सठ सुधरहिं सतसंगति पाई, पारस परस कुधात सुहाई- सत्संगति में दुष्ट भी सुधर जाते हैं, पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक राजा ने स्वप्न में एक साधु को देखा. साधु ने राजा को अगले दिन होने वाली उसकी मृत्यु के बारे में कुछ बता रहे थे. साधु ने बताया- कल रात तुम्हें एक विषैला सर्प डंसेगा और तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी.
साधु ने राजा को सर्प के रहने के स्थान के बारे में भी बताया कि वह अमुक पेड़ की जड़ में रहता है. पूर्वजन्म में तुमने उसका बड़ा अहित किया था. उसी शत्रुता का बदला लेने के लिए वह तुम्हें डंसेगा.
प्रातःकाल राजा सोकर उठा और स्वप्न की बात पर विचार करने लगा. राजा धर्मात्मा था और धर्मात्माओं को अक्सर सच्चे ही स्वप्न हुआ करते हैं. इसलिए सपना सत्य होगा इसका उसे विश्वास था.
राजा विचार करने लगा कि अब आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? सोचते-सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है.राजा को यह ज्ञात था कि उसे मृत्यु देने के लिए आने वाला सर्प कहां रहता है. वह अपने सेवक भेजकर उस सर्प को वहीं मरवा सकता था. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया.
सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया. संध्या होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ जिसमें सर्प रहता था, वहां से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया.
रास्ते में सुगन्धित जल का छिड़काव करवाया. मीठे दूध के कटोरे जगह-जगह रखवा दिए और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुंचाने का प्रयत्न न करे.
मध्य रात्रि को सर्प अपनी बांबी में से फुफकारता हुआ निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया. वह जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया. अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख-देखकर सर्प आनन्दित होता गया.कोमल पुष्पों के पर लोटता हुआ मनभावन सुगन्ध का आनंद लेते, जगह-जगह रखे मीठे दूध को पीता आगे बढ़ता गया. अब उसके मन में क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उमड़ने लगे.
जैसे-जैसे वह आगे चलता गया, वैसे-वैसे उसका क्रोध कम होता गया. राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं परन्तु कोई उसे जरा भी हानि पहुंचाने की चेष्टा नहीं करते.
यह असाधारण सौजन्य देखकर सर्प के मन में स्नेह उमड़ आया. सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मन्त्र- मुग्ध कर लिया था. कहां वह राजा को काटने चला था परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया.
हानि पहुंचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूं तो किस प्रकार काटूं? यह प्रश्न उसे बेचैन करने लगा. राजा के पलंग तक जाने तक सर्प का निश्चय पूर्ण रूप से बदल गया.
राजा सर्प के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था. रास्ते भर की सेवा का आनंद लेते और राजा के प्रति विचार में पड़े होने के कारण सर्प को महात्माजी द्वारा बताए समय से पहुंचने में कुछ विलम्ब हो गया.सर्प ने कहा- मैं तुम्हें डंसकर पूर्वजन्म का बदला लेने आया था, परन्तु तुम्हारी सज्जनता और सद्व्यवहार ने मुझे परास्त कर दिया. अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूं. मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूं. लो इसे अपने पास रखो.
इतना कहकर सर्प ने एर मणि राजा के सामने रखी और उलटे पांव अपनी बांबी की ओर लौट गया. सज्जनता और सद्व्यवहार ऐसे प्रबल अस्त्र हैं जिनसे दुष्ट प्रवृति के लोगों को भी जीता जा सकता है.
तुलसीदासजी कहते हैं- “सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई” अर्थात दुष्ट प्राणी भी अच्छी संगति पाकर सुधर जाते हैं जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुंदर चमकीला हो जाता है.
दुष्टों को पहले सुधारने का प्रयास करना चाहिए. यदि प्रयास निष्फल रहें तभी खल संग होहिं न प्रीति की नीति पर चलें.
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