काश! ये पांच गधे न होते, उन पर लदा सामान न होता, कोई उसका खरीदार न होता…

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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.एक फकीर चले कहीं जा रहे थे. रास्ते में उन्हें एक सौदागर दिखा, जो पांच गधों पर बड़ी-बड़ी गठरियां लादे हुए चला जा रहा था.
गठरियां बहुत भारी थीं, जिसे गधे बड़ी मुश्किल से ढो पा रहे थे. फकीर ने देखा तो उन्हें गधों पर दया आ गई.
उन्होंने सौदागर से प्रश्न किया- अरे सौदागर इन गठरियों में आखिर तुमने ऐसी कौन-सी चीजें रख ली हैं, जिन्हें ये बेचारे गधे ढो नहीं पा रहे हैं?
सौदागर ने जवाब दिया- इन गठरियों में इंसान के इस्तेमाल की चीजें भरी हैं. उन्हें बेचने मैं बाजार जा रहा हूं.
फकीर ने पूछा- वह बात तो ठीक है पर ऐसी कौन-कौन सी चीजें लाद ली हैं कि गधे कराह रहे हैं, जरा मैं भी तो सुनूं तुम्हारे माल के बारे में.
सौदागर ने बताना शुरू किया- यह जो पहला गधा आप देख रहे हैं उस पर जो गठरी लदी है वह अत्याचार की गठरी है.
फकीर ने तौ भौंचक रह गए. उन्होंने पूछा- सौदागर, भला अत्याचार कौन खरीदेगा तुमसे?
सौदागर ने बताया- इसके खरीदार हैं राजा-महाराजा, सत्ता-हुकूमत में बैठे रसूख वाले लोग. काफी ऊंचे दर पर बिक्री होती है अत्याचार की. मोटा मुनाफा होगा मुझे.
फकीर ने आश्चर्य के साथ सुना और गहरी सांस छोड़ेते हुए कहा- ओह हाकिमों में अत्याचार की प्रवृति इतनी ज्यादा बढ़ रही है, ऊपरवाला ही जाने कि क्या होगा आगे. खैर, इस दूसरी गठरी में क्या भरा है?
सौदागर बोला- यह गठरी तो अहंकार से लबालब भरी है.
फकीर ने पूछा- इसे किसके लिए लिए जा रहे हो?
सौदागर बोला- इसके खरीदार है पढ़े-लिखे विद्वान और ज्ञानी. वे इसे लोगों की नजर बचाकर खरीदते हैं. हालांकि वे सभी को इस सामान से दूर रहने की नसीहत करते हैं लेकिन खुद इसे सामर्थ्य से भी ज्यादा खरीदते हैं.फकीर ने सुना तो आश्चर्य में आंखें फटी रह गई. तालीम और शिक्षा से तो मन का अहंकार निकलना चाहिए, यहां तो मामला ही उल्टा है.
बोझिल मन से फिर उन्होंने सौदागर से तीसरे गधे पर लगी गठरी के बारे में पूछा- इसमें क्या लिए जा रहे हो भाई?
सौदागर कुटिल मुस्कान के साथ बोला- इस गधे पर तो जो सामान लदा है वह तो बाजार में उतरते ही हाथो-हाथ बिक जाता है. आप बस यूं समझ लें कि कालाबाजारी हो जाती है इस माल की. मुंहमांगे दाम पर बिकता है.
इस गधे पर ईर्ष्या की गठरी लदी है, महाराज. बहुत डिमांड में है मेरा यह माल. कई बार तो इसे मैं गधे पर से उतार भी नहीं पाता. बिना उतरे ही बिक जाता है यह माल, इतनी मांग है इसकी.
फकीर ने पूछा- इसे कौन खरीदता है?
सौदागर बोले- इसके ग्राहक हैं ऐसे धनवान लोग, जो एक दूसरे की तरक्की को बर्दाश्त नहीं कर पाते.
ईर्ष्या के लिए ऐसी लूट पड़ी है संसार में! फकीर के चेहरे पर उदासी के भाव थे. उनकी इच्छा अन्य गठरियों के बारे में जानने की भी हुई.
फकीर ने पूछा- अच्छा! चौथी गठरी में क्या है भाई, यह भी बता दो?
सौदागर ने कहा- इसमें बेईमानी भरी है.
फकीर- इसकी तलब किसे ज्यादा है, भाई?
सौदागर ने कहा- इसके ग्राहक हैं वे कारोबारी, जो बाजार में धोखे से की गई बिक्री से काफी फायदा उठाते हैं. इसलिए बाजार में इसके भी खरीदार तैयार खड़े हैं. इस माल को बेचने के लिए मुझे बड़ा होशियार रहना पड़ता है. बहुत ज्यादा चतुराई दिखानी पड़ती है नहीं तो लेने-देने के पड़ जाएं.
फकीर ने पूछा- ऐसा क्यों?
इसके खरीदार धोखे से ज्यादा ले जाने या चुरा लेने की फिराक में रहते हैं. क्या जमाना आ गया है बेईमानी का काम करते हैं और बेईमानी को खरीदने में भी बेईमानी को तैयार रहते हैं- सौदागर ने बताया.
फकीर के चेहरे के भाव विचारशून्य हो चुके थे.चार गधों पर लदे माल के बारे में सुनकर उनके चेहरे की रंगत गायब थी. कभी ऊपर भगवान की ओर देखकर कुछ दुआ मांगते कभी सामने देखने लगते सौदागर के गधों को, उन पर लदे माल को.
हिम्मत करके उन्होंने पूछा- सौदागर यह भी बता ही दो कि इस अंतिम गधे पर कौन सी खुराफ़ाती चीज लादकर बेचने को लिए जा रहे हो?
सौदागर ने भी फकीर के भाव भांप लिए थे. उसे खुराफाती शब्द शायद जमा नहीं.
उसने उनमें थोड़ी हिम्मत देते हुए जवाब दिया- आप इतने निराश न हों. दुनिया ऐसी ही हो गई है. इस पांचवीं गठरी के बारे में जानेंगे तो आपको खुशी होगी कि आपने परिवार नहीं बसाया.
इस गधे पर लदी चीज को आप खुऱाफाती कह सकते हैं पर इसके खरीदार इसे करामाती चीज मानते हैं.
फकीर ने कहा- अब पहेलियां बुझाना छोड़ो और बता भी दो कि ऐसा क्या लाद रखा है?
सौदागर ने आंखों में धूर्तता के भाव भरकर बताया- इस गधे पर छल-कपट से भरी गठरी रखी है. इसकी मांग वैसे तो आदमी-औरत, नौजवान, अधेड़, बूढ़े, अमीर-गरीब हर तबके, हर उम्र के लोगों में है पर उन औरतों में इसकी मांग बहुत ज्यादा है जिनके पास घर में कोई काम-धंधा नहीं हैं.
जो छल-कपट का सहारा लेकर दूसरों की लकीर छोटी कर अपनी लकीर बड़ी करने के दांव-पेंच में लगी रहती हैं. इस फेर में घर जहन्नुम बना है और मजे की बात ये कि वे न तो इस बात को समझेंगी और न स्वीकारेंगी.
फकीर के लिए तो यह सचमुच में एक रहस्योद्घाटन ही था. परिवार में यह दशा हो गई है अब!
अब तक प्रश्न फकीर पूछ रहे थे और सौदागर उसका जवाब दे रहा था. अब एक प्रश्न सौदागर के भी दिमाग में आ गया.हालांकि फकीर की उदासी देखकर उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी फिर भी उससे रहा न गया.
सौदागर ने कहा- मैं तो इन चीजों का कारोबारी हूं इसलिए मुझे इनसे फर्क नहीं पड़ता. आप महात्मा-फकीर हैं इसलिए यह सब सुनकर आप दुखी और निराश हैं जो कि स्वाभाविक ही है.
मेरी आपसे विनती है कि आप अपना दिल छोटा न करें, दुनिया ऐसे ही चल रही है. न आप बदल सकते हैं इसे न मैं. मैं भी एक सवाल आपसे पूछना चाहता हूं. क्या मैं पूछ सकता हूं?
फकीर ने सामान्य होने का प्रयास करते हुए कहा- पूछो.
सौदागर ने पूछा- क्या ऊपरवाले ने दुनिया ऐसी ही बनाई थी. मेरे कहने का मतलब है कि जब वह दुनिया बना रहे थे तो क्या उन्होंने सोचा था कि ऐसी दुनिया बन जाएगी. अगर वह जानते थे फिर भी बना दिया तो यह काम शायद ठीक नहीं रहा.
फकीर ने बताना शुरू किया- नहीं मेरे भाई. ऊपरवाले ने नहीं, यह दुनिया तो हमने ऐसी बना दी है.
ऊपरवाले ने तो सबको छोटे से बच्चे के रूप में भेजा. उसे धरती पर भेजने से पहले कहा कि तेरे लिए बहुत अच्छी-अच्छी चीजें धरती पर छोड़कर आया हूं. उसे सहेजना, संभालना और उसका आनंद लेना.
बच्चा ईश्वर को छोड़कर आना नहीं चाहता था फिर भी भगवान की जिद पर आना पड़ा.
उसे तो यह पता न था कि उसकी जात क्या है, धर्म क्या है, कुल-खानदान क्या है. उसे तो दुनिया में भेजा गया कि जो नदी, झरने, जंगल, पहाड़, फल-फूल जैसे ढेरों सुंगर चीजों से सजाकर जो धरती बनाई है उसपर आनंद करेगा.
जाते समय ईश्वर ने कहा- तू रोना मत तेरे लिए को मैं धरती पर वे सारी चीजें रखकर आया हूं जो स्वर्ग में देवताओं को भी आसानी से नहीं मिलता. जी भरके आनंद करना. लेकिन वह बच्चा बोलने के काबिल हुआ तो उसे बता दिया जाता है कि ये तेरे अपने, वे तेरे पराए.
थोड़ा बड़ा हुआ तो बता दिया ये तेरा अपना धर्म, वो तेरा दुश्मन धर्म.
समझने के काबिल हुआ तो उसने वह सारा सामान अपने घर में चारों तरफ पड़ा देखा जो तुम इन गधों पर लादकर बेचने लाए हो. उसे लगने लगा कि शायद इसी सामान का आनंद लेने की बात ईश्वर ने कही थी. उसके बाद बताने की जरूरत ही नहीं.सौदागर सारी बात अब समझ गया था.
अब फकीर मुस्कुराता हुआ मस्ती में चला जा रहा था और सौदागर के मन के भाव बदले हुए थे.
सौदागर को महसूस हो रहा था जैसे उसके मन का बड़ा बोझ उतरा है. वह मानसिक सुकून महसूस कर रहा है, एक अलग ही दिव्य संसार में पा रहा था खुद को.
सोच रहा था कि किन चक्करों में था वह अब तक. यह फकीर उसे पहले क्यों नहीं मिला?
ऐसे तरह-तरह के भाव आ ही रहे थे कि तभी उसके ग्राहक उसके पास आते दिखे और एक मिनट में उसका वह भाव गायब हो गया.
अब वह फिर से पुराने वाले आनंद में लौट आया था. गधों पर लदा सामान पहले से ज्यादा मुनाफे में बेच रहा था. दुखी होने की बारी फिर से फकीर की ही थी.
सौदागर के मन में आए ये भाव ही आध्यात्म का प्रभाव हैं. जब हमें फकीर के रूप में आध्यात्म और धर्म का ज्ञान मिलता है तो जीवन का मूल्य समझ में आता है. पर यह भाव टिकते नहीं तुरंत निकल जाते हैं क्योंकि हम इस चक्रव्यूह में फंसे रहने के आदी हो गए हैं.
-राजन प्रकाश
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