शनि को सभी क्रूर समझते हैं पर क्या जानते हैं शनिदेव को अकारण ही मिला था यह शाप

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भगवान सूर्य तथा छाया के पुत्र शनिदेव जब गर्भ में थे, तब छाया ने शिवजी की घोर तपस्या की. तपस्या के दौरान छाया ने अन्न त्याग दिया था. आहार न लेने के कारण छाया के गर्भ में स्थित बालक शनिदेव का रंग काला पड़ गया.
तेजस्वी सूर्य इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि उनकी संतान इतनी काली होगी. सूर्यदेव को छाया के चरित्र पर संदेह हुआ और उन्होंने काले रंग के शनि को अपनी संतान नहीं माना. अपमानित छाया ने शनिदेव से कहा कि तुम्हें ही मुझे इस अपमान से उबारकर सम्मानित कराना होगा.
शनिदेव ने घोर तपस्या की और भगवान शंकर को प्रसन्न किया. शिवजी ने वरदान मांगने को कहा. शनिदेव ने मांगा कि उनकी माता को कैलाश पर सम्मानित रूप से स्थान मिले. भगवान शिव बालक की मातृभक्ति से बहुत प्रसन्न हुए.
शिवजी बोले बालक तुमने माता के सम्मान के लिए इतनी घोर तपस्या की है इसलिए तुम ग्रहों के बीच दंडाधिकारी की तरह स्थित रहोगे. शनिदेव श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे. शनिदेव का विवाह चित्ररथ की तेजस्विनी पुत्री से हुआ.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शनिदेव की पत्नी एकबार पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से शनिदेव के पास आईं और उनसे प्रणय निवेदन किया. शनिदेव श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न थे और उन्हें पत्नी की बात सुनाई ही नहीं दी. पत्नी ने कई बार उनसे अनुरोध किया पर ध्यान में खोए शनि ने पत्नी की ओर देखा तक नहीं.
उनकी पत्नी को लगा कि शनिदेव जानबूझकर उनका निवेदन ठुकरा रहे हैं. क्रोधित होकर उन्होंने शनिदेव को शाप दिया- बार-बार निवेदन के बावजूद आपने मेरी ओर देखा तक नहीं. इसलिए आज से आप जिसको भी देखेंगे वह नष्ट हो जाएगा.
शापित शनिदेव ने पत्नी को बताया कि वह ध्यान में मग्न थे इसलिए उन्हें सुनाई नहीं पड़ा. यह सुनकर उनकी पत्नी को पछतावा तो हुआ किंतु शाप वापस लेने की क्षमता उनमें नहीं थी. शाप के कारण किस का अनिष्ट न होने पाए इसलिए शनिदेव हमेशा अपना सिर झुकाकर रहने लगे.
कैलाश पर माता पार्वती बालक गणेशजी का जन्मोत्सव कर रही थीं. उन्होंने शनिदेव को भी निमंत्रण भेजा. शनिदेव आए, किंतु शाप के कारण उन्होंने न तो देवी पार्वती की ओर देखा न ही बालक को. पार्वती के पूछने पर शनिदेव ने पत्नी के शाप की बात कह सुनाई किंतु पार्वतीजी नहीं मानीं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.उन्होंने गणेशजी को शनि की गोद में रख दिया. शनि की दृष्टि पड़ते ही गणेशजी का सिर धड़ से अलग हो गया. हाहाकर मच गया. श्रीविष्णुदेव ने हाथी का मस्तक जोड़कर गणेशजी को फिर से जीवित किया. देवी पार्वती बालक के सिर कटने से अत्यंत क्रोधित हुईं.
उन्होंने शनिदेव को शाप दिया कि तुम्हारा अंग-भंग हो जाएगा. विष्णुदेव समेत सभी देवों ने पार्वती का विरोध किया क्योंकि शनि ने तो पार्वती को पहले ही सब बता दिया था. देवी को भूल का अहसास हुआ.
उन्होंने शनि को आशीर्वाद दिया कि तुम ग्रहों में श्रेष्ठ तो रहोगे ही, देव भी तुमसे भयभीत रहेंगे. तुम पर अब किसी अन्य शाप का प्रभाव नहीं होगा. अगर किसी पर तुम नाराज हो गए तो फिर उसका कल्याण तुम्हारे अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकेगा.
देवी पार्वती के शाप का असर हुआ कि रावण ने मेघनाथ को सर्वशक्तिमान और दीर्घजीवी बनाने के लिए शनि समेत सभी ग्रहों को उत्तम कक्ष में स्थापित कर दिया था लेकिन मेघनाथ के जन्म के ऐन समय पर शनिदेव ने अगले कक्ष में पांव रख दिया जिससे मेघनाथ अजेय नहीं हो सका.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.क्रोध में रावण ने शनिदेव पर गदा से प्रहार किया जिसके कारण वह लंगड़े हो गए. यही कारण है कि शनिदेव लंगड़ाकर चलते हैं और शीघ्र क्रोधित हो जाते हैं. यह कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण से है. शिव पुराण के अऩुसार शिवजी ने गणेशजी को शीशविहीन किया था. कौन सी कथा सत्य और कौन असत्य यह तो प्रभु की माया वही जानें.
हम तो आपके समक्ष अपने धर्मग्रंथों की कथाएं प्रस्तुत कर रहे हैं. गणेशजी गजमुख हैं यह तो सार्वभौम सत्य है. आस्था में अविश्वास उचित नहीं. इसलिए उस सार्वभौम सत्य के साथ बढ़ते हैं. यह भी संभव है कि हमारे पुराणों आदि में बाद में कुछ छेड़छाड़ हुए हों या वेदव्यास जी द्वारा रचित वास्तिवक पुराण गुम हो गए हों.
बाद में सहेजने के लिए इन्हें कई हिस्से में जोड़ा गया हो उस दौरान कथाओं में कोई छोटी मोटी विसंगति रह गई हो जिससे कई बार कथाएं थोड़ी अळग हो जाती हैं. मानिए तो देव नहीं तो पत्थर, ईश्वर के प्रति विश्वास का भाव मानसिक शांति देगा, अविश्वास बेचैनी. शांति पथ सर्वोत्तम है.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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