कर सकूं कुछ मैं भी कुछ राम का काज, आस में रहे सैकड़ों वर्ष गिद्धराजः आज की रामकथा में जटायु के भाई संपाति की कथा
श्रीराम की सहायता से राजगद्दी पाकर सुग्रीव आमोद-प्रमोद में ऐसे डूबे कि वह भूल गए कि उन्होंने सीताजी को खोजने में श्रीराम की सहायता का वचन दिया है.
लक्ष्मणजी द्वारा चेतावनी देने के बाद सुग्रीव ने वानर वीरों की टोली सीताजी की खोज में भेजी.
सुग्रीव ने युवराज अंगद की अगुवाई में सीताजी का पता लगाने के लिए हनुमान, जामवंत, नल-नील की टोली को दक्षिण दिशा में भेजा था.
यह टोली चलते-चलते सागर तट तक आ गई. सुग्रीव द्वारा दिया समय समाप्त होने को था लेकिन लेकिन सीताजी का कोई अता-पता न मिला.
हारकर वानर वीरों ने सोचा इस तरह असफल होकर लौटने से अच्छा हैं वे यहीं प्राण त्याग दें. सारे वानरों ने अन्न-जल त्यागा और सागर तट पर बैठ गए.
पास की एक गुफा से एक वृद्ध गिद्धराज संपाति वानरों के प्राण त्यागने की प्रतीक्षा में बैठे देवों का आभार व्यक्त करते थे कि उन्होंने इतना आहार भेजा है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
संपाति वानरों पर टकटकी लगाए एक दिन उनकी बात सुन रहे थे. अंगद ने कहा- हमसे भाग्यशाली तो जटायु थे जिन्होंने माता सीता को बचाने में लड़ते हुए प्राण त्यागे.
वानरों के मुख से जटायु का नाम सुनकर संपाति उनके पास आए और पूछा कि हे वानर तुम मेरे अनुज जटायु को कैसे जानते हो? उसकी मृत्यु कैसे हुई?
हनुमानजी ने संपाति को सारी बात बताई. संपाति ने बताया कि वह श्रीराम के दूतों की प्रतीक्षा में सैकड़ों वर्षों से बैठे हैं. संपाति ने हनुमानजी को अपनी कथा सुनाई.
संपाति और जटायु भाई थे. वृत्तासुर वध मे देवों का साथ देने के बाद दोनों भाइयों में बड़ा अहंकार आ गया था. दोनों ने एक दिन सूर्य को छूने की शर्त लगाई और उड़े.
सूर्य के करीब पहुंचते ही दोनों जलकर नीचे गिरने लगे. संपाति ने अपने पंख फैलाकर जटायु को छाया कर दी लेकिन सूर्य की गर्मी से संपाति के पंख जल गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
जटायु जहां गिरे वहां मनुष्यों का वास था जबकि संपाति निर्जन विंध्याचल पर्वत पर गिरे. पंखविहीन संपाति अपने प्राण देने ही वाले थे कि निशाकर ऋषि से भेंट हो गई.
ऋषि ने बताया कि तुम्हारे पंख जलाने के पीछे एक बड़ा उद्देश्य छिपा है. जब श्रीराम के वानरदूत सीताजी का पता लगाते आएंगे, तब तुम उनका मार्गदर्शन करना. तुम्हारे पंख फिर से निकल आएँगे.
संपाति ने रावण का महल देखा था. उन्हें लंका की सही दिशा पता थी. उन्होंने समुद्र से लंका का रास्ता, रावण के महल की दिशा, पहुंचने का मार्ग आदि सारी सूचनाएं दीं.
प्रभुकृपा से उनके पंख निकलने लगे. संपाति के पंख निकलते देख वानर सेना को विश्वास हुआ कि यह रावण का दूत नहीं है, बल्कि रामभक्त ही हैं.
हनुमानजी ने जामवंत द्वारा उनकी शक्ति का भान दिलाने पर संपाति से मिले दिशाज्ञान को लक्ष्य करके छलांग लगाई और समुद्र लांघकर लंका पहुंचे.
समुद्र लांघने की राह में हनुमानजी के साथ बड़ी-बड़ी घटनाएं हुईं. देवताओं ने हनुमानजी की परीक्षा ली जिसमें वह सफल रहे. यह कथा अगले भाग में सुनाएंगे.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली