वरुथिनी एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे माधव! वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? उसकी विधि क्या है और उसका फल क्या प्राप्त होता है? कृपा करके विस्तार से बताइए।”
भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन! इस एकादशी का नाम ‘वरुथिनी एकादशी’ है। यह सौभाग्य देने वाली, समस्त पापों का नाश करने वाली और अंततः मोक्ष प्रदान करने वाली अत्यंत पुण्यदायिनी तिथि है।”
श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि इस व्रत का प्रभाव इतना महान है कि इसके पुण्य से राजा मान्धाता जैसे धर्मात्मा राजा भी स्वर्गलोक को प्राप्त हुए। यह व्रत दस हजार वर्ष की तपस्या के समान फल देने वाला माना गया है। यहां तक कि कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय एक मन स्वर्णदान करने जितना पुण्य इस एकादशी के व्रत से प्राप्त हो जाता है।
इस व्रत का फल केवल परलोक के लिए ही नहीं, बल्कि इस लोक में भी सुख, सौभाग्य और शांति प्रदान करने वाला है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि सभी दानों में अन्नदान सर्वोत्तम है, क्योंकि उससे देवता, पितर और मनुष्य सभी तृप्त होते हैं। लेकिन वरुथिनी एकादशी का व्रत इन सभी दानों और तपों से भी श्रेष्ठ फल देने वाला है।
## राजा मान्धाता की कथा
प्राचीन काल में नर्मदा तट पर मान्धाता नामक एक धर्मात्मा और दानशील राजा राज्य करता था। वह तपस्वी प्रवृत्ति का था और सदैव धर्म-कर्म में लीन रहता था।
एक दिन वह वन में तपस्या कर रहा था कि अचानक एक जंगली भालू आया और उसके पैर को काटने लगा। राजा ने विचलित होने के बजाय शांत भाव से अपनी तपस्या जारी रखी। थोड़ी देर में भालू उसे घसीटकर वन के भीतर ले गया और उसका पैर पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया।
राजा ने क्रोध या भय के बजाय भगवान विष्णु का स्मरण किया और उनकी प्रार्थना की। उसकी भक्ति और करुण पुकार सुनकर भगवान श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने अपने चक्र से उस भालू का वध कर दिया।
राजा का पैर भालू द्वारा पहले ही क्षतिग्रस्त हो चुका था, जिससे वह अत्यंत दुःखी हो गया। तब भगवान विष्णु ने कहा, “हे वत्स! तुम मथुरा जाओ और मेरी वराह अवतार की पूजा करते हुए वरुथिनी एकादशी का व्रत करो। इसके प्रभाव से तुम्हारे सभी अंग पुनः ठीक हो जाएंगे और तुम पूर्ण स्वस्थ हो जाओगे। यह घटना तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्मों का फल है।”
भगवान की आज्ञा मानकर राजा मान्धाता ने मथुरा जाकर श्रद्धा और नियमपूर्वक वरुथिनी एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह पुनः सुंदर और पूर्ण अंगों वाला हो गया और अंततः स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ।
व्रत की विधि और नियम
वैशाख कृष्ण पक्ष की इस एकादशी का व्रत दशमी तिथि से ही प्रारंभ हो जाता है। दशमी के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए और तामसिक वस्तुओं जैसे मांस, दालें, अनाज आदि से परहेज करना चाहिए। रात्रि में भूमि पर शयन करना तथा मन को संयमित रखना उत्तम माना गया है।
एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु की धूप, दीप, पुष्प, फल और पंचामृत से पूजा करनी चाहिए। दिनभर उपवास रखते हुए भगवान का नाम-स्मरण, भजन-कीर्तन और जागरण करना चाहिए।
द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा देने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए। ऐसा करने से व्रत पूर्ण माना जाता है।
वरुथिनी एकादशी का महत्व
शास्त्रों में कहा गया है कि इस एकादशी का व्रत करने से समस्त पापों का नाश होता है और मनुष्य को इस लोक में सुख तथा परलोक में मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत अभाग्य को सौभाग्य में बदल देता है और जीवन के समस्त कष्टों को दूर करता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जो श्रद्धा और भक्ति से वरुथिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सभी प्रकार के पापों से मुक्त होकर अंततः भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करता है।
