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माता सीता के जन्म की प्रचलित कथा जो नही जानते होंगे आप

माता सीता के जन्म की प्रचलित कथा जो नही जानते होंगे आप

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पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रश्नावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
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हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे आपको प्रभु शरणम् के पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.आज सीता नवमी है. बैसाख मास की शुक्लपक्ष की नवमी को माता सीता के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है.

मां सीता संघर्षों के बीच धैर्य और धर्म की सबसे बड़ी प्रतीक स्वरूपा हैं. माता सीता का जीवन और त्याग सबके लिए प्रेरणास्पद है.

मां सीता के प्राकट्य के विषय में कई कथाएं सुनने को मिल जाती हैं. इन कथाओं से एक भ्रम भी बनता है. माता सीता तो साक्षात लक्ष्मी का अवतार थीं. उनके अवतरण का उद्देश्य था प्रभु श्रीराम के कार्य को पूर्ण कराना और उसमें माध्यम बनना.

किसी भी देवी-देवता के अवतार की कोई कथा सुनें और एक कथा का दूसरी कथा से सामंजस्य बहुत न मिले तो उसपर विवाद नहीं करना चाहिए.

ईश्वर का प्राकट्य कैसे हुआ इसके बारे में ठीक-ठीक दावा कोई कर ही नहीं सकता. ज्यादातर प्राकट्य कथाएं स्वप्न आधारित हैं, अर्थात भगवान ने स्वप्न में प्रेरणा दी है.

स्वप्न का आरंभ किसी को भी याद नहीं होता. उस आरंभ की कड़ी जो छूट गई होती है उसे फिर से बुनने में इंसान अपना विवेक लगाता है.

बस उसी कड़ी के रहस्य को खोजने और जोड़ने के प्रयास में कथाओं में कुछ अंतर आ जाता है पर महापुरुषों को प्रेरणा और ईश्वर आदेश कुछ न कुछ हुआ होता है. इसलिए कथाओं में विसंगति मिल भी जाए तो उपहास नहीं करना चाहिए.

आप इसे आनंद के लिए पढ़ सकते हैं. विसंगतियों के बाद भी हर कथा में एक अलग संदेश होता है. मैं आपको आज सीताजी के प्राक्टय की ऐसी कथा सुनाने जा रहा हूं जिसे सुनकर आप कह सकते हैं- क्या बकवास है! आपकी जैसी श्रद्धा.

चलिए आप इसे इस भाव से ही पढ़ लें फिर भी इस कथा में एक जीवन का संदेश है जिसके लिए आप कहेंगे- हां ये बात तो ठीक है. आनंद रामायण की एक कथा का आनंद लिया जाए. कुंभ क्षेत्र में जहां से यह पोस्ट बना रहा हूं, लाउडस्पीकर पर किसी संत के मुख से निकले रामकथा के स्वर भी कानों में रस घोल रहे हैं.

तीनों लोक कब्जाने की चाहत में रावण ने कठिन तपस्या की. तपस्या सफल रही. महाबली रावण के तप से जो तेज उपजा उससे सारा संसार जलने लगा.

सभी देवता घबराये हुये ब्रह्माजी के पास पहुंचे. देवताओं ने मिलकर ब्रह्मा जी से कहा कि इस स्थिति से जल्द निबटना होगा वरना हम सब भस्म हो जायेंगे.

ब्रह्माजी, तुरंत रावण के पास पहुंचे और पूछा कि इतनी कठोर तपस्या क्यों कर रहे हो? तपस्या छोड़ो अब वर मांगो.

रावण ने ब्रह्माजी से कहा- मैं किसी से कभी न मरूं, मुझे अमर होने का वरदान दीजिए. ब्रह्माजी ने कहा यह असंभव है. जो पैदा हुआ है मरेगा. कुछ और मांगो.

ब्रह्माजी को वर देने में असहाय देख रावण ने कहा- यह वर नहीं दे सकते तो ऐसा वर दीजिए कि मुझे सुर, असुर, पिशाच, नाग, किन्नर या अप्सरा कोई भी न मार सके पर जब मैं अंजाने में अपनी कन्या को ही अपनी रानी बनाने का हठ कर लूं तब मेरी मृत्यु हो.

ब्रह्माजी ने कहा- तुम मानव को भूल रहे हो दसानन?

गर्व में चूर रावण बोला- मानव मुझे क्या मार सकेगा, वह तो असुरों का आहार है. ब्रह्माजी ने रावण को अभीष्ट वरदान दे दिया और चले गए.

वरदान पाकर मदमाता रावण तप खत्मकर विजय अभियान पर निकला. उन दिनों दंडकारण्य में बहुत से ऋषि-मुनि रहते थे. वे सभी देवताओं के निमित्त यज्ञ में आहुति दे रहे थे. रावण सेना के साथ वहां से गुजरा.देवों को ये ऋषि पुष्ट कर रहे हैं, यह सोचकर रावण का खून खौलने लगा. रावण ने उनको जान से मारने की बजाये उनको दंड देना, डराना और इसके लिये उनका खून निकालना ही बहुत समझा.

रावण के सैनिकों ने ऋषियों के शरीर में गहराई तक बाण चुभो कर खून निकाला. अब इस खून को रखें कहां!

पास ही गत्समद ऋषि की कुटिया थी जिसके भीतर एक सुंदर कलश रखा था.

गत्समद हवन के लिए लकड़ियां लेने गये थे. सैनिक वह घड़ा उठा लाए और कई ऋषि मुनियों का रक्त उसमें इकट्ठा कर लिया.

गत्समद ऋषि सौ पुत्रों के पिता थे. वह चाहते थे कि उनको एक बेटी हो और वह भी लक्ष्मी का अवतार. सो उन्होंने माता लक्ष्मी से विनती की कि माता लक्ष्मी उनके घर पुत्री रूप में जन्म लें.

इसके लिये वह हर रोज मंत्र पढकर एक कुश की नोक से उस घड़े में दूध की एक बूंद डाला करते थे. बाद में वह उसे विशेष अनुष्ठान से माता लक्ष्मी को अर्पितकर पुत्री रूप में आने की विनती करने वाले थे.

इसी दूध वाले घड़े में ऋषि मुनियों का खून इकट्ठा कर सैनिकों ने रावण को सौंप दिया.

रावण वह घड़ा लेकर लंका पहुंचा और घड़े को अपनी पत्नी मंदोदरी को देकर कहा कि इस कमंडल को संभाल कर रखना.मंदोदरी ने पूछा- इसमें है क्या? रावण के लिये ऋषि मुनि जो लोगों को धर्म और सदाचार की राह दिखाते थे उनकी रगों में बहने वाला रक्त जहर बराबर ही था. अत: रावण ने कहा, इसमें दुनिया का सबसे विषैला जहर है.

यह कहकर रावण विश्वविजय को चला गया और फिर कई बरस नहीं लौटा. रावण ने समस्त लोक जीत लिए.

ताकत के घमंड में चूर उसने दानवों, यक्षों, गंधर्वों की सुंदरतम कन्याओं को अपने साथ ले जाकर मंदराचल, हिमवान और मेरू जैसे पर्वतों और जंगलों में भोग-विलास में रत रहने लगा.

मंदोदरी रावण का इंतज़ार करती रही. पति की इस उपेक्षा ने उसे बहुत दुःखी कर दिया था.

दूसरी स्त्रियों के कारण पति ने अपनी प्रिय पत्नी की बरसों खोज खबर न ली, यह सोचकर मंदोदरी बहुत दुखी थीं.

उन्हें जीवन व्यर्थ लगा और उन्होंने इसे त्यागने का विचार किया.

मंदोदरी को रावण द्वारा दिए गए विषैले घड़े की याद आई. उसमें जो भी काला काला सा तरल था उसे विष समझ कर मंदोदरी एक झटके में पी गयी.

उसे पीने के बाद मंदोदरी मरी नहीं, ऋषि गत्समद द्वारा घड़े में मंत्र पढकर डाले गये दूध की दो चार बूंदे और माता लक्ष्मी का प्रभाव खून पर हावी रहा.

इसका प्रभाव यह हुआ कि मंदोदरी को गर्भ ठहर गया. कुछ दिनों बाद यह राज जब मंदोदरी पर उजागर हुआ तो वह घबरा गई.

जब उसके पति रावण भी यहां पिछले कई वर्षों से नहीं हैं फिर भी वह गर्भवती हो गई है. यह सब कैसे हुआ मंदोदरी यह सोचकर तो परेशान थी ही साथ ही उसे भया था कि उसके अखंड पातिव्रत्य पर लांछन लगेगा.

महल की अन्य स्त्रियां उसे कुलटा कहेंगी, उसका कोई सम्मान न करेगा.

यह सब सोचकर मंदोदरी परेशान थी. उसे एक उपाय सूझा.मंदोदरी ने तीर्थयात्रा पर जाने का बहाना बनाया और इसके लिए विशेष विमान बुलवाया. उस विमान में रहकर भी वह अप्रकट थी. तीर्थ करने के बहाने विमान से कुरुक्षेत्र आ गईं.

यहां आकर मंदोदरी ने गर्भ गिरा दिया और उस अजन्मे बच्चे को एक सुंदर से कलश में रख जमीन में गाड दिया.

इतना सब करने के बाद मंदोदरी लंका लौट गयी. कुछ समय बीत जाने के बाद राजा जनक की मिथिला में भयानक अकाल पड़ा.

राजा जनक का लगभग समूची धरती पर ही राज था. ज्योतिषियों ने हिसाब-किताब लगाकर बताया कि कहां हल चलाने से वर्षा होगी और समूचे देश में अन्न उपजेगा.

उन्हीं के कहने पर वे कुरुक्षेत्र गए और बतायी गयी जगह पर ही सोने के हल से खेत को जोता. हल ने जब जमीन को फाड़ा तो एक कलश निकल आया.

कलश खोलकर देखा गया तो उसमें एक नवजात कन्या थी. कन्या के कलश से निकलते ही आसमान से फूलों की बारिश होने लगी.

इस पुष्पवर्षा के बीच एक आकाशवाणी हुई- राजा जनक! कन्या अब तुम्हारी जिम्मेदारी है. हल की रेखा (सीत) से निकलने के कारण इस कन्या का नाम सीता होगा.

क्या सीता जी वास्तव में रावण की बेटी थीं और यह बात रावण को पता थी? राम कथा के कई प्रसंग इस तरफ इशारा करते हैं.रावण ने ब्रह्माजी से वरदान मांगते कहा भी था कि जब मैं अपनी ही कन्या की इच्छा करूं तब मेरी मृत्यु हो. जल्द ही मैं मंदोदरी की एक कथा भी आपको सुनाऊंगा. उसमें सीता माता के जन्म की अलग कहानी है.

सीता माता असल में किस की पुत्री हैं इन सब सवालों का जवाब देने में हम कहां सक्षम हैं, यह तो प्रभु ही जाने, हम तो बस जो कुछ विद्वानों ने उनकी लीला को धर्म ग्रंथों और पुराणों में बखाना है उसको जस का तस रख सकने भर का ही काम कर सकते हैं. बाकी निर्णय आपका.

रावण ने मनुष्य को हेय दृष्टि से देखा. श्रीहरि और लक्ष्मीजीने मानवरूप धरकर ही उसका संहार किया. उसने वानरों का भी बड़ा माखौल उड़ाया था इसलिए वानर सेना ने उसका कुल नष्ट कर दिया.

किसी को उसके रूप या कुल के आधार पर अधम या हेय नहीं समझना चाहिए. आपको यदि शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त होता है तो उस सामर्थ्य को माता भगवती को समर्पित कर देना चाहिए.

फिर उनकी अनुमति से ही उस शक्ति का प्रयोग करना चाहिए. ऋषि-मुनियों ने तप से जो शक्ति प्राप्त की थी वह अतुलित थी लेकिन वे उसका प्रयोग अनायास ही नहीं कर देते थे. वे स्वयं राजाओं देवों आदि की सहायता लेते थे असुरों से रक्षा के लिए, हालांकि वे स्वयंसमर्थ थे.

कोई ऋषि किसी को शाप देता था तो वह शाप उसके जीवनकाल में अर्जित पुण्यों की संगठित शक्ति थी. उस शाप के साथ ही उसकी शक्तियां समाप्त हो जाती थीं और उसे फिर से घोर तप करना होता था.

उनके लिए जो तप था वह सामान्य लोगों के लिए बताए तप से कई गुना ज्यादा होता है. कारण- ईश्वर कहते हैं तुम शक्ति संपन्न थे. तुमने शक्ति का ह्रास किया. उसे फिर से पाने के लिए ज्यादा त्याग चाहिए अन्यथा तुम इसका बार-बार प्रयोग करते रहोगे तो मोक्ष के लिए तप कब करोगे.

विधि का यही विधान है. आप शक्तिशाली हैं तो आपका दायित्व ज्यादा है. आपको तो वह शक्ति ज्यादा सोच-समझकर खर्च करनी है.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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