पिता के आदेश पर एक पुत्र ने कर दिए माता के शव के टुकड़े, दूसरे ने काट दिया अपना शीशः पितृभक्ति की अद्भुत कथा

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंयोगविद्या के बहुत बड़े जानकार और तमाम तरह की सिद्धियां रखने वाले विष्णुभक्त ब्राह्मण शिवशर्मा द्वारका में रहते थे. शिवशर्मा के पांच बेटे थे. यज्ञ, वेद, धर्म, विष्णु और सोम. सभी एक से बढ कर एक पितृभक्त थे.
शिवशर्मा ने अपने बेटों के पितृप्रेम की परीक्षा लेनी का निश्चय किया. शिवशर्मा सिद्ध थे इसलिए माया रचना उनके लिए कोई कठिन बात नहीं थी. उन्होंने माया फैलाई. अगले दिन पांचों पुत्रों की माता बहुत बीमार हो गईं. उनको बहुत तेज बुखार हुआ.
बेटों ने बहुत दौड़ धूप की. वैद्य को दिखाया पर कोई लाभ न हुआ. उनकी माता का देहांत हो गया. बेटों ने पिता से पूछा अब आगे क्या आदेश है. शिवशर्मा को तो बेटों की परीक्षा ही लेनी थी. सो उन्होंने सबसे बड़े बेटे यज्ञ को बुलाया.
उन्होंने यज्ञ से कहा- तुम किसी तेज़ हथियार से अपनी मां के मृत शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर के इधर उधर फेंक दो. यज्ञशर्मा ने एक बार भी न तो इसका कारण पूछा न ही कोई सवाल किया. पिता के आदेश का पालन कर आया.
अब शिवशर्मा ने दूसरे बेटे को बुला कर कहा- बेटे वेद तुम्हारी मां तो अब रही नहीं. मैंने एक बहुत रूपवती दूसरी स्त्री देखी है. मैं उससे विवाह करना चाहता हूं. तुम उसके पास जाओ. उसे किसे भी तरह प्रसन्नकर मुझसे विवाह को तैयार करो.वेदशर्मा तत्काल उस युवती के घर पहुंचा और बताया कि किस तरह उसके पिता उसके प्रेम में हैं. पिता की प्रसन्नता के लिए वह उनसे विवाह कर ले. युवती बहुत नाराज हुई और उसने वेद को फटकारा.
युवती ने कहा- तुम्हारा पिता बुजुर्ग है. दिनभर खांसता रहता है. आयु कितनी शेष है? तुम नौजवान और खूबसूरत हो. तुम अपने पिता की बात छोड़ो, तुम ही मेरे साथ विवाह क्यों नहीं कर लेते!
वेद ने कहा- मेरे मन में आप मेरी मां जैसी हैं. ऐसी अधार्मिक बातें न कहें. हाथ जोड़ता हूं मेरे पिता से विवाह कर लें. वेद ने युवती को बहुत मनाया पर वह न मानी.
आखिर वेद ने कहा- आप मेरी बात मान जाएं. इसके लिए मैं आपके लिए कुछ भी करने को तैयार हूं.
वेद की बात सुनकर स्त्री ने कहा- मेरा मन तो उस खूसट के साथ विवाह कर रहने का नहीं कहता पर मैं तुम्हारे देने की क्षमता का परख के बाद ही निर्णय करुंगी. तुम मुझे इंद्र सहित सभी देवताओं का दर्शन करा दो तो सोचती हूं.वेद ने अपने तपोबल से आह्वान किया तो क्षणमात्र में ही इंद्र समेत सभी देवता वहां मौजूद थे. देवताओं ने वेद से वर मांगने को कहा- वेद ने पिता की चरणों की निर्मल भक्ति मांगी. देवता वर देकर चले गए. वेद ने युवती से कहा- अब घर चलें माता.
युवती बोली- यह तो तुम्हारी तपस्या का बल है जो तुमने दिखा दिया इसे मैं नहीं मानती. मैं तो अपने पिता से प्रति तुम्हारा प्रेम परखना चाहती हूं. मैं तुम्हारे पिता से शादी कर लूंगी अगर तुम उनके लिए अपना सर अपने ही हाथ से काटकर मुझे दे दो.
वेद ने सिर काटकर उस युवती को दे दिया. युवती खून से सना वेदशर्मा का सर लेकर उसके पिता शिवशर्मा के पास पहुंची. वेद के सारे भाई वहीं पर थे. देखते ही बोले- वेद धन्य है जिसका शरीर पिता के काम आया.
शिवशर्मा ने अपने कटा सर तीसरे बेटे को देकर आदेश दिया- तुम अपने भाई को जीवित कर दो. धर्म ने भाइयों को भेज धड़ मंगवाया और धर्मराज को पुकार कर कहा कि अगर मैं सच्चा पिताभक्त हूं तो मेरे भाई की गर्दन जुड़ जाए, वह जिंदा हो जाए.
धर्मराज खुद आए. वेद के सिर को जोड़ा और धर्मशर्मा को पितृभक्ति का वर देकर चले गए. वेदशर्मा जीवित हो उठा. उसने आंखें खोलीं तो वहां न तो उसके पिता थे न वह युवती. बाद में वेद ने धर्म को और धर्म ने वेद को सारी कहानी बतायी.कुछ दिनों बाद शिव शर्मा ने अपने चौथे बेटे से कहा, बेटे विष्णु मैं कुछ दिनों से बीमार सा महसूस कर रहा हूं, सब देख लिया, अमृत के बिना मुझे आराम न आयेगा. तुम किसी तरह स्वर्ग से अमृत ले आओ.
काम कठिन था, विष्णु शर्मा ने योग बल की सहायता ली और स्वर्ग पहुंचे. देवता भला आसानी से अमृत क्यों देने लगे? उन्होंने मेनका को विष्णुशर्मा को रूप जाल में फंसाकर भटकाने को भेजा. मेनका ने कई कोशिशें की पर वह नहीं फंसा.
इंद्र ने इसके बाद कई दूसरी चालें चली. बहुत सारी विघ्न बाधाएं उपस्थित कीं. इस परीक्षा को विष्णु शर्मा ने कैसे पास किया. सबसे कठिन परीक्षा ब्राह्मण ने छोटे बेटे सोमशर्मा की ली. उस परीक्षा को पासकर सोमशर्मा अगले जन्म में भक्त प्रहलाद बना. यह प्रसंग कुछ ही देर में सुनाएंगे.(स्रोत: पद्म पुराण)
अगली कथा पढ़ें- सोमशर्मा ने दी ऐसी कौन सी पितृभक्ति की कठोर परीक्षा जो अगले जन्म में मिला भक्त प्रह्लाद होने का सौभाग्य
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