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आखिर दो जुड़वां भाइयों की किस्मत भी एक सी क्यों नहीं होती? क्या ज्योतिष से भाग्य बदला जा सकता है?

आखिर दो जुड़वां भाइयों की किस्मत भी एक सी क्यों नहीं होती? क्या ज्योतिष से भाग्य बदला जा सकता है?

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एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों और ज्योतिष प्रेमियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया कि मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था. इसलिए मैं राजा बना किन्तु उसी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों?

राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर हो गए.एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं. सब सोच में पड़ गये. अचानक एक वृद्ध खड़े हुये और बोले- महाराज आपके प्रश्न का उत्तर एक महात्मा ही दे सकते हैं जो दूर वन में रहते हैं.

राजा की जिज्ञासा बढ़ी. पता जानकर वह जंगल पहुंचा तो देखा एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठकर अंगार (दहकता कोयला) खाने में व्यस्त हैं. सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा चीखने लगे.

महात्मा बोले- तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं मैं भूख से पीड़ित हूं। तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं वे दे सकते हैं।हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी. पहाड़ी मार्ग पारकर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का रह गया. दृश्य ही कुछ ऐसा था. वे महात्मा अपना ही मांस चिमटे से नोच-नोचकर खा रहे थे.

राजा को देखते ही महात्मा डांटने लगे- मैं भूख से बेचैन हूं मेरे पास समय नहीं. आगे पहाड़ियों के पार एक आदिवासी गांव में एक बालक जन्म लेने वाला है जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा. सूर्योदय से पूर्व वहां पहुंचो. वही बालक तेरे प्रश्न का उत्तर का दे सकता है.

राजा बड़ा बेचैन हुआ. मेरे प्रश्न को उत्तर तो कोई देता नहीं सब आगे टाल देते हैं पर उत्सुकता प्रबल थी. कुछ भी हो यहां तक पहुंच चुका हूं. वहां भी जाकर देखता हूं क्या होता है.

राजा किसी तरह सुबह होने तक उस गांव में पहुंचा. उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा. बालक को राजा के सम्मुख उपस्थित पेश किया गया.

राजा को देखते ही नवजात बालक हंसा और बोलने लगा- राजन्! मेरे पास भी समय नहीं है किन्तु अपना उत्तर सुनो लो. तुम, मैं और वे दोनों महात्मा जिनसे पूछकर यहां तक पहुंचे हो, पूर्वजन्म में हम चारों राजकुमार और सगे भाई थे.

एक बार शिकार खेलते-खेलते हम जंगल में भटक गए. तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे. अचानक हम चारों को आटे की एक पोटली मिली. जैसे-तैसे हमने चार रोटी सेंकी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.हम अपने-अपने हिस्से की बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख-प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा आ गये. अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा- बेटा मैं दस दिन से भूखा हूं. अपनी रोटी में से मुझे भी कुछ दे दो जिससे मेरा भी जीवन बच जाय.

उस रोटी को खाकर इस घोर जंगल से पार निकलने की मुझमें भी कुछ सामर्थ्य आ जायेगी. इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले- तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या आग खाऊंगा? चलो भागो यहां से.

वे महात्मा जी फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही किन्तु उन भइया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये रोटी तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या अपना मांस नोचकर खाऊंगा?

भूख से लाचार वह महात्मा मेरे पास भी आए. मुझसे भी बाटी मांगी तथा दया करने को कहा किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ?

बालक बोला- अंतिम आशा लिए वह महात्मा आपके पास आए. आपसे भी दया की याचना की सुनते ही आपने उनकी दशा पर दया करते हुये ख़ुशी से अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले- तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा. बालक ने कहा- उसी कार्य के आधार पर हम अपना भोग, भोग रहे हैं.

धरती पर एक समय में अनेकों फूल खिलते हैं किन्तु सबके फल रूप, गुण, आकार-प्रकार, स्वाद में भिन्न होते हैं. इतना कहकर वह बालक मर गया. राजा अपने महल में पहुंचा और माना कि ज्योतिष शास्त्र, कर्तव्य शास्त्र और व्यवहार शास्त्र है.

यह अटल सत्य है कि एक ही मुहूर्त में अनेकों प्राणियों का जन्म होता है किंतु उनकी किस्मत अलग-अलग होती है. इसे ही तो प्रारब्ध कहते हैं. हम वही पाते हैं जो हमने किया होता है. हमारे कर्म हमारे साथ चलते हैं.

जो बीज हमने बोया है उसकी फसल काटनी ही होगी. ज्योतिष आपके कर्मों की परिणति का संकेत देता है, उससे थोड़ी राहत की राह बता सकता है आपके कर्मों का फल नहीं बदल सकता.

संकलनः संजना गोस्वामी
संपादनः राजन प्रकाश

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