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संपूर्ण धरती के राजा के अधिकार की सीमा वास्तव में थोड़ी होती है, फिर शासक क्यों घमंड करते हैं- जनक और धर्म का ज्ञानवर्धक संवाद

संपूर्ण धरती के राजा के अधिकार की सीमा वास्तव में थोड़ी होती है, फिर शासक क्यों घमंड करते हैं- जनक और धर्म का ज्ञानवर्धक संवाद

lord ramchandra
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंमहाराज जनक अपने फैसले बहुत सूझबूझ से करते थे. एक बार उनके राज्य के एक ब्राह्मण को दोषी पाया गया. महाराज जनक ने कहा- तुम्हारी सज़ा यही है कि तत्काल मेरे राज्य से निकल जाओ.

ब्राह्मण तपस्वी और ज्ञानी लग रहा था. उसने जनक से आदर के साथ पूछा- महाराज, कृपा करके आप यह बता दें कि आपका राज्य कहां तक है, ताकि मैं आपकी आज्ञा का पूरी तरह से पालन कर सकूं. मैं आपके अधिकार वाले राज्य से बाहर निकल सकूं.

कुछ भी कहने से पहले जनक बहुत विचारते थे. इसलिये यह सवाल सुनकर राजा जनक सोचने लगे कि उनका राज्य हर दिशा में कहां, कहां तक है. एकबारगी लगा पूरी धरती पर उनका ही तो अधिकार है.

फिर लगा नहीं, यह पूरी तरह सच नहीं है. मैं अधिकतर मिथिला में ही बना रहता हूं इसलिये सही मायने में केवल मिथिला नगरी पर ही मेरा अधिकार है. नहीं, सारी नगरी पर भी नहीं, महज प्रजा पर ही.सही तौर पर तो प्रजा पर भी क्यों वे अपने मन के मालिक हैं. मेरा अधिकार केवल अपने शरीर तक ही है. जनक इस तरह बड़ी देर तक सोचते विचारते रहे. अंत में उन्हें लगा कि कई मौकों पर शरीर भी उनके कहे अनुसार ही चले.

उससे अपने सोचे के अनुसार अपने मन की करवा सकें, कहां संभव है. जाहिर है मेरा तो अपने शरीर पर भी अधिकार नहीं है. आखिरकार राजा जनक उस दंड़ पाये ब्राह्मण से बोले, ‘मेरा कहीं कोई अधिकार नहीं है,आप जहां चाहें रहें,जो चाहे खाएं.

ब्राह्मण ने महाराज जनक के फैसले पर अचरज करते हुए पूछा- ऐसा कैसे? इतने बड़े राज्य को आप ही तो चलाते हैं. राज्य की सारी व्यवस्था और लोग आपके आधीन है. आप इस जिम्मेदारी से हट कर कैसे कह सकते हैं कि मैं अधिकारी नहीं हूं.

अपनी प्रजा और राज्य के लिये क्या आपका कोई लगाव नहीं, जो आप सबसे मुंह मोड़ कर ऐसा कह रहे हैं? कभी तो आप समूची धरती का अधिकारी होने का दावा करते हैं.राजा जनक बोले, ‘संसार में जो कुछ भी है वह आज नहीं तो कल नष्ट हो जाने वाला है. उसे मैं बचा नहीं सकता. यह मेरे अधिकार में कैसे हुआ. हमारे धर्मग्रंथ और शास्त्र कहते हैं कि कोई ऐसी चीज ही नहीं है जो अधिकार में लेने लायक है.

ऐसे में कोई अधिकारी कैसे बन सकता है. इसलिये मैं किसी भी चीज पर अपना अधिकार नहीं समझता न मैं किसी का अधिकारी हूं.

अब जहां तक अपने को समूची धरती का अधिकारी समझने की बात है तो मैं अपने लिये कुछ नहीं करता. जो भी करता हूं, वह देवता, अपने पितर, प्रजा और अतिथि सेवा के लिए करता हूं. इसलिए पृथ्वी,जल, वायु और आकाश पर अपना अधिकार समझता हूं.ब्राह्मण, मैं अधिकार समझ आपको दंड‌ और यह आज्ञा दे रहा हूं और अधिकार न समझ कर यह कह रहा हूं कि आप को जहां रहने का मन करे वहां रहिये, जिस प्रकार का भोजन करने की इच्छा हो करिये.

राजा जनक का इतना कहना था कि ब्राह्मण ने अपना चोला उतार फेंका. उसका सारा शरीर हल्की रोशनी से चमक रहा था. नये भेस वाला वह विचित्र शरीरधारी ब्राह्मण बोला, ‘मैं धर्म हूं.

महाराज, आपकी परीक्षा लेने के लिए ही मैं ब्राह्मण के वेश में आपके राज्य में रह रहा था. आप इस परीक्षा में सफल रहे. आपका जवाब सुनकर मैं समझ गया कि आप इस धरती पर सभी गुणों से युक्त धर्मात्मा राजा हैं.(महाभारत अश्वमेधिक, 32वां अध्याय )

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