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सती ने सीतारूप धरके ली श्रीराम की परीक्षा तो शिव जी ने क्यों कर दिया पत्नी का त्याग ?

सती ने सीतारूप धरके ली श्रीराम की परीक्षा तो शिव जी ने क्यों कर दिया पत्नी का त्याग ?

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रावण द्वारा सीता हरण कर लेने के बाद प्रभु श्रीराम वन में सीता को तलाश रहे थे. शिवजी प्रभु की इस दशा से अत्यंत दुखी थे. वह प्रभु के दर्शन करना चाहते थे लेकिन श्रीराम अवतार को सबके सामने प्रकट करने का समय नहीं आया था.

इस कारण महादेव चाहकर भी उनके दर्शन को जाते नहीं थे क्योंकि शिवजी के वन में जाकर प्रभु से मिलते ही सारा रहस्य खुल जाता.

महादेव से रहा नहीं गया. साधु वेश धरा और प्रभु से मिलने चल दिए. सती भी साथ हो लीं. उन्होंने सती को कुछ बताया नहीं था. एक स्थान पर श्रीराम और लक्ष्मण दिखे. प्रभु को पीड़ित देख शिवजी सामने नहीं गए. उन्होंने बस जय सच्चिदानंद कहकर प्रणाम किया.

सती आश्चर्य में थीं. स्वयं भगवान शिव एक राजकुमार को क्यों प्रणाम कर रहे हैं? उनके मन में तरह-तरह की शंका हुई.

शिवजी ने ताड़ लिया. उन्होंने सती को बताया कि वह राजकुमार स्वयं श्रीविष्णु अवतार हैं. सती को लगा शिवजी कौतूहल कर रहे हैं. भला प्रभु को पत्नी वियोग में वन-वन भटकने की नौबत क्यों आने लगी !हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शिवजी ने कहा- यदि मुझ पर संदेह है तो स्वयं परख लीजिए. सती ने सीताजी का रूप धरा और श्रीराम-लक्ष्मण के सामने आ खड़ी हुईं. लक्ष्मण विस्मय में थे लेकिन प्रभु ने सारा भेद जान लिया.

प्रभु ने देवी को प्रणाम कर पूछा कि आज अकेली कैसे, महादेव कहां हैं? सती को भूल का अहसास हुआ. उन्हें पछतावा हो रहा था कि क्यों प्रभु की परीक्षा ऐसे समय में ली जब वह कष्ट में डूबे हैं?

श्रीराम सती के मन की बात जान गए. उन्होंने माया प्रकट की. सती को चारों तरफ प्रसन्न मन में श्रीराम-जानकी और लक्ष्मण दिखाई दे रहे थे. सती के मन की पीड़ा कम हुई और वह शिवजी के पास पहुंचीं.

सती ने श्रीराम की परीक्षा के लिए सीता का रूप लिया था. क्षणभर के लिए ही सही लेकिन उन्होंने जो रूप लिया था, शिवजी उनकी वंदना करते थे. अब शिवजी उन्हें पत्नी की तरह कैसे स्वीकारें!

शिवजी ने सती का त्याग करने का निर्णय कर लिया. उन्होंने एक पेड़ के नीचे आसन लगाया और समाधि में चले गए. सती कैलाश पर अकेली विलाप करतीं. उन्होंने श्रीराम का ध्यान किया- प्रभु अब यह जीवन व्यर्थ है. इसे त्यागने का समय आया है. आप मुझे वरदान दें कि अगले जन्म में भी शिवजी ही मेरे स्वामी होंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इस तरह सती अवतार के समाप्ति और पार्वती अवतार की पृष्ठभूमि तैयार हुई. सती ने पिता दक्ष के यज्ञ में प्राण त्याग दिए और शिव ने क्रोध में आकर सब तहस-नहस कर दिया. (रामचरितमानस-बाल कांड का प्रसंग)

असुरराज तारकासुर ने देवों को पीड़ित कर रखा था. उसका वध शिवपुत्र के हाथों ही लिखा था. तारकासुर से मुक्ति दिलाने के लिए शिव-विवाह जरूरी था. कैसे रची गई सती-शिव के पुनर्विवाह की लीला. पढ़िए कल सुबह की राम कथा में.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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