दैत्यों की माता ने की इंद्रहंता पुत्र की कामना, इंद्र ने किए दिति के गर्भ के 49 टुकड़ेः भागवत कथा में आज मरूदगणों की उत्पत्ति की कथा
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श्रीहरि ने दिति के दोनों पुत्रों हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु का वध कर दिया. दिति इसके लिए इंद्र को दोषी मानती थीं. उन्होंने एक इंद्रहंता पुत्र को जन्म देने की सोची.
दिति ने बिना मंशा जाहिर किए कश्यप मुनि की खूब सेवा की. सेवा और पत्नी के रूप-लावण्य से कश्यप प्रसन्न हो गए. उन्होंने दिति से वरदान मांगने को कहा.
दिति बोलीं-“किसी वरदान के लोभ में सेवा नहीं की. पति को सुख देना पत्नीधर्म है मैं उसका निर्वाह कर रही थीं.” चिकनी-चुपड़ी बातें किसी की भी मति हर लेती हैं.
कश्यप काम के प्रभाव में मत हुए और पत्नी की मंशा नहीं समझ पाए. दिति ने वचन लेकर मांगा- एक ऐसे पुत्र का वरदान दीजिए जो मेरे पुत्रों के नाश के कारक इंद्र का अंत कर सके.
कश्यप आवाक रह गए. वह वचनबद्ध थे. इंद्र भी उने पुत्र थे लेकिन छल से पत्नी ने सौतेले पुत्र के नाश करने वाले एक पुत्र का वरदान ले दिया था. कश्यप ने एक उपाय निकाला.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
उन्होंने दिति से कहा- तुम्हें ऐसे पुत्र का वरदान मिल सकता है लेकिन इसके लिए तुम्हें एक वर्ष तक कठोर पुंसवन व्रत का पालन करना होगा. यदि व्रत में चूक हुई तो तुम्हारा पुत्र इंद्र का शत्रु नहीं बल्कि मित्र हो जाएगा.
इंद्रघाती पुत्र के लिए दिति कठोर नियमों वाले पुंसवन व्रत को राजी हो गईं. व्रत का एक नियम यह भी था कि दिति जूठे मुंह नहीं सो सकतीं. यदि जूठे मुंह सोईं तो गर्भ की रक्षा करने वाला तेज समाप्त हो जाएगा.
इंद्र को जब पता चला कि दिति उनके हत्यारे पुत्र के लिए कठोर व्रत कर रही हैं तो वह वेष बदलकर पिता के आश्रम में रहने लगे और सौतेली माता की खूब सेवा करते.
इंद्र दिति के गर्भ का नाश करने के लिए ताक लगाए रहे. कठोर व्रत से कमजोर हुई दिति को एक दिन जूठे मुख ही नींद आ गई. इंद्र के लिए यह एक अच्छा अवसर था.
इंद्र दिति के गर्भ में प्रवेश कर गए. सोने के समान चमकते गर्भ को इंद्र ने सात टुकड़े कर दिए तो गर्भ रोने लगा. घबराकर इंद्र ने उन सातों के भी सात-सात टुकड़े कर दिए.
दिति ने गर्भकाल में नारायण की घोर उपासना की थी इस कारण शिशु अवध्य हो गया था. इंद्र और टुकड़े करने को तैयार हुए तो शिशुओं ने कहा- हम तो तुम्हारे भाई मरूदगण हैं. हमारा वध क्यों करते हो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
इंद्र को पछतावा हुआ. उन्होंने मरुदगणों से माफी मांगी और उन्हें सोमपान का अधिकारी बनाकर मित्रता कर ली और सबको साथ लेकर गर्भ से बाहर आ गए.
दिति ने इंद्र के साथ 49 तेजस्वी पुत्रों को देखा तो इंद्र से पूछा- मैंने तो सिर्फ एक इंद्रहंता पुत्र की कामना की थी, ये 49 कहां से आ गए. पुत्र सत्य बताओ कोई बात न छुपाना.
इंद्र ने सारी बात दिति को बता दी. साथ ही उन्हें यह भी बता दिया कि मरुदगण अब देव हो चुके हैं. दिति का सारा क्रोध समाप्त हो गया. इंद्र मरूदगणों को लेकर इंद्रलोक चले गए.
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संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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