June 13, 2026

कामदा एकादशी व्रत कथा

कामदा एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे माधव! चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या महत्व है? कृपा करके इसका माहात्म्य बताइए।”

भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन! यह एकादशी ‘कामदा एकादशी’ कहलाती है। इसे ‘फलदा एकादशी’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली और पापों का नाश करने वाली है। अब मैं तुम्हें इसकी पवित्र कथा सुनाता हूँ।”

भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि यही प्रश्न एक समय राजा दिलीप ने महर्षि वशिष्ठ से किया था। तब वशिष्ठ मुनि ने उन्हें यह कथा सुनाई थी, और उससे भी पूर्व राजा पुण्डरीक के प्रसंग के रूप में यह कथा प्रसिद्ध है।

बहुत समय पहले भोगीपुर नामक एक अत्यंत वैभवशाली नगर था। वहाँ राजा पुण्डरीक राज्य करता था। उसके राज्य में गंधर्व, किन्नर और अप्सराओं का निवास था। उन्हीं में एक सुंदर गंधर्व ललित और उसकी पत्नी अप्सरा ललिता रहती थी। दोनों के बीच अत्यंत गहरा प्रेम था और वे एक-दूसरे के बिना व्याकुल हो जाते थे।

एक बार राजा पुण्डरीक की सभा में ललित गंधर्व अपने गायन और नृत्य से सभी को प्रसन्न कर रहा था। गाते समय अचानक उसे अपनी पत्नी ललिता का स्मरण हो आया, जिससे उसका स्वर भंग हो गया और संगीत में त्रुटि हो गई।

सभा में उपस्थित कर्कोटक नामक नाग ने यह बात राजा को बता दी। राजा पुण्डरीक अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने ललित को श्राप दे दिया कि वह राक्षस बन जाए।

क्षण भर में ही ललित का सुंदर गंधर्व शरीर भयंकर राक्षस रूप में परिवर्तित हो गया। उसका शरीर विशाल, मुख विकराल और रूप अत्यंत डरावना हो गया। वह घोर कष्टों में वन-वन भटकने लगा।

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अपने पति की यह दशा देखकर ललिता अत्यंत दुःखी हो गई। वह उनके पीछे-पीछे भटकती रही और उनके उद्धार का उपाय खोजने लगी। एक दिन वह विन्ध्याचल पर्वत पर महर्षि शृंगी के आश्रम पहुँची और विनम्र भाव से प्रार्थना करने लगी।

महर्षि शृंगी ने उससे पूछा, “हे देवी! तुम कौन हो और यहाँ क्यों आई हो?”

ललिता ने करुण स्वर में कहा, “हे मुनिवर! मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से राक्षस बन गया है। कृपा करके मुझे उसके उद्धार का उपाय बताइए।”

तब महर्षि शृंगी ने कहा, “हे गंधर्व कन्या! चैत्र शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आने वाली है, वही कामदा एकादशी है। यह समस्त पापों का नाश करने वाली और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली है। यदि तुम श्रद्धापूर्वक इसका व्रत करो और उसका पुण्य अपने पति को समर्पित कर दो, तो वह अवश्य ही श्राप से मुक्त हो जाएगा।”

मुनि के वचनों को सुनकर ललिता ने पूर्ण श्रद्धा से कामदा एकादशी का व्रत किया। एकादशी के दिन उसने उपवास, विष्णु पूजन, भजन-कीर्तन और जागरण किया तथा द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपने व्रत का पुण्य अपने पति को समर्पित किया और भगवान विष्णु से प्रार्थना की।

जैसे ही व्रत का पुण्य समर्पित हुआ, ललित राक्षस योनि से मुक्त होकर पुनः अपने सुंदर गंधर्व स्वरूप में आ गया। दोनों पति-पत्नी अत्यंत आनंदित हुए और दिव्य वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित होकर एक-दूसरे के साथ रहने लगे। अंततः वे स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गए।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे धर्मराज! जो भी श्रद्धा और भक्ति से कामदा एकादशी का व्रत करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे भगवान विष्णु की शुद्ध भक्ति प्राप्त होती है।”

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वशिष्ठ मुनि ने भी कहा था कि इस व्रत की कथा का श्रवण या पाठ करने मात्र से वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है और राक्षस जैसी निम्न योनियों से भी मुक्ति मिलती है।

कामदा एकादशी का महत्व

कामदा एकादशी मनुष्य की सभी शुभ कामनाओं को पूर्ण करने वाली एक अत्यंत पुण्यदायिनी तिथि है। यह व्रत न केवल बाह्य पापों का नाश करता है, बल्कि मन के भीतर छिपे मोह, आसक्ति और विकारों को भी समाप्त करता है।

इस दिन भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। व्रती को दशमी से ही सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए और मन को संयमित रखना चाहिए। एकादशी के दिन स्नान करके व्रत का संकल्प लें, विष्णु भगवान की पूजा करें, भजन-कीर्तन करें और रात्रि में जागरण करें।

द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा देकर स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार श्रद्धा से किया गया कामदा एकादशी व्रत जीवन के समस्त कष्टों का नाश कर देता है और अंततः भगवान की कृपा प्रदान करता है।

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