भूले से भी न हो शनिदेव का अपमान, भुगतने पड़ते हैं घोर परिणाम
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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.आपने शनि चालीसा पढ़ी होगी. उसमें इस प्रकार से दोहे आते हैं-
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगली गै हारा।।
हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवाय तोरी।।
भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तैलिहिं घर कोल्हू चलवायो।।
आपने चालीसा पढ़ी तो अनेकों बार पर क्या इन पदों के पीछे की कथा जानते है. शनिदेव का भूले से भी अपमान हो जाए तो क्या-क्या संकट आ जाते हैं. आपको आज वह कथा सुनाते हैं.
उज्जैन में नवरात्र के प्रत्येक दिन बड़े-बड़े विद्वानों का जमावड़ा लगता था और प्रत्येक दिन एक ग्रह पर धर्मचर्चा होती थी. विक्रमादित्य स्वयं बहुत बड़े विद्वान थे. वह इस चर्चा में सक्रिय रहते थे.
नवरात्र के आखिरी दिन चर्चा शनि ग्रह को लेकर शुरू हुई थी. शनि आराधना और शनि प्रभाव पर सुंदर चर्चा चल रही थी कि अचानक विक्रमादित्य ने उसे तीखा रूप दे दिया.
सम्राट विक्रमादित्य ने अचानक ही कह दिया कि शनिदेव की तो पूजा ही नहीं करनी चाहिए. वह पूजन योग्य हैं ही नहीं. विक्रमादित्य की बात से सभी विद्वान हैरान थे. उन्होंने राजा से कहा कि वह ऐसा क्यों कह रहे हैं. उन्हें ऐसा कहना शोभा नहीं देता.
विक्रमादित्य भी अपनी बात पर जमे रहे. वह पीछे हटने को तैयार न थे. उन्होंने तर्क देना शुरू कर दिया.
विक्रमादित्य बोले- शनि ने अपने पिता सूर्य और गुरु बृहस्पति को बहुत कष्ट दिया. जो पिता और गुरू का सम्मान न करे, उन्हें सिर्फ कष्ट पहुंचाए वह सम्मान का अधिकारी कैसे होगा?
शनि लोगों को भी सिर्फ सताते ही हैं इसलिए उनकी पूजा नहीं होनी चाहिए. जो देव ऐसे प्रतिशोध के भाव रखे उसकी पूजा तो होनी ही नहीं चाहिए.जबकि वहां उपस्थित एक विद्वान ब्राहमण ने समझाया कि आप शनि के कर्मों की व्याख्या सो सही संदर्भ में नहीं ले रहे. शनि की ताकत धरती पर धर्म की रक्षा करती है. इसलिए वह महान और पूजनीय हैं.
यदि शनि का प्रभाव न रहे तो व्यक्ति निरंकुश स्वभाव का होकर सबका अहित करे. कर्मों का दंड देकर शनि विधि-व्यवस्था बनाए रखते हैं. यह आवश्यक है.
दैवयोग से विक्रमादित्य तो उस दिन कुछ सुनने को तैयार ही न थे. उन्हें तो शनिदेव में सबकुछ निंदनीय ही लगता था.
ब्राह्मण ने कहा- महाराज! आपकी कुंडली के बारहवें घर में शनि हैं. यह बहुत खराब योग है. आपको इस बात को लेकर विशेष रूप से सतर्क रहने की आवश्यकता है.
आप शनि का भूले से भी अपमान न किया करें. जितना संभव हो उन्हें प्रसन्न रखें ताकि आप उनकी कोप दृष्टि ज्यादा न हो.
विक्रमादित्य तो अहंकार में चूर थे. उन्होंने कहा- हो सकता है पर मैं शनि को महान नहीं मान सकता. मुझे चुनौती स्वीकार है. जो होना है होकर रहेगा.
मेरे साथ मेरी प्रजा और महादेव का आशीर्वाद है. शनि चाहकर भी मेरा कोई अनिष्ट नहींं कर सकते. मैं उन्हें चुनौती देता हूं.
विक्रमादित्य ने बुद्धिभ्रम में पड़कर शनिदेव का अपमान कर दिया.इस घटना के कुछ दिनों बाद सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में घोड़े का व्यापारी आया. उसके पास ऐसे सुंदर घोड़े थे जैसे वे इस लोक के हों ही नहीं. देवलोक के अश्व दिखते थे. उन अश्वों पर किसी को भी लोभ आ जाए.
व्यापारी बोला- महाराज आपके राज्य की संपन्नता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी पर अनुभव वैसा नहीं है. यहां तो मेरा घोड़ा खरीदने वाला कोई भी नहीं है.
आप देखें इसे, मेरा घोड़ा महंगा तो है पर साधारण नहीं है. अद्भुत खूबी वाला है. यह एक छलांग में आसमान पर तो दूसरे में धरती पर पहुंच जाता है.
घोड़े आकर्षक तो थे पर एक छलांग में आसमान की बात पर विक्रमादित्य को विश्वास नहीं हुआ जो कि स्वाभाविक भी था. व्यापारी ने पूरे राज्य की संपन्नता पर प्रश्न कर दिया था इसलिए घोड़ा खरीदना भी जरूरी था.
राजा ने कहा कि घोड़ा तो वह खरीद लेंगे पर पहले सवारी करके खूबी जांचेंगे. व्यापारी मान गया.
विक्रमादित्य घोड़े पर बैठे. घोड़े ने छलांग लगाई और सचमुच पहली ही छलांग में उन्हें आसमान में ले गया पर दूसरी छलांग में घोड़ा धरती पर नहीं आया.
घोड़े ने धरती के कुछ ऊपर से ही राजा को उनके राज्य से बहुत दूर एक ऐसे जंगल में फेंक दिया जहां उन्हें जानने वाला कोई नहीं था.घायल विक्रमादित्य जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ रहे थे कि डाकुओं ने हमला कर दिया. उनके सिर पर मुकुट एवं अन्य आभूषण देखा तो समझे कि कोई व्यापारी है जो जंगल में धन छुपाने आया है.
उनके सारे आभूषण लूटने के बाद गड़े हुए धन के बारे में पूछते रहे पर ऐसा कोई धन हो तो विक्रमादित्य बताएं. डाकुओं को विश्वास न हुआ. उन्होंने क्रोध में राजा को खूब पीटा और मरा हुआ समझकर वहीं फेंक गए.
कुछ समय बाद विक्रमादित्य को होश आया. पीड़ा से कराह रहे थे. फि सोचा- डाकुओं ने गहने ही लिए जान तो नहीं ली. अब जंगल से निकला जाए.
वह पानी पीने नदी किनारे पहुंचे तो फिसलन पर पांव पड़ा और नदी की धारा में फंसकर बहते-बहते बहुत दूर चले गए.
वहां से किसी तरह किनारे पहुंच कर एक नगर में पहुंचे. फटेहाल और शरीर पर चोट के निशान वाले राजा सम्राट विक्रमादित्य भिक्षुक जैसे लग रहे थे.
भूख-प्यास से बेहाल विक्रमादित्य शहर में एक दूकान के सामने पेड़ के नीचे बैठ गए. दुकानदार की उस दिन बिक्री बहुत बढ़ गई.
दुकानदार ने सोचा यह दुकान के बाहर बैठा तो बिक्री बढ़ गई. क्यों न इस गरीब को इसी तरह रोज बिठाकर रखा जाए ताकि मुनाफा बढ़ता रहे.
लंबे समय तक इसी तरह बिक्री के लालच में दुकानदार ने विक्रम को घर चलकर भोजन करने का न्योता दिया.बातचीत में दुकानदार को विक्रमादित्य पसंद आ गए. उसने सोचा कि व्यक्ति है तो ज्ञानी. शरीर से भी ऊंचे कुल का लगता है, समय का मारा है.
क्यों न इससे अपनी इकलौती बेटी का ब्याह कर दिया जाए. इस तरह यह दुकान में बैठने लगेगा और घर में भी रहेगा. एक पंथ दो काज हो जाएंगे.
उसने अपनी बेटी के लिए विक्रमादित्य को चुन लिया. दुकानदार ने बेटी को भी अपनी सारी योजना बता दी और कहा कि वह भी विक्रम से बात कर परख ले. पुरुष गुणवान है.
बेटी विक्रमादित्य से बातचीत के लिए उस कमरे में पहुंची जहां उन्हें ठहराया गया था. थके होने के कारण विक्रमादित्य को लेटते ही गहरी नींद आ गई.
कन्या उनके जागने का इंतज़ार कर रही थी पर दैवयोग से उसे खुद जोरों की नींद आने लगी.
दुकानदार की बेटी ने अपने गहने उतारकर दीवार पर बने एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया और सो गई. विक्रमादित्य की नींद खुली तो देखा कि चित्र का बत्तख कन्या के गहने निगल रहा है.
घबराहट में उन्होंने दुकानदार की बेटी को पुकारा. जब तक वह जागी तब तक तो गहने गायब हो चुके थे. उसने शोर मचाया कि अतिथि चोर है. चोरी करने के बाद बहाने बना रहा है.विक्रमादित्य को राजा के पास ले जाया गया. राजा ने हाथ पैर काटकर रेगिस्तान में छोड़ देने का फैसला दिया. ख़ून से लथपथ विक्रमादित्य को रेगिस्तान में छोड़ दिया गया. वह वहां पर घिसटते रहते.
एक दिन एक महिला वहां से गुजर रही थी कि उसकी नजर विक्रमादित्य पर पड़ी. उस महिला का मायके उज्जैन में था किंतु उसका विवाह दूर देश में हुआ था. महिला ने देखा और पहचान लिया.
उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनके गायब होने से बहुत चिंतित हैं. उसने अपने ससुराल वालों से विनती कर अपने घर में रखवा लिया. परिवार वाले मजदूर किसान थे.
अपंग राजा को कोई स्वीकार नहीं करेगा. राजा कमजोर हुआ तो मंत्रियों और सेना में फूट पड़ जाएगी और सिंहासन पर कब्जे की लड़ाई में गृहयुद्ध शुरू होगा. इससे बेहतर है कि वहां यही भ्रम बने रहने दिया जाए कि राजा कहीं गुप्तरूप से किसी अभियान पर हैं.
यह सोच विक्रमादित्य ने स्त्री से कहा कि वह अभी उज्जैन वापस नहीं जाना चाहते. वह भी उस परिवार के साथ खेतों में निगरानी और हांक लगाने के काम में लग गए. एक शाम विक्रमादित्य घर पर कुछ कर रहे थे कि काम कर रहे थे कि हवा से मोमबत्ती बुझ गयी.विक्रमादित्य ने दीपक राग गाया तो उनके साथ सारे शहर की मोमबत्तियां जल उठीं. संयोग से नगर की राजकुमारी ने ऐसा चमत्कार करते देख लिया और उस दीपक राग गाने वाले से ही शादी करने की जिद ठान ली.
जब उसे पता चला कि जिस गायक से विवाह करना चाहती है उसके न तो हाथ हैं न पांव तो वह दुखी हुई. इसके बावजूद राजकुमारी ने शादी का राग नहीं छोड़ा. विक्रमादित्य को राजा के सामने लाया गया.
राजा आग बबूला हो गया. उसने पहचान लिया और बोला यही था जिसने पहले चोरी की अब राजकुमारी को हथियाना चाहता है. उसने विक्रमादित्य की गरदन उड़ाने के लिये तलवार निकाल ली. विक्रम को आंखों के आगे मौत नाच गयी.
वह भांप गए कि यह सब शनि के कोप के चलते हो रहा है. अपनी मौत से पहले विक्रम ने शनि से प्रार्थना की और अपनी ग़लतियों को स्वीकार कर कहा आप महान हैं मुझे ही घमंड हो गया था. शनि प्रकट हुए और उनके गहने, हाथ, पैर और सब कुछ वापस लौटा दिया.
विक्रमादित्य ने शनि से कहा- हे शनिदेव! मैं मजबूत था ऐसी पीड़ा झेल गया पर किसी साधारण व्यक्ति को आप ऐसी कष्ट कभी मत देना. वे सहन न कर पाएंगे. यह मेरा अनुरोध है. शनि ने बात मान ली.
हाथ पैर गहने मुकुट मिले तो राजा ने अपने सम्राट को पहचान लिया और अपनी बेटी उनको दे दी. उसी समय दुकानदार ने महल में आकर कहा- बतख ने गहने उगल दिए हैं. उसने भी विक्रम को अपनी बेटी सौंप दी. शनि के आशीर्वाद के साथ सम्राट विक्रम उज्जैन लौट आए.
(स्रोत: कर्नाटक का पारंपरिक यक्षगान)
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