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भगवान श्रीरामचंद्रजी ने मां सीता को ही दे दिया दान में

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंमर्यादा पुरुषोत्तम की लीला अपरंपार है. उनके द्वारा सीता जी को दान में देने के पीछे भी एक गहरा संदेश छिपा हुआ था जिसको उन्होंने अपनी लीला और गुरु वशिष्ठ मुनि जरिये समाज तक पहुंचाया.

रावण विजय से लौट आने के बाद की बात है. भगवान श्रीराम ने इस बार बहुत विशाल अश्वमेध यज्ञ किया. इस यज्ञ की पूरी धरती पर चर्चा थी. खूब दान बांटा जा रहा था. उत्साहित हो भगवान ने घोषणा की कि, यदि कोई मुझसे कौस्तुभ मणि, कामधेनु, अयोध्या का राज्य, पुष्पक विमान और यहां तक कि सीता जी को भी दान में मांगेगा तो मैं खुशी खुशी दे दूंगा.

इस घोषणा का प्रचार दूर दूर तक हुआ पर किसी में इतनी हिम्मत या सामर्थ्य कहां कि ऐसी वस्तुएं दान में मांगे. कोई सामने न आया. ठीक राम जन्म के दिन यज्ञ सकुशल संपन्न हो गया. देवताओं ने फूल बरसाये तो नगर निवासियों ऋषि मुनियों और भगवान राम का दर्शन सुख लिया.

अब भगवान श्रीराम द्वारा अपने गुरु को दान देने की बारी थी. भगवान श्रीराम ने चिंतामणि और कमधेनु को श्री वशिष्ठ को देने की घोषणा की. पर वशिष्ठ दान लेने के लिये आगे ही नहीं आये. तो श्रीराम द्वारा उनसे दान स्वीकारने की प्रार्थना की गयी.वशिष्ठ ने कहा, श्रीराम नंदिनी जैसी श्रेष्ठ गाय पहले से ही मेरे पास है यह चिंतामणि तो ठीक पर मैं गोदान में कामधेनु ले कर क्या करूंगा. इससे मेरी तृप्ति नहीं होने वाली. देना ही है तो अपनी घोषणा के मुताबिक ये आभूषणों सहित अपनी सीता का दान दे दो.

वशिष्ठ का इतना कहना था कि वहां हाहाकार मच गया. कोई कहता बूढे वशिष्ठ सठिया गये हैं तो कोई उन्हें पागल बताता. कोई कहता नहीं ये भगवान श्रीराम के धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं. वशिष्ठ सब को दिखाना चाहते हैं कि भगवन राम भी लोगों के सामने अपना आपा खो सकते हैं या फिर वे जो कहते हैं, करते नहीं.

हो हल्ले के बीच ही श्रीराम ने मां सीता को बुलाया, मुस्कुराते हुये भगवान राम ने सीता का हाथ अपने हाथ में लेते हुये कहा, गुरु वशिष्ठ, आप स्त्री दान का उचित मंत्र पढें मैं सीता को दान में देने के लिये तैयार हूं. वशिष्ठ ने मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया.वहां उपस्थित सभी लोग सकते में थे. मंत्र पढने के बाद वशिष्ठ ने सीताजी से कहा कि वे उनके पीछे आ जाये. सीताजी बहुत ही खिन्न मन से गुरु वशिष्ठ के पीछे जा खड़ी हुई. तब श्रीराम ने कहा, गुरुवर अब कामधेनु भी ले ही लीजिये.

वशिष्ठ ने भगवान श्रीराम के इस प्रस्ताव पर उत्तर दिया, श्रीराम मैंने केवल तुम्हारी उदारता और दान देने हिम्मत आंकने के लिये ही यह परीक्षा ली थी. अब यह खेल खत्म हुआ समझो. तुम सीता के भार के आठ गुने के बराबर सोना दे कर सीता को वापस ले लो.

भगवान श्रीराम ने वैसा ही किया और आठ गुना सोना गुरु वशिष्ठ को तुरंत दिलवाया गया. इसके बाद गुरु वशिष्ठ बोले, श्रीराम अब मेरा आदेश सुनो, आज से अब कभी कौस्तुभमणि, कामधेनु, पुष्पक विमान, अयोध्यापुरी का राज्य किसी को भी दान देने का नाम भी मत लेना.

वशिष्ठ ने आगे कहा, पत्नी दान देने की वस्तु नहीं होती इसलिये आगे से सीता को दान देने की सोचना भी मत. इन सब के अलावा ब्राह्मणों को तुम किसी भी चीज का दान कर सकते हो. यदि तुम मेरी इन बातों को नहीं मानोगे तो तुम्हें बहुत कष्ट भोगना पड़ेगा. यह तय है.

गुरु वशिष्ठ ने आठ गुने भार के बराबर सोना और बाकी आभूषण लेकर मां सीता को दो कपड़ों में वहीं तत्काल ही वापस लौटा दिया. इस अवसर पर भारी मात्रा में फूल बरसाये गये और यज्ञ समाप्त हो जाने के बाद के जो भी काम रह गये थे पूरे किए गये.

स्रोत: आनंद रामायण

संकलनः सीमा श्रीवास्तव

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