भूत-पिशाचों की बारात में औघड़ दामाद को देख मूर्च्छित हो गईं मैनाः महादेव के परिछन का प्रसंग

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जब महादेव ने पार्वती देवी की पूरी परीक्षा कर ली औऱ विवाह के लिए सहमत हुए तो सप्तर्षियों ने पर्वतराज हिमवान के घर जाकर शिव-पार्वती के विवाह के लिए शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी का निश्चय किया.
लग्नपत्रिका तैयार करके ब्रह्माजी के पास पहुंचा दी गई. महादेव के विवाह में सबको आमंत्रण मिला. समस्त देवता अपने वाहनों पर आरूढ़ होकर शिवजी की बारात के लिए चल पड़े.
शिवगणों ने महादेव का शृंगार किया. जब गण शृंगार करने लगें तो क्या होना था, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. गणों ने शिवजी की जटाओं से मौरमुकुट बना दिया.
गले में कंठाहार की जगह चमकते सर्प डाल दिए. कुण्डल, कंकण पहना दिया और वस्त्र बाघ का चर्म लपेट दिया. वक्ष पर नरमुण्डों की माला और शरीर में भस्म की मालिश हुई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.महादेव के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू धरा दिया. मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा जगमगा रहे थे. गंगाजी, जूट जटाओं में थीं.
शिवजी बैल पर सवार होकर चले. बाजे बज रहे थे. देवांगनाएं उन्हें देखकर मुस्कुराकर कटाक्ष कर रही थीं कि ऐसे वर के योग्य दुल्हन संसार में शायद ही हो.
ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त देवताओं के साथ ही शिवजी के समस्त गण भी बाराती थे. शिवगणों में कोई बिना मुख का था तो किसी के अनेक मुख थे, कोई बिना हाथ पैर का था तो किसी के कई हाथ पैर थे.
किसी की एक भी आँख नहीं थी तो किसी के बहुत सारी आँखें थीं, कोई पवित्र वेशधारण किए था तो कोई बहुत ही अपवित्र वेश धारण किए था. सब मिलाकर प्रेत, पिशाच और योगनियों की फौज चली आ रही थी बारात के रूप में.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.जगत के सभी छोटे बड़े पर्वत, वन, समुद्र, नदियां तालाब आदि हिमाचल का निमंत्रण पाकर उस विवाह में सम्मिलित थे. हिमाचल के नगर को सुन्दरतापूर्वक सजाया गया था. बारात का परछन हुआ और सभी बारातियों को जनवासे में ले जाया गया.
पार्वती की माता मैना दूल्हे के परिछन को आरती की थाल लेकर आईं लेकिन जैसे ही शिवजी पर नजर पडी उनका भयानक वेश देखकर वह बेहोशे होकर गिर गईं.
अचानक हो-हल्ला मच गया. हिमवान आए और पत्नी को उठाकर ले गए. मैना ने जिद पकड़ ली कि वह अपनी परम रूपवती पुत्री का विवाह इस औघड़ से नहीं करेंगी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मैना ने पार्वती से कहा- नारद ने ही तुम्हारी मतिभ्रष्ट की है जो ऐसे भीषण रंग-रूप और लक्षणों वाले वर को पाने के लिए तुमने घोर तप किया. शिव से विवाह का विचार त्याग दो.
पार्वती के माता की बात से दुख हुआ. हिमवान ने मैना को समझाया कि शिवजी का वेष भले ही भयंकर है किन्तु वे स्वयं मंगलदायक हैं.
नारदजी को पता चला कि मैना उन्हें इसका दोषी मानती हैं तो वह आए और उन्होंने पार्वती के पूर्वजन्म में सती होने की बात बताई तब मैना का मन शांत हुआ. मैना हृदय कड़ा करके परिछन को आईं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.महादेव तो आनंद ले रहे थे. उन्होंने सैकड़ों कामदेव के सौंदर्य को झुठलाने वाला रूप धर लिया. मैना ने उन्हें देखा तो देखती रह गईं. उनके मन में शिव के प्रति बहुत दुलार उमड़ा.
जो मैना कुछ पल पहले पुत्री के निर्णय पर पछता रही थीं वही मैना चाहती थीं कि शीघ्र उनकी पुत्री से महादेव का विवाह हो जाए. उन्हें लगा रहा था कि ऐसा रूपवान गुणवान वर पार्वती को कहां मिलेगा.
मैना ने प्रेम से पूरे रीति-रिवाजों से शिव-पार्वती का विवाह कराया और पुत्री को अनेक उपहारों के साथ महादेव के साथ विदा कर दिया.
लेखन व संपादनः राजन प्रकाश
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