परशुराम कथाः भृगु के आदेश पर राम ने हिमवान पर्वत पर शुरू की शिव आराधना, एक व्याध ने दी चुनौती- भाग-2

परशुराम कथाः भृगु के आदेश पर राम ने हिमवान पर्वत पर शुरू की शिव आराधना, एक व्याध ने दी चुनौती- भाग-2


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पिछली कथा से आगे…

राम तो पितामह भृगु के आश्रम आश्रम में कुछ विद्याएं और कौशल सीखने आए थे लेकिन पितामह ने उन्हें आश्रम से चले जाने को कह दिया. राम ने भृग़ु से पूछा कि उन्हें कहां जाना चाहिए? उनके आश्रम से चले जाने में कौन सा विश्वकल्याण छुपा है?

भृगु ने बताया- आप किस कार्य के लिए पृथ्वी पर आए हैं, उन दुष्कर कार्यों को आरंभ करने के लिए आपको दिव्य शक्तियों की आवश्यकता होगी. उसके लिए आपको हिमवान पर्वत पर जाकर भगवान शिव की महाआराधना करनी होगी.

आप भगवान शंकर को तप से प्रसन्न करें. आपको जो कार्य पूर्ण करने हैं उसके लिए भगवान शिव की सहायता आवश्यक है. इसलिए सर्वप्रथम उन्हें प्रसन्न करें. महादेव से समस्त शस्त्रों का ज्ञान वरदान स्वरूप प्राप्त करें.

राम ने पूछा- हे पितामह! यदि देवाधिदेव महादेव मेरे तप से प्रसन्न हो जाएं तो मैं उनसे शास्त्रों के ज्ञान के स्थान पर शसत्रों का ज्ञान प्राप्त करूं, आपने ऐसा क्यों कहा? एक तपस्वी के लिए शस्त्र की क्या उपयोगिता?

भृगु बोले- आपका पृथ्वी पर आगमन जिन कार्यों के लिए हुआ है वह शस्त्र के बिना पूर्ण नहीं होगा. आपको समय आने पर सब ज्ञात हो जाएगा. शिवजी के प्रसन्न होकर दर्शन से शास्त्रों का ज्ञान तो स्वतः प्राप्त हो जाता है. इसलिए शस्त्रज्ञान मांगना.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
राम ने ऋषि भृगु की परिक्रमा कर उनका यशोगान किया और वहां से हिमालय के लिए चल पड़े. रास्ता लंबा था. मार्ग में आने वाले समस्त तीर्थों का दर्शन करते ऋषि मुनियों के आश्रम में शिवोपासना के सूत्र सीखते, अंतत: वह हिमवान पर्वत पहुंच गए.

हिमवान पर्वत पर वेगवती नदियां, सघन वन उन वनों में शेर, बाघ, रीछ, भालू और ढेरों हिंसक जानवरों की भरमार था. राम ने एक स्थान को चुना और वहां आश्रम बनाकर तपस्या करने लगे. उन्होंने शाक तथा मूल खाकर तपस्या आरंभ की.

वर्षा और हिमपात में भी अपने स्थान पर अडिग होकर तप करते. शीतऋतु में जल के भीतर खड़े होकर आराधना करते और गर्मियों में पाँच प्रकार की अग्नि के मध्य में स्थित होकर आराधना करते रहते.

वर्षों तक तपस्या करने के बाद उन्हें ध्यान में भगवान शिव के साक्षात दर्शन होने लगे. उनकी कठोर तपस्या की चर्चा हिमवान के अन्य ऋषि-मुनियों से होती देवताओं तक पहुंच गयी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
एक दिन हिमवान क्षेत्र में विशाल शरीर वला एक भयानक शिकारी तीर धनुष लिए हिमवान पर्वत पर आया. शिकारी देखने से बहुत क्रूर और निर्दयी तथा भयानक लगता था. शिकारी ने अपने कंधे पर अपना एक शिकार टांग रखा था जिससे खून टपक रह था.

व्याध उस स्थान तक पहुंच गया जहां राम तपस्या में लीन थे. उसने सरोवर के निकट एक पेड़ के नीचे अपने कंधे से टंगे पशु को उतार कर रखा और उसका मांस खाने लगा.

उसने धनुष संभाला और सरोवर तट पर तपस्या करते राम के पास पहुंचा. राम की ओर देख कर बोला- मैं तोष प्रवर्श व्याध हूं. मैं इसी वन में निवास करता हूं और यहां की समस्त भूमि पर विचरने वाले पशु, प्राणी वन, जल जीव सब मेरे अधीन हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
मैं मांस खाने में कोई विचार नहीं करता और किसी भी जीव को खा लेता हूं. मैं स्वयं देवराज इंद्र से भी नहीं डरता यह बात सभी जानते हैं. मैं ही इस संपूर्ण क्षेत्र का अधिपति हूं. पूरे क्षेत्र में मेरी इच्छा कि विरुद्ध कोई प्रवेश या निवास नहीं कर सकता.

तपस्या करते बरसों बीत गए थे पर राम के समक्ष कुछ वन्य जीवों के अलावा आज तक कोई न आया था. अचानक कोई इस तरह पूरे वन क्षेत्र पर अधिकार जता रहा था. शंका हुई कि कहीं कोई तप में विघ्न डालने तो नहीं आया. (ब्रह्मांड पुराण)

व्याध ने राम से पूछा कि वह इधर क्यों आए? राम ने बताया कि वह शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तप करने आए हैं. व्याध को इस बात की आपत्ति थी कि ब्रह्महत्या का दोषी उसके क्षेत्र में क्यों तप कर रहा है. राम ने ब्रह्महत्या की थी? व्याध यह सब कैसे जानता था?

यह प्रसंग अगली पोस्ट में….
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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