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शिवभक्त अप्सरा को था शाप, शिव के अंश को जन्म देने से हुई शाप से मुक्ति

शिवभक्त अप्सरा को था शाप, शिव के अंश को जन्म देने से हुई शाप से मुक्ति

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंब्रह्मा का कार्यालय बहुत बड़ा था. पूरी सृष्टि के रचने, बनाने का काम काज यहीं से चलता था. स्वर्ग में स्थित उनके महल में उनका दरबार भी बहुत बड़ा था. दरबार में अप्सरा सेविकाएं भी हजारों की संख्या में थीं.

इन्हीं सेविकाओं में से एक अप्सरा थीं पुंचिकस्थला. पुंचिकस्थला निष्ठावान और काम के प्रति बड़ी ईमानदार थी. एक दिन उनकी असाधारण सेवा से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें मनचाहा वरदान मांगने को कहा.

अप्सरा ने सकुचाते हुए कहा कि उस पर एक तपस्वी साधु का श्राप है. यदि वरदान स्वरूप मुझे उस श्राप से मुक्ति मिल जाये तो. ब्रह्माजी ने उस श्राप के बारे में पूछा तो अंजना ने एक पुरानी कहानी बताई.

अंजना ने कहा- बाल्यकाल की बात है. मैं वन में घूम रही थी. बचपन की शरारत में एक सुनसान जगह पर मैंने एक वानर को तपस्या करते देखा. मेरे लिए यह एक बड़ी अचरज वाली बात थी.

नासमझी में मैंने मजाक मजाक में ही उस तपस्वी वानर पर फल फेंकने शुरू कर दिए. मुझे क्या पता था वह कोई आम वानर नहीं बल्कि एक तपस्वी साधु हैं जो वानर रूप में तप कर रहे हैं.

मेरे इस कार्य से साधु की कठोर तपस्या भंग कर दी थी. तपस्वी बहुत ज्यादा क्रोधित हो गये. उन्होंने मुझे शाप दे दिया कि जब भी मुझे किसी से प्रेम होगा तो मैं बंदरिया बन जाऊंगी.छोटी होने पर भी बंदरिया होने का मतलब और साधु के श्राप का अर्थ तो समझती ही थी. खूब गिड़गिड़ाई तो उस साधु ने कहा कि मेरा चेहरा बंदरिया जैसा होने के बावजूद मेरे प्रेमी का प्रेम मेरी तरफ कम नहीं होगा.

कहानी सुनाने के बाद अंजना ने ब्रह्माजी से कहा कि अगर आप मुझे इस शाप से मुक्ति दिलवा सकें तो बड़ी कृपा होगी यही मेरे लिए आपका वरदान होगा. ब्रह्माजी ने कहा कि इस शाप से मुक्ति पाने के लिए तुम्हें भगवान शिव के अवतार को जन्म देना होगा.

ब्रह्माजी ने सुझाया- तुम धरती पर जाकर वास करो. जहां तुम्हारा नाम अंजना होगा. तुम अपने पति से मिलोगी और शिव के अवतार को जन्म दोगी. उसके बाद तुम्हें इस शाप से मुक्ति मिल जाएगी.

ब्रह्मा की बात मानकर पुंचिकस्थला धरती पर चली आईं और अंजना के रूप में रहने लगीं. शिकारी के रूप में अकेले ही घने वन में निवास करने लगीं. एक दिन जंगल में उन्होंने एक बड़े बलशाली युवक को निहत्थे ही खूंखार शेर से लड़ते देखा.

अंजना उस बलिष्ठ युवक को देख उसके प्रति आकर्षित होने लगीं. शेर से निबटने के बाद उस व्यक्ति की नजरें अंजना पर पड़ीं, अंजना का चेहरा तत्काल ही बंदरिया जैसा हो गया.

अब तो अंजना जोर-जोर से रोने लगीं, उनका रोना सुन वह बलवान युवक उनके पास आया और उनकी दुःख और पीड़ा का कारण पूछा तो अंजना ने अपना चेहरा छिपाते हुए बताया कि वह क्षणॅ भर पहले ठीक थीं पर अचानक ही कुरूप हो गई हैं.उस शक्तिशाली युवक द्वारा ढाढस बंधाने पर अंजना ने चेहरे से हाथ हटा कर आंखें खोलीं तो देखा कि उस बलशाली युवक को उन्होंने दूर से देखा था तो वह मानव सरीखा ही लग रह था.

अब जब उसने उस व्यक्ति को अपने पास देखा तो लगा कि कि उसका चेहरा भी वानर जैसा ही था. महाबलशाली युवक ने परिचय बताते हुए कहा कि वह कोई और नहीं वानरराज केसरी हैं जो जब चाहें इंसानी रूप में आ सकते हैं.

अंजना का वानर जैसा चेहरा उन दोनों को प्रेम करने से नहीं रोक सका और जल्द ही जंगल में रहते हुये वानरराज केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया. केसरी और अंजना दोनों भगवान शिव के भक्त होने के कारण अधिकतर अपने आराध्य की तपस्या में लीन रहते थे.

तपस्या से प्रसन्न होकर एक दिन भोले बाबा ने उन्हें वरदान मांगने को कहा. अंजना ने शिव को कहा कि साधु के श्राप से मुक्ति पाने के लिए मुझे शिव के अवतार को जन्म देना है, इसलिए आप बालक के रूप में उनकी कोख से जन्म लें.शिवजी वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए. बहुत दिन बीतने के बाद एक दिन अंजना जंगल में भगवान शिव की आराधना कर रही थीं, उसी समय कहीं दूर महाराज दशरथ, अपनी तीन रानियों के साथ पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे.

अग्निदेव ने शृगी ऋषि के माध्यम से उन्हें दैवीय ‘पायस’ दिया जिसे तीनों रानियों को खिलाना था लेकिन इस दौरान पक्षी उस पायस की कटोरी पर आ बैठा, हालांकि उसने पायस जूठा नहीं किया और तुरंत उड़ गया पर थोड़ा सा पायस उसके पंजों में लग गया.

वह पक्षी उड़ा और उस जंगल में जा पहुंचा जहां तपस्या में लीन अंजना बैठे थीं. आरधना के अंत में अंजना ने प्रभु के आगे हाथ फैलाये ही थे कि पक्षी के पंजों में लगा पायस उसमें टपक गया.

अंजना ने भगवान से मांगे जाते समय गिरे इस पायस को शिव का प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लिया. कुछ ही समय बाद उन्होंने वानर मुख वाले एक स्वस्थ बालक को जन्म दिया जो हनुमान कहलाए.

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश

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