उस समय रणभूमि के समीप नीलकमल मिलना असंभव था। तब पवनपुत्र हनुमानजी आगे आए। विभीषण ने बताया कि ये दुर्लभ कमल केवल सुदूर ‘देवीदह’ सरोवर में खिलते हैं, जहाँ सामान्य गति से पहुंचने में दस वर्ष लग सकते हैं।
हनुमानजी ने कहा—“प्रभु की कृपा से मेरा सामर्थ्य ऐसा है कि मैं इस दूरी को पलभर में पार कर लूंगा।” हनुमानजी तीव्र वेग से उड़े और देवीदह से 108 नीलकमल लेकर तत्काल लौट आए।
जब देवी ने ली परीक्षा: कमलनयन श्रीराम का अद्वितीय समर्पण

भगवान श्रीराम ने दुर्गा स्तुति करते हुए एक-एक करके नीलकमल अर्पित करने आरंभ किए। तभी भगवती ने प्रभु की निष्ठा और भक्ति की परीक्षा लेने के लिए अंतिम कमल अपनी माया से छिपा लिया।
जब 107 कमल चढ़ाने के बाद थाल खाली हो गया, तो श्रीराम ने कहा—“हनुमान! एक कमल कम है।”
हनुमानजी बोले—“प्रभु! मैं देवीदह से पूरे 108 कमल ही लाया था। मेरी गिनती पक्की थी। अवश्य ही यह देवी की कोई परीक्षा है।”
संकल्प खंडित होने की स्थिति में श्रीराम ने एक अद्भुत युक्ति निकाली। उन्होंने लक्ष्मणजी की ओर देखकर कहा—“तुम और मेरे सभी स्नेही मुझे ‘कमलनयन’ (कमल जैसे नेत्रों वाले) कहते हैं। अतः यदि मैं अपना एक नेत्र देवी को अर्पित कर दूं, तो 108 कमलों का संकल्प पूर्ण हो जाएगा।”
प्रभु श्रीराम ने जैसे ही तरकश से तीक्ष्ण बाण निकालकर अपना नेत्र निकालने का प्रयास किया, साक्षात देवी कात्यायनी प्रकट हो गईं।
मां कात्यायनी का वरदान और रावण का त्याग
देवी ने तत्काल प्रभु का हाथ पकड़ लिया और भावविह्वल होकर बोलीं—“त्रिलोकीनाथ! यह क्या कर रहे हैं? आपका संकल्प पूर्ण हुआ। आपके कमलनयन नेत्रों की आवश्यकता इस जगत और आपके भक्तों को है, मुझे नहीं।”
श्रीराम ने विनीत भाव से कहा—“माते! आप जगतजननी हैं। रावण से मेरा कोई व्यक्तिगत वैर नहीं है। मैंने उसके सारे पाप क्षमा करके भूल सुधारने के सभी अवसर दिए। परंतु जानकी की मुक्ति और धर्म की स्थापना के लिए इस पापी का संहार आवश्यक है। आप कृपा कर उस पापी का साथ छोड़ दें।”
देवी कात्यायनी ने मुस्कुराते हुए कहा—“हे कृपानिधान! आप साक्षात परब्रह्म हैं। रावण आपका ही पूर्व सेवक (जय-विजय) रहा है, इसलिए मुझे भी प्रिय था। वह शापवश आपको पहचान नहीं पा रहा। उसके उद्धार के लिए उसका वध अनिवार्य है। मैं अभी रावण का त्याग करती हूं।”
वरदान देकर देवी अंतर्ध्यान हो गईं। इसके पश्चात भगवान श्रीराम ने दसवें दिन विधिपूर्वक पूजन संपन्न कर प्रतिमा का विसर्जन किया और रावण का संहार किया—जिसे आज हम विजयादशमी के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।
भगवान श्रीराम ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को अवतार लिया था। शक्ति की आराधना के पावन मास में प्रभु के अवतार ग्रहण करने के दिन को हम रामनवमी के रूप में मनाते हैं।
(संकलन व संपादनः राजन प्रकाश)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. राम कमलनयन क्यों कहे जाते हैं?
भगवान श्रीराम के नयन कमल के पुष्प के समान अत्यंत कोमल, विशाल और सुंदर थे। इसके अतिरिक्त लंका युद्ध में जब 108वां नीलकमल कम पड़ा, तो उन्होंने पुष्प के स्थान पर अपना नेत्र ही अर्पित करने का निर्णय लिया था, इसलिए उन्हें ‘कमलनयन’ कहा जाता है।
2. लंका युद्ध में श्रीराम ने मां दुर्गा की पूजा क्यों की थी?
रावण ने देवी से संकट के समय रक्षा का वरदान प्राप्त कर लिया था और स्वयं देवी उसके रथ पर उपस्थित थीं। रावण को पराजित करने और अधर्म के नाश के लिए ब्रह्माजी के निर्देश पर श्रीराम ने शक्ति की विशेष आराधना की।
3. हनुमानजी 108 नीलकमल कहाँ से लाए थे?
हनुमानजी 108 दुर्लभ नीलकमल सुदूर स्थित ‘देवीदह’ सरोवर से अपने अलौकिक वेग द्वारा पलभर में लेकर आए थे।
4. रावण वध के बाद विजयादशमी क्यों मनाई जाती है?
नौ दिनों तक शक्ति की साधना करने के पश्चात दसवें दिन भगवान श्रीराम ने रावण का संहार कर धर्म की स्थापना की थी, इसी उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष विजयादशमी (दशहरा) का पर्व मनाया जाता है।
भगवान श्री राम कमलनयन क्यों कहे जाते हैं- आशा है यह पोस्ट आपको पसंद आई होगी। ऐसी ही कुछ और पोस्ट नीचे लिंक से पढ़ सकते हैं.
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