Advertisement728 × 90

इंद्र का भोग, विश्वकर्मा के लिए रोगः कर्मों का खेल निराला है.

इंद्र का भोग, विश्वकर्मा के लिए रोगः कर्मों का खेल निराला है.


प्रभु शरणं के पोस्ट की सूचना WhatsApp से चाहते हैं तो अपने मोबाइल में हमारा नंबर 9871507036 Prabhu Sharnam के नाम से save कर लें। फिर SEND लिखकर हमें उस नंबर पर whatsapp कर दें।

जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।इंद्र ने एक बार घमंड में भरकर ऐसा सभागार बनवाने का निर्णय लिया जैसा कभी किसी ने न बनवाया हो. तुरंत देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा को काम में लगा दिया गया.

सभागार बनने लगा. विश्वकर्मा काम पूरा कर इंद्र को निरीक्षण के लिए बुलाते तो इंद्र कुछ न कुछ मीनमेख निकाल देते और फिर नए सिरे से काम करने का आदेश दे देते.

इस कारण विश्वकर्मा का काम लगातार सौ साल तक चला लेकिन भवन पूरा ही न हो सका.

भगवान विश्वकर्मा को इन सौ सालों से एक भी छुट्टी नहीं मिल सकी. विश्वकर्माजी परेशान होकर ब्रह्माजी के पास पहुंचे और परेशानी बताई. ब्रह्माजी इंद्र के इस आचरण से चिंतित और दुखी हुए.

विचार करने लगे कि क्या किया जाए. फिर उन्होंने विश्वकर्माजी से सका- पुत्र चलो श्रीहरि के पास चलते हैं. उनसे ही कोई निदान निकालने को कहते हैं जिससे इंद्र की बुद्धि सुधरे.

ब्रह्माजी और विश्वकर्माजी क्षीर सागर पहुंचे.वहां पहुंचकर विश्वकर्मा ने सारी बात विस्तार से कह सुनाई. विश्वकर्माजीके साथ यह बुरा व्यवहार सुनकर श्रीहरि को भी कष्ट हुआ. ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु से इसका समाधान निकालने को कहा.

विष्णुजी ने सारी बात सुनने के बाद तय किया कि इंद्र को देवराज होने का घमंड होता जा रहा है. देवराज के लिए तो यह अशोभनीय है.

बिना उनका अहंकार नष्ट किए बिना बात नहीं बनेगी. भगवान श्रीहरि ने ब्रह्माजी और विश्वकर्माजी से कहा कि आप चिंता न करें. मै शीघ्र ही इसका निदान कर दूंगा.

दोनों भगवान से मिले इस वचन के बाद अनुमति लेकर प्रसन्न मन से चल पड़े.

श्रीभगवान ने बटुक यानी छोटे ब्राह्मण बालक जो शिक्षा ग्रहण के लिए गुरूकुल जाते हैं. बटुक बनकर श्रीहरि इंद्र के पास गए.

उन्होंने इंद्र से कहा- हे देवराज मैं आपके अद्भुत भवन के निर्माण की प्रशंसा संसार में दूर-दूर तक फैली है. मैंने भी इसे सुना तो रोक न पाया और इसके बारे में जानने चला आया हूं.

हे देवराज, क्या आप बता सकते हैं कि यह भवन कुल कितने विश्वकर्मा मिलकर तैयार कर रहे हैं और यह पूरी तरह बनकर कब तक तैयार हो जायेगा?

इंद्र ने उपहास की मुद्रा में कहा- यह भी कोई प्रश्न हुआ? क्या विश्वकर्मा भी दो-चार हुआ करते हैं?इस उपहास के उत्तर में बटुक बने श्रीभगवान जोर से हंसे और फिर बोले- इतने से घबरा गए देवेंद्र? इसका अर्थ है आप अभी पूरे ब्रह्मांड से परिचित ही नहीं हैं.

न जाने कितने ब्रह्मांड हैं और उसमें न जाने कितनी तरह की सृष्टि. उस सृष्टि में न जाने कितने ब्रह्मा, विष्णु महेश.

इंद्र के कुछ समझने से पूर्व बटुक ने कहा- देवराज आप धरती के धूलकण गिन सकते हैं पर इंद्र और विश्वकर्मा की गिनती नहीं हो सकती. जैसे नदी में नौकाएं तैरती हैं वैसे ही महाविष्णु के रोमकूप के बीच जो पानी है उसमें तमाम ब्रह्मांड तैरते हैं.

बटुक रूपी भगवान का यह प्रवचन चल ही रह था कि तभी वहां कतार लगाए हुए चींटे गुजरे. बटुक और इंद्र ने भी उसे देखा.

चींटों को देखकर बटुक हंसने लगे. इंद्र ने कहा- अब क्या हुआ, चींटों को देखकर क्यों हंस रहे हो ब्राह्मण कुमार?

बटुक ने कहा- आप जिन चींटों को देख रहे हैं कभी ये भी इंद्र हुआ करते थे परंतु आज कर्मों के हिसाब से इन्हें यह योनि भुगतनी पड़ रही है.

कर्मों का भी खेल निराला है. ये भगवान को इंसान और इंसान को श्वान बना दें.बात आगे बढती कि तभी वहां एक बहुत बुजुर्ग मुनि सिरपर चटाई ओढे, माथे पर सफेद तिलक लगाए आ पहुंचे.

शरीर तो जर्जर हो गया था लेकिन उनका मुख तेज के कारण चमक था. उनके सीने पर बालों का एक चक्राकार गुच्छा था.

इंद्र ने मुनि को नमस्कार कर बैठने का स्थान दिया. बटुक ने पूछा- हे महामुने आप कौन हैं? यह आपके सीने पर बालों का ऐसा विचित्र सा गुच्छा क्यों हैं? आप जैसे तेजस्वी मुनि ने यह सिर पर चटाई क्यों ओढ रखी है?

मुनि बोले- बटुक, जीवन के असंख्य बरस बीत जाने पर भी मैंने न तो कोई रहने का ठिकाना बनाया, न विवाह करके घर बसाया और न ही कोई आजीविका खोजी. अब मैं धूप, बारिश, सर्दी सबसे बचने के लिए हमेशा ही यह चटाई ओढकर चलता हूं.

मेरे सीने पर बालों का जो गुच्छा है इसके कारण मुझे लोमश कहते हैं.यही मेरी आयु का प्रमाण भी है. एक इंद्र के पतन होने पर सीने का एक रोआं गिर जाता है. दो कल्प समाप्त होने पर पिछले कल्प के जब सारे ब्रह्मा खत्म हो जाएंगे तब मेरा भी अंत हो जाएगा.

लोमश कहते रहे- बटुक, सबको जाना है. असंख्य ब्रह्मा आए और गए फिर मैं घर, पत्नी, संतान, धन की इच्छा क्यों करुं? भगवत प्राप्ति ही मेरे लिए संपत्ति और मोक्ष का मार्ग है. यह कहकर लोमश मुनि अंतर्धान हो गए. बटुक भी चले गए.इंद्र सन्नाटे में खड़े यह सोचते रहे कि जिसकी इतनी लंबी उम्र है वह एक घास फूस का घर भी नहीं बनाते, चटाई ओढे जीवन गुजारते हैं और मैं इतना बड़ा भवन बनवा रहा हूं. उन्हें अपने निर्णय पर पछतावा हुआ.

इंद्र ने तत्काल विश्वकर्मा को बुलवाया. क्षमा प्रार्थना के साथ काफी धन देकर कार्य को रोकने का अनुरोध किया. बटुक और लोमश की बातें सुनकर इंद्र का मन विरक्त हो उठा. स्वर्ग के ऐश्वर्य से उन्हें घबराहट होने लगी. उन्हें अपना अगला जीवन चींटे का दिखने लगा.

सोच विचारकर इंद्र ने वन में रहकर तप का निर्णय किया. वह अपने आलीशान महल से निकले ही थे कि देवताओं के गुरु वृहस्पति उन्हें मिल गए.

बृहस्पति ने सारी बात सुनी फिर उन्हें समझा कि आपके द्वारा किए जा रहे अनुचित कार्य से क्षुब्ध श्रीहरि ने आपको शक्तियों का आभास कराया है.

श्रीहरि यह नहीं चाहते कि आप काम-काज छोड़कर विरक्त हो जाएं बल्कि सही तरीके से इसका संचालन करें.

उन्होंने समझा-बुझाकर फिर से राज-काज में लगा दिया.

संसार में ऐश्वर्य की सीमा नहीं. मनुष्य अपने थोड़े से सामर्थ्य को देखकर ही फूल कर कुप्पा हो जाता है. उसे लगता है कि वह चाह ले तो क्या न कर ले.

यह आत्मविश्वास तब तो अच्छा है जब वह किसी सकारात्मक सोच और उद्देश्य के साथ बढ़े परंतु यदि उसकी सोच सही नहीं रही तो पतन का कारण भी बन जाती है. भगवान बहुत साधारण रूप में आकर उसे उसकी हैसियत का अहसास करा देते हैं. यह क्षण बहुत पीडादायक होता है.

होशियार व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी बुद्धि को नियंत्रण में ही रखे अन्यथा घमंड तो देवराज का भी नहीं चलता.
(स्रोत: ब्रह्मवैवर्त पुराण)

संकलनः सीमा श्रीवास्तव
संपादनः राजन प्रकाश

मित्रों हम खोज-खोजकर धार्मिक, आध्यात्मिक और प्रेरक कहानियां लेकर आते हैं. आप फेसबुक के माध्यम से यहां तक पहुंचते हैं. आपको सरल रास्ता बताता हूं एक साथ ऐसी धार्मिक और प्रेरक कई सौ कहानियां पढ़ने का.

आप प्रभु शरणम् का एप्प ही डाउनलोड कर लें. प्रभु शरणम् हिंदू धर्मग्रंथों के प्रचार का एक धार्मिक अभियान है. धर्मग्रंथों से जुड़े गूढ़ ज्ञान से परिचित होना है तो प्रभु शरणम् का एप्प डाउनलोड कर लेना ज्यादा सरल विकल्प है. इसका लिंक नीचे दिया गया है.

अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रश्नावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.

Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें

ये भी पढ़ें-
कब देवता हो जाता है इंसान.

उनते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहिः यह आदत भगवान को भी पसंद नहीं

श्रीविष्णु को बार-बार क्यों लेना पड़ा है मानव अवतार, हर अवतार में क्यों सहते हैं विरह वेदना

महालक्ष्मी ने क्यों धरा बेलवृक्ष का रूप, शिव ने क्यों मान बिल्ववृक्ष को शिवस्वरूप

error: Content is protected !!