शनिवार के व्रत की कथा- शनि अमावस्या पर इसका पाठ करना उत्तम है.

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एक बार सूर्य, चंद्रमा, मंगल,बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहू, केतु इन सब ग्रहों में आपस में विवाद हो गया कि हममे से सबसे बड़ा कौन है. सब अपने को श्रेष्ठ बताते थे. जब आपस में कोई निर्णय नहीं हो सका तो वे देवराज इंद्र के पास पहुंचे. सभी ने इंद्र से यह निर्णय करने को कहा कि नवग्रहों में श्रेष्ठ कौन है.
इंद्र इस प्रश्न से असमंजस में पड़ गए. उन्होंने अपनी बला टालते हुए कहा- मुझमे यह सामर्थ्य नहीं है कि मै ग्रहों में से किसी के छोटा या बड़ा होने का निर्णय कर सकूँ. धरती पर सर्वश्रेष्ठ परमार्थी राजा विक्रमादित्य जो दूसरों के कष्टों का निवारण करने वाले है. आप सब उनके पास जाएं. शायद वह इसका निवारण कर सकें.
सभी ग्रह-देवता देवलोक राजा विक्रमादित्य की सभा में उपस्थित हुए और अपना प्रश्न राजा के सामने रखा.
राजा विक्रमादित्य ग्रहों की बाते सुनकर गहन चिंता में पड़ गए. वह भी निर्णय नहीं कर पा रहे थे कि किसे छोटा और किसे बड़ा कहें. उन्हें भय था कि जिसे वह छोटा कहेंगे उसके क्रोध का शिकार बनना पड़ेगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
झगडा निपटाने के लिए विक्रमादित्य ने एक उपाय सोचा. उन्होंने सोना, चाँदी, कांसा, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लोहा नौ उत्तम धातुओं के नौ आसन बनवाए. सभी आसनों को उनके मूल्य के क्रम में बिछाया गया. जैसे सोने के आसन को सबसे पहले और लोहे के आसन को सबसे पीछे बिछाया गया.
राजा ने सब ग्रहों से अपना-अपना आसन ग्रहण करने को कहा. जिसका आसन सबसे आगे, वह सबसे बड़ा और जिसका आसन सबसे पीछे वह सबसे छोटा. क्योकि लोहा सबसे पीछे था और शनिदेव का आसन था इसलिए शनिदेव ने समझ लिया कि राजा ने मुझे सबसे छोटा बना दिया है.
इसपर शनिदेव बहुत क्रोधित हुए. उन्होंने कहा- राजा तू मुझे नहीं जानता. सूर्य एक राशि पर एक महीना, चन्द्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेढ़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, बुध और शुक्र एक-एक महीने के लिए विचरण करते हैं लेकिन मैं एक राशि पर ढाई वर्ष से लेकर साढ़े सात वर्ष तक रहता हूँ. बड़े बड़े देवताओं को भी मैंने भीषण दुःख दिया है. राजन सुनो! श्रीरामचन्द्रजी को भी साढ़े साती आई और उन्हें वनवास हो गया. रावण पर आई तो राम ने वानरों की सेना लेकर लंका पर चढाई कर दी और रावण के कुल का नाश कर दिया. हे राजन! अब तुम सावधान रहना.
राजा विक्रमादित्य ने कहा- जो भाग्य में होगा, देखा जायेगा. इसके बाद अन्य ग्रह तो प्रसन्नता से अपने अपने स्थान पर चले गए परन्तु शनिदेव नाराज होकर गए.कुछ समय बाद जब विक्रमादित्य पर साढ़े साती की दशा आई तो शनिदेव घोड़ों के सौदागर बनकर अनेक घोड़ो सहित राजा की राजधानी में आए. जब राजा ने घोड़ों के सौदागर के आने की बात सुनी तो अपने अस्तबल की देखभाल करने वाले को अच्छे अच्छे घोड़े खरीदने को कहा. एक अच्छी नस्ल के घोड़े पर मुग्घ होकर राजा उसकी सवारी के लिए चढ़े.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
राजा के पीठ पर बैठते ही घोडा तेजी से भागा. घोड़ा राजा को दूर एक घने जंगल में ले गया और वहां राजा को छोड़कर अंतर्ध्यान हो गया. इसके बाद राजा विक्रमादित्य अकेले जंगल में भटकते फिरते रहे. भूख-प्यास से दुखी राजा ने भटकते-भटकते एक ग्वाले को देखा. ग्वाले ने प्यासे राजा को पानी पिलाया. राजा की अंगुली में अंगूठी थी. राजा ने अंगूठी निकालकर ग्वाले को दे दी और स्वयं नगर की ओर चल दिए.
राजा नगर में पहुंचकर एक सेठ की दुकान पर जाकर बैठ गए. उन्होंने स्वयं को उज्जैन का रहने वाला कहा और अपना नाम विका बताया. सेठ ने उनको एक कुलीन मनुष्य समझ कर जलपान कराया. भाग्यवश उस दिन सेठ की दुकान पर बहुत अधिक बिक्री हुई. सेठ विका को भाग्यवान पुरुष समझकर अपने घर ले गया. सेठ ने अपने गले का एक बेशकीमती हार खूंटी पर टांग दिया. भोजन करते समय राजा ने एक आश्चर्यजनक घटना देखी. सेठ ने जिस खूंटी पर अपना हार टांगा था, वह खूंटी उस हार को निगल रही थी.
भोजन के पश्चात जब सेठ उस कमरे में आया तो उसे कमरे में हार नहीं मिला. चूकि विका के अलावा कोई और अपरिचित वहां नहीं था इसलिए सेठ ने सोचा कि हार विका ने चुरा लिया है. परन्तु विका ने हार लेने से इनकार कर दिया. सेठ के आदेश पर पाँच-सात आदमी विका को पकड़कर नगर-कोतवाल के पास ले गए.
फौजदार ने उसे राजा के सामने उपस्थित कर दिया और कहा कि यह आदमी भला प्रतीत होता है, चोर मालूम नहीं होता, परन्तु सेठ का कहना है कि इसके सिवा और कोई घर में आया ही नहीं, इसलिए अवश्य ही चोरी इसने की है. राजा ने आज्ञा दी कि इसके हाथ-पैर काटकर चौरंगिया कर दिया जाए. तुरंत राजा की आज्ञा का पालन किया गया और विका के हाथ-पैर काट दिए गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
कुछ दिनों बाद एक तेली हाथ-पैर विहीन विका को अपने घर ले गया और उसको कोल्हू पर बिठा दिया. विका अपनी जबान से बैल हांकने का काम करने लगा. इस दौरान राजा पर आई शनि की दशा का काल समाप्त हो गया. अपंग विका वर्षा ऋतु के आरंभ पर मल्हार राग गाने लगा. उसके गीत पर राजा की बेटी मनभावनी मोहित हो गयी. राजकन्या ने राग गाने वाले की खबर लाने के लिए अपनी दासी को भेजा.
दासी सारे शहर में घुमती रही. जब वह तेली के घर के निकट से निकली तो उसने देखा कि विका मल्हार गा रहा था. दासी ने लौटकर राजकुमारी को सारा वृतांत सुना दिया. बस उसी क्षण राजकुमारी ने यह निश्चय कर लिया कि चौरंगिया विका भले ही अपंग हो किंतु वह उससे ही विवाह करेगी.
राजकुमारी ने खाना-पीना छोड़ दिया. रानी के पूछने पर उसने अपना निर्णय बता दिया. राजकुमारी ने जब रानी को बताया कि वह चौरंगिया से विवाह करना चाहती है तो उसने बेटी को समझाया. लेकिन वह सुनने को राजी न थी. रानी ने राजा को बात कह सुनाई. महाराज ने भी समझाने की कोशिश की. तो राजकुमारी ने कहा- “पिताजी, मै अपने प्राण त्याग दूंगी पर किसी दूसरे पुरुष से विवाह नहीं करुँगी. ” राजा हारकर उस विवाह के लिए राजी हो गया.
राजकुमारी का विवाह चौरंगिया के साथ हो गया. रात को जब विक्रमादित्य और राजकुमारी महल में सोए थे तब शनिदेव ने विक्रमादित्य को स्वप्न दिया और कहा कि राजा मुझे छोटा बतलाकर तुमने कितना दुःख उठाया. राजा ने शनिदेव से क्षमा मांगी. शनिदेव ने राजा को माफ कर दिया और प्रसन्न होकर विक्रमादित्य को हाथ-पैर दे दिए. राजा विक्रमादित्य ने शनिदेव से प्रार्थना की कि जैसा दुःख उन्हें दिया है, वैसा किसी को भी न दें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
शनिदेव ने राजा की प्रार्थना स्वीकार कर ली. उन्होंने कहा- जो मनुष्य मेरी कथा कहेगा या सुनेगा उसे मेरी दशा में कभी भी दुःख नहीं होगा. जो नित्य मेरा ध्यान करेगा या चींटियों को आटा डालेगा उसके सब मनोरथ पूर्ण होंगे. इतना कहकर शनिदेव अपने धाम को चले गए.
जब राजकुमारी मनभावनी की आँख खुली और उसने चौरंगिया को हाथ-पैरो के साथ देखा तो आश्चर्यचकित हो गयी. उसको देखकर राजा विक्रमादित्य ने अपना सारा हाल कहा की मै उज्जयिनी का राजा विक्रमादित्य हूँ. यह सुनकर राजकुमारी बड़ी प्रसन्न हुई. जब सेठ ने यह घटना सुनी तो वह राजा विक्रमादित्य के पास आया और उनके पैरो पर गिरकर क्षमा मांगने लगा कि आप पर मैंने चोरी का झूठा दोष लगाया था. आप जो चाहे,मुझे दंड दे.
राजा ने कहा-मुझ पर शनिदेव का कोप था इसी कारण यह सब दुःख मुझे प्राप्त हुए, इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है. सेठ ने कहा-“महाराज! मुझे तभी शांति मिलेगी, जब आप मेरे घर चलकर प्रीतिपूर्वक भोजन करेंगे.” राजा विक्रमादित्य सेठ के घर भोजन कर रहे थे उस समय एक आश्चर्यजनक घटना घटती सबको दिखाई दी. जो खूंटी पहले हार निगल गयी थी वह अब हार उगल रही थी.
सेठ ने हाथ जोड़कर राजा से कहा-“मेरी श्रीकंवरी नामक एक कन्या है, आप उससे विवाह करें. ” विक्रमादित्य ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली. सेठ ने अपनी कन्या का विवाह राजा के साथ कर दिया और बहुत-सा दान-दहेज़ आदि दिया. कुछ दिन तक उस राज्य में निवास करने के पश्चात राजा विक्रमादित्य उज्जैन के लिए चले.
राजकुमारी मनोभावनी, सेठ की कन्या तथा दोनों घरों से दहेज में मिले अनेक दास-दासी, रथ और पालकियों सहित राजा विक्रमादित्य उज्जैन की तरफ चले. सारे उज्जयिनी में उत्सव मनाया गया और शनिदेव को दीप माला की गयी. दूसरे दिन राजा ने अपने राज्य में घोषणा कराई कि शनिदेव सभी ग्रहों में सर्वोपरि हैं. मैंने इन्हें छोटा बतलाया, इसी से मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ.
इस प्रकार सारे राज्य में शनिदेव की पूजा और कथा होने लगी. जो कोई शनिदेव की इस कथा को पढता या सुनता है, शनिदेव की कृपा से उसके सब दुःख दूर हो जाते हैं. व्रत के दिन शनिदेव की कथा को अवश्य पढ़ना चाहिए.
ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम: ऊं शं शनिश्चराय नम:
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम्
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