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दिखावे पर टिकी दोस्ती जानलेवा हो सकती है- प्रेरक कथा

दिखावे पर टिकी दोस्ती जानलेवा हो सकती है- प्रेरक कथा

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक जंगल में पहाड की चोटी पर एक किला बना था. किले के एक कोने के साथ बाहर की ओर एक ऊंचा विशाल देवदार का पेड था. किले में उस राज्य की सेना की एक टुकडी तैनात थी. देवदार के पेड पर एक उल्लू रहता था.

उल्लू भोजन के लिए कीट-पतंगों की तलाश में पास की एक झील के पास की झाडियों में आया करता. झील में हंसों का निवास था. उल्लू पेड पर बैठकर झील को निहारा करता. उसे हंसों का तैरना व उडना मंत्रमुग्ध करता.

वह सोचा करता कि कितना शानदार पक्षी हैं हंस. एकदम दूध-से सफेद, सुराहीदार गर्दन, सुंदर मुख व तेजस्वी आंखें किसी हंस से दोस्ती हो जाए तो जीवन में कुछ सीखने को मिले. एक दिन उल्लू पानी पीने झील के किनारे आया. वहां एक सौम्य हंस तैर रहा था.

उल्लू ने बात करने का बहाना ढूंढा- हंस जी, आपकी आज्ञा हो तो पानी पी लूं, बडी प्यास लगी है. हंस ने चौंककर देखा और बोला- मित्र! पानी प्रकॄति द्वारा सबको दिया गया वरदान हैं. इस पर किसी एक का अधिकार नहीं, खूब पीओ.

उल्लू ने पानी पीया. फिर सिर हिलाया जैसे उसे निराशा हुई हो. हंस ने पूछा- मित्र! असंतुष्ट नजर आते हो, क्या प्यास नहीं बुझी?’ उल्लू बोला- हे हंस! पानी की प्यास तो बुझ गई पर आपकी बातों से ऐसा लगा कि आप नीति व ज्ञान के सागर हैं. मुझमें उसकी प्यास जग गई है, वह कैसे बुझेगी?’

हंस मुस्कुराया- मित्र, आप कभी भी यहां आ सकते हैं. हम बातें करेंगे. इस प्रकार मैं जो जानता हूं, वह आपका हो जाएगा और मैं भी आपसे कुछ सीखूंगा. हंस व उल्लू रोज मिलने लगे.एक दिन हंस ने उल्लू को बताया कि वह वास्तव में हंसों का राजा हंसराज है.

हंस अपने मित्र को निमन्त्रण देकर अपने घर ले गया. शाही ठाठ थे. खाने के लिए कमल व नरगिस के फूलों के व्यंजन और जाने क्या-क्या दुर्लभ खाद्य थे, उल्लू को पता ही नहीं लगा.

बाद में सौंफ-इलाइची की जगह मोती पेश किए गए. उल्लू दंग रह गया. अब हंसराज उल्लू को महल में ले जाकर खिलाने-पिलाने लगा. रोज दावत उडती. उल्लू को डर होता कि किसी दिन साधारण उल्लू समझकर हंसराज उससे दोस्ती न तोड ले.

इसलिए स्वयं को हंसराज की बराबरी का बनाए रखने के लिए उसने झूठमूठ कह दिया कि वह भी उल्लूओं का राजा उल्लूक राज है. एक दिन उल्लू ने दुर्ग के भीतर होने वाली गतिविधियों को गौर से देखा और उसके दिमाग में एक युक्ति आई.

उसने दुर्ग की बातों को खूब ध्यान से समझा. सैनिकों के कार्यक्रम नोट किए. फिर वह चला हंस के पास. उसने हंस से कहा कि चलो आज मेरे साथ, मेरे किले में तुम्हें न्योता है. मैं कई बार आपका मेहमान बना हूं. मुझे भी सेवा का मौक़ा दो.

हंसराज उल्लू के साथ चला. पहाड की चोटी पर बने किले की ओर इशारा कर उल्लू बोला- वह मेरा किला है. हंस बडा प्रभावित हुआ. वे दोनों जब उल्लू के आवास वाले पेड पर उतरे तो किले के सैनिकों की परेड शुरू होने वाली थी. दो सैनिक बिगुल बजाने लगे.उल्लू सैनिकों के रोज के कार्यक्रम को याद कर चुका था इसलिए ठीक समय पर हंसराज को ले आया था. उल्लू बोला- देखो मित्र, आपके स्वागत में मेरे सैनिक बिगुल बजा रहे हैं. उसके बाद मेरी सेना परेड और सलामी देकर आपको सम्मानित करेगी.

रोज की तरह परेड हुई और झंडे को सलामी दी गयी. हंस समझा सचमुच उसी के लिए यह सब हो रहा हैं. गदगद होकर कहा- धन्य हो मित्र. आप तो एक शूरवीर राजा की भांति ही राज कर रहे हो.

उल्लू ने हंसराज पर रौब डाला- मैंने अपने सैनिकों को आदेश दिया हैं कि जब तक मेरे परम मित्र राजा हंसराज मेरे अतिथि हैं, तब तक इसी प्रकार रोज बिगुल बजे व सैनिकों की परेड निकले.

उल्लू को पता था कि सैनिकों का यह दैनिक नियम है. हंस को उल्लू ने फल, अखरोट व बनफशा के फूल खिलाए, उनको वह पहले ही जमा कर चुका था. भोजन का महत्व नहीं रह गया. सैनिकों की परेड का जादू अपना काम कर चुका था.

हंसराज के दिल में उल्लू मित्र के लिए बहुत सम्मान पैदा हो चुका था.

उधर सैनिक टुकडी को वहां से कूच करने के आदेश मिल चुके थे. दूसरे दिन सैनिक अपना सामान समेटकर जाने लगे तो हंस ने कहा- मित्र, देखो आपके सैनिक आपकी आज्ञा लिए बिना कहीं जा रहे हैं.

उल्लू हडबडाकर बोला- किसी ने उन्हें ग़लत आदेश दिया होगा. मैं अभी रोकता हूं उन्हें. ऐसा कह वह ‘हूं हूं’ करने लगा. सैनिकों ने उल्लू का घुघुआना सुना व अपशकुन समझकर जाना स्थगित कर दिया.दूसरे दिन फिर वही हुआ. सैनिक जाने लगे तो उल्लू घुघुआया. सैनिकों के नायक ने क्रोधित होकर सैनिकों को मनहूस उल्लू को तीर मारने का आदेश दिया. एक सैनिक ने तीर छोडा. तीर उल्लू की बगल में बैठे हंस को लगा. वह नीचे गिरा और फडफडाकर मर गया.

उल्लू उसकी लाश के पास शोकाकुल हो विलाप करने लगा- हाय, मैंने अपनी झूठी शान के चक्कर में अपना परम मित्र खो दिया. धिक्कार है मुझे. उल्लू बिलखकर मित्र के लिए रो रहा था. तभी एक सियार उस पर झपटा और उसका काम तमाम कर दिया.

दोनों की जान चली गई. दोनों ही अच्छे जीव थे. छल-कपट से मुक्त लेकिन झूठी शान के दिखावे ने दोनों की जान ले ली. दोस्ती दिखावे के आधार पर नहीं होनी चाहिए. दिखावा और दोस्ती दोनों एक साथ हो ही नहीं सकते.

संबंधों में गहराई अपने आचरण से लाने का प्रयास कीजिए. अगर आपका आचरण अच्छा है तो मित्रता पक्की रहेगी. यदि मित्रता दिखावे के आधार पर टिकी है तो वह चाहे जो भी, मित्रता तो नहीं.

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किसी और के कहने पर विश्वास करने से अच्छा एक बार स्वयं आजमाकर देख लिया जाए. इस लाइन के नीचे प्रभु शरणम् एप्प का लिंक है. उसे क्लिक करके एप्प को देखें फिर निर्णय़ करें. ये एक धार्मिक प्रयास है. एक बार तो इसे देखना ही चाहिए.

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