जानिए ब्रह्माजी के किस घमंड को, श्रीविष्णु ने किया चूर

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जगतपिता ब्रह्मा को जैसा सफेद दाढीवाल वृद्ध देवता की तरह चित्रों में दिखाया जाता है, वह ब्रह्मा हमेशा से वे वैसे न थे. ब्रह्माजी का शरीर भी दूसरे देवताओं सरीखा सुंदर तो था ही साथ-साथ उनमें योगियों, मुनियों जैसी चमक भी थी.
ब्रह्माजी के इस मनमोहक रूप को देखकर स्वर्ग की सबसे सुंदर अप्सरा जिसका नाम मोहिनी था, वह खुद ब्रह्माजी पर मोहित हो गयी. उसके मन में ब्रह्माजी का साथ पाने की बड़ी लालसा थी.
उसने दूर-दूर से कई कोशिशें की पर सब व्यर्थ गए. ब्रह्माजी पर अपने रूप का जादू चलाने के लिए उनके समीप जाना होगा, ऐसा सोचकर एक बार वह ब्रह्माजी के पास जा पहुंची.
ब्रह्माजी समाधि में लीन थे. मोहिनी जानती थी समाधि तोड़ने का मतलब शाप पाना भी हो सकता है. तब लेने के देने पड़ जायेंगे इसलिए वह ब्रह्माजी के समीप ही आसन लगाकर बैठ गई.
समाधि की समाप्ति पर ब्रह्माजी ने जब आंखें खोलीं तो सामने अत्यंत रूपसी मोहिनी को पाया. अचकचा कर पूछा,” देवी! आप स्वर्ग छोड़ यहां आ कर मेरे समीप क्यों बैठी हैं?”हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मोहिनी ने कहा- हे ब्रह्म देव! मेरी बहुत दिनों से इच्छा है कि आपसे प्रेम करूं, अब तो मेरा तन-मन आपके प्रेम की अभिलाषा रखता है. कृपया आप मेरा प्रेम निवेदन स्वीकार करें और मुझे प्रेमदान करें.
ब्रह्माजी भी एक क्षण के लिए मोहिनी के सौंदर्य को देखकर डिगने लगे पर तभी उन्हें प्रभु की याद हो आयी. उनका मन शुद्ध हो गया. उन्होंने स्वयं पर नियंत्रण बनाए रखा.
कुछ देर वह चुप रहे और मोहिनी को कोई उत्तर न दिया. मोहिनी उनके समीप खड़ी होकर प्रतीक्षा करती रही. तब ब्रह्माजी मोहिनी को उपदेश देने लगे कि उसे वासना की इच्छा रखना उचित नहीं है.
ब्रह्माजी उसे उपदेश करने लगे- तप के बल से तुम अपनी इंद्रियों को वश में कर सकती हो. जैसे सभी जीवों की रचना करके भी मैं माया के प्रभाव से अछूता हूं वैसे तुम भी हो सकती हो. हालांकि यह मेरे अलावा किसी अन्य के लिए बहुत कठिन है.
उधर ब्रह्माजी ज्ञान के साथ-साथ कुछ अपनी प्रशंसा भी किए जा रहे थे इधर मोहिनी पर वासना हावी होती जाती थी. आखिर वह अप्सरा ठहरी. उसने ब्रह्माजी को रिझाने के लिए कुछ उत्तेजक भाव-भंगिमाएं बनानी शुरू कीं.
स्वर्ग की अप्सराओं के पास भी सम्मोहन की दिव्य विद्या हैं. मोहिनी ने सभी विद्याओं का प्रयोग आरंभ कर दिया. वह जितना ज्यादा ब्रह्माजी को रिझाने का प्रयास करती ब्रह्माजी उतना ही प्रवचन करते जाते.
जब मोहिनी ने कामदेव, बसंत सबका आह्वान कर ब्रह्माजी पर मोहनी विद्या का प्रयोग करना शुरू किया और उनकी गोद में आ बैठी. ब्रह्माजी भी घबरा गए. वह भगवान श्रीहरि का नाम लगातार जपने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.प्रभु की कृपा से उसी समय सप्तऋषि ब्रह्मलोक को पधारे. सप्तऋषियों ने ब्रह्माजी से सटकर बैठी मोहिनी को देखकर उनसे पूछ ही लिया- यह अप्सरा आपके साथ क्यों बैठी है?
ब्रह्माजी बोले- असल में यह यहां नृत्य कर रही थी. नृत्य करते-करते थक गई थी, तो जरा सुस्ताने के लिए मेरे समीप आ बैठी है. कोई और बात नहीं. मैंने इसे पुत्री भाव से ही देखा है.
सप्तऋषियों से जिस तरह ब्रह्माजी ने बात की उसमें छुपाने वाले भाव के साथ-साथ कुछ अहंकार भी भरा था. सप्तर्षि समझ गए कि कामभावना को नियंत्रण में रखने का ब्रह्माजी को अहंकार हो गया है. अन्यथा उन्हें ऐसा कहने की आवश्यकता ही न थी.
अपने योग बल से वे जान गए कि ब्रह्माजी जो कह रहे हैं बात वैसी है नहीं. वे उनकी घबराहट और इस झूठ पर हंसते हुए वहां से चले गए. ब्रह्माजी द्वारा सप्तर्षियों के समक्ष पुत्री कहने से मोहिनी को बड़ा क्रोध आया.
मोहिनी बोली- मैं आपसे आपका थोड़ा संग साथ, संसर्ग, अपनी काम इच्छाओं की पूर्ति भर चाहती थी और आपने मुझे बेटी कह दिया. आपको अपने संयम पर बड़ा घमंड है.
आपने मेरे सच्चे प्रेम को ठुकराया है, यदि मैं सच्चे ह्रदय से आपसे प्रेम करती हूं तो अब से जगत में आपको कहीं पूजा नहीं जाएगा और आपका घमंड भी जल्द ही हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.मोहिनी पैर पटककर चली गयी तो ब्रह्माजी को अपने अहंकार का बोध और गलती का अहसास हुआ. हो सकता है शाप फलित ही हो जाए. सो तुरंत भगवान विष्णु की शरण में वैकुंठ भागे. थोड़ी ही देर में वह भगवान विष्णु को अपनी कथा सुना रहे थे.
ब्रह्माजी ने अपनी बात शुरू ही की थी कि द्वारपाल ने आकर कहा- प्रभु फलां ब्रह्मांड के अधिनायक षट्मुख (छहमुखी) ब्रह्माजी आपके दर्शन को उपस्थित हुए हैं. प्रभु ने कहा भेज दो. षट्मुख ब्रह्मा आए. स्तुति की आपनी बात कही और चले गए.
वह गये तो ब्रह्माजी ने फिर अपनी कहानी शुरू की पर तब तक द्वारपाल ने किसी अष्टमुख ब्रह्मा के आने की सूचना दी. वह आये और दिव्य स्तुति सुनाई. एक के बाद एक अलग अलग ब्रह्मांड के सह्स्रमुख वाले ब्रह्मा तक वहां आए.
ब्रह्माजी अपनी बात पूरी नहीं कह पाये. सब से निबट कर जब भगवान विष्णु उनकी तरफ मुड़े तो ब्रह्माजी चुप थे. ब्रह्माजी ने देखा उनसे कई गुना योग्य, बुद्धि, विद्द्या, भक्ति, शक्ति सब में बढे-चढे जो भी ब्रह्मा आए बिना किसी अहंकार के सहज सरल थे.
ब्रह्माजी का गर्व गल कर पानी हो गया. भगवान ने कहा अपने गर्व को गंगा में धो डालो. ब्रह्माजी वहां से उठकर चले आए. सर्वश्रेष्ठ तपस्वी और विजितेंद्रिंय होने के घमंड से उपजे पाप को उन्होंने गंगा स्नान कर धो ड़ाला. (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
संकलनः सीमा श्रीवास्तव
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