Advertisement728 × 90

आज क्यों सबसे जरूरी हो गई है गोवर्धन पूजा? भगवान को क्यों चढ़ता है 56 भोग? गोवर्धन पूजा की विधि, व कथा

आज क्यों सबसे जरूरी हो गई है गोवर्धन पूजा? भगवान को क्यों चढ़ता है 56 भोग? गोवर्धन पूजा की विधि, व कथा

krishna-govardhan
अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें

भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा की थी उसी के उपलक्ष्य में दीवाली की अगली सुबह गोवर्धन पूजा और अन्नकूट उत्सव मनाया जाता है. इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है.

यह पर्व खासतौर से किसान और पशुपालक लोग मनाते हैं. इसके लिए घरों में खेत की शुद्ध मिट्टी अथवा गाय के गोबर से घर के द्वार पर, घर के आंगन अथवा खेत में गोवर्धन पर्वत का स्वरूप बनाया जाता है और उन्हें 56 भोग चढ़ाया जाता है.

भगवान ने इंद्र द्वारा भेजे प्रलयंकारी बादलों से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए सात दिनों तक पर्वत को उंगली पर उठाकर रखा था. उन सात दिनों में भगवान ने भोजन भी नहीं लिया था. बालरूप भगवान प्रतिदिन आठ बार आहार लेते थे.

इसलिए जब इंद्र ने आकर क्षमा मांग ली और वर्षा रूक गई तो ब्रजवासियों ने अपने प्रिय कन्हैया के लिए सात दिनों के हिसाब से 56 भोग एक साथ खाने को परोस दिए. प्रभु अपने प्रियजनों की सरलता से भाव-विभोर हो गए और उन्होंने उसे प्रसाद स्वरूप सबके साथ ग्रहण किया.इसलिए आज के दिन 56 प्रकार के भोजन और सभी के एक साथ बैठकर भोजन करने को मंगलकारी बताया जाता है. गोवर्धन पूजा साधारण पूजा नहीं, प्रकृति की उपासना, प्रकृति से प्रेम और आपसी एकता का बहुत बड़ा संदेश है.

गौ का जैसा अपमान हो रहा है, समाज में जो एकता खत्म हो रही है और विधर्मियों का जैसे-जैसे प्रभुत्व बढ़ रहा है उसे देखते हुए आज यह पूजा श्रीकृष्ण के युग से ज्यादा प्रासंगिक हो गई है.

गोवर्धन पूजा की विधि:

सुबह जल्दी स्नान किया जाता है. फिर घर की रसोई में ताजे पकवान बनाये जाते हैं. घर के आंगन में अथवा खेत में गोबर से भगवान गोवर्धन की प्रतिमा बनाई जाती है.

साथ में गाय, भैंस, खेत खलियान, बैल, खेत के औजार, दूध दही एवम घी वाली, चूल्हा आदि को गोबर अथवा मिट्टी से बनाया जाता हैं. कृषि उपकरणों की भी पूजा की जाती हैं.इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरा गांव-समाज भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन धारण की कथा सुनकर आरती करने के बाद एक साथ भोजन करता है.

इस दिन गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का भी बहुत अधिक महत्व होता है.

गोवर्धन धारण की कथा-

भगवान श्रीकृष्ण की वृन्दावन में लीलाएं चल रही थीं. अपनी लीलाओं से प्रभु अनेक शापित जीवों का जो शापवश वृक्ष और राक्षस आदि बने थे उनका उद्धार कर रहे थे.

प्रभु गाएं चराते थे. वृंदावन के लोगों की आजीविका का सबसे बड़ा साधन पशुधन था किंतु उसका वैसा सम्मान नहीं था जो होना चाहिए. प्रभु ने गोप-गोपियों को सदबुद्धि देने के लिए लीला रची.

गोप इन्द्रोज यज्ञ की तैयारी कर रहे थे. इंद्र को तरह-तरह के भेंट-उपहार अर्पित करने के लिए सारा गोकुल जुटा हुआ था. इस आपाधापी में वे अपने गोधन की भी अनदेखी कर रहे थे. भगवान से यह न देखा गया.

श्रीकृष्ण ने नंदबाबा से पूछा कि यज्ञ क्यों किया जा रहा है. नंद बोले- इंद्र के कारण ही हमें जल और अन्न प्राप्त होता है. उन्हें प्रसन्न करना जरूरी है. वह कुपित हो गए तो बाढ़ या सुखाड़ हो सकता है.इंद्र की कृपा से जो अन्न प्राप्त होता है वह हम उन्हें वापस भेंट कर देते हैं. जो शेष रहता है उसी से हम मनुष्यों को जीवनयापन की अनुमति है. मनुष्य की खेती और प्रयत्नों का फल देने वाले इंद्र ही हैं इसलिए उनकी उपासना जरूरी है.

श्रीकृष्ण बोले- पिताजी हमें अपने कर्म अच्छे रखने चाहिए. कर्म गति देह त्यागने के बाद भी हमारी आत्मा के साथ होती है. जो प्रत्यक्ष हमें जीवन दे रहा है उसकी उपेक्षा करके अप्रत्यक्ष की अर्चना तो अनुचित हैं. हमारे जीवन का आधार गोवर्धन और गोधन हैं. उनकी पूजा होनी चाहिए.

हम न तो किसी बड़े राज्य के स्वामी हैं. हमारे पास तो अपना घर भी नहीं. गोवर्धऩ पर्वत ने आसरा दिया है. हमारे गोधन के लिए भोजन भी गोवर्धन प्रदान करते हैं. इसलिए इंद्र यज्ञ के लिए जो सामग्री जुटाई गई है उससे गोवर्धन और गायों की पूजा करें.

प्रभु को इंद्र का अभिमान तोड़ना था. उनकी ओजस्वी वाणी से सभी सहमत हो गए और इंद्र के लिए यज्ञ के स्थान पर गोवर्धन पूजा की तैयारी शुरू हुई. गोवर्धन महाराज की पूजा हुई. छप्पन भोग, छत्तीस व्यंजन का भोग लगाया गया.

भगवान श्रीकृष्ण गोपों को विश्वास दिलाने के लिए गिरिराज पर्वत के ऊपर दूसरे विशाल रूप में प्रकट हो गये और उनकी सामग्री खाने लगे. यह देख सभी ब्रजवासी बहुत प्रसन्न हो गए.

जब अभिमानी इन्द्र को पता लगा कि ब्रजवासी मेरी पूजा को बंद करके किसी पर्वत को पूज रहे हैं, तो वह बहुत क्रोधित हुए. तिलमिलाकर प्रलय करने वाले मेघों को ब्रज पर मूसलाधार पानी बरसाने की आज्ञा दी.

इन्द्र की से ब्रज मण्डल पर प्रचण्ड गड़गड़ाहट, मूसलाधार बारिश एवं भयंकर आँधी-तूफ़ान चलने लगा. लगता था कि अब ब्रज का विनाश हो जाएगा. ब्रजवासी दुखी और भयभीत थे और श्रीकृष्ण से बताया कि इंद्र को कोप से यह सब हो रहा है.

श्रीकृष्ण ने गोपों से कुटुंबजनों और गोधन के साथ गोवर्धन की शरण में चलने को कहा. उन्होंने हमारी पूजा स्वीकार की है ,वही रक्षा करेंगे. ब्रज मण्डल गोवर्धन के नीचे जमा हुआ तो श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में अपने बाएं हाथ की छोटी उंगली पर गोवर्धन को उठा लिया.

श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र आदेश दिया कि पर्वत के ऊपर विराजो और सम्पूर्ण जल को सोख लो. इंद्र के आदेश पर सात दिनों तक प्रलय मेघ जल बरसाते रहे. श्रीकृष्ण ने सात दिन तक गिरिराज पर्वत को उठाये रखा.सभी ब्रजवासी आनन्दपूर्वक उसकी छ्त्रछाया में सुरक्षित रहे. सुदर्शन ने ब्रजमंडल में जल का प्रवेश होने नहीं दिया इससे उनके घऱ सुरक्षित रहे. इन्द्र का अभिमान टूट चुका था. उन्होंने मेघों को रोका और प्रभु की स्तुति कर क्षमा मांगी.

धूप निकली तो श्रीकृष्ण ने सबको पर्वत की छतरी से बाहर निकल जाने को कहा. सबसे निकलने पर प्रभु ने पर्वत को वापस उनके स्थान पर रख दिया. ब्रजवासियों ने मंगलगान गाया और वृद्धों ने श्रीकृष्ण की आरती उतारी और आशीष दिया.

एक कथा में आता है जब श्रीराम समुद्र पर सेतु बांध रहे थे तब हनुमानजी गोवर्धन को लेकर सेतु बनाने के लिए उड़े. किंतु उन्हें आकाशवाणी हुई कि सेतु कार्य पूरा हो चुका है. हनुमानजी ने पर्वत को भूमि पर रख दिया.

गोवर्धन दुखी हो गए. उन्होंने कहा- मैं प्रभु के चरणों के स्पर्श सुख से वंचित रह गया. आखिर मैंने कौन सा पाप किया था? हनुमानजी ने श्रीराम को गोवर्धन का दुख कह सुनाया.

प्रभु ने हनुमानजी से कहा-गोवर्धन ने कोई पाप नहीं किया. मैं उसकी भक्तिभावना से प्रसन्न हूं इसलिए जब मैं श्रीकृष्ण अवतार लूंगा तो स्वयं गोवर्धन की पूजा करूंगा. प्रभु ने गोवर्धन को पूजनीय कर दिया.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
आप सभी Maa Durga Laxmi Sharnam एप्पस जरूर डाउनलोड कर लें. माँ लक्ष्मी व माँ दुर्गा को समर्पित इस एप्प में दुर्लभ मन्त्र, चालीसा-स्तुति व कथाओं का संग्रह है. प्ले स्टोर से डाउनलोड कर लें या यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करें. विनती है कि कृपया एप्प की रेटिंग जरूर कर दें.

ये भी पढ़ें-
देवी मां ने शाप के जरिये दिये वरदान, पूरी की भक्त की इच्छाएं
माता सीता ने क्या युद्ध में रावण के वंश के एक असुर का संहार भी किया था
जानिए विवाह का आठवां वचन क्या है?
पति को वश में रखने का द्रौपदी ने सत्यभामा को सिखाया तंत्र-मंत्र से ज़्यादा कारगर ये यंत्र-करवा चौथ स्पेशल

हम ऐसी कथाएँ देते रहते हैं. Facebook Page Like करने से ये कहानियां आप तक हमेशा पहुंचती रहेंगी और आपका आशीर्वाद भी हमें प्राप्त होगा: Please Like Prabhu Sharnam Facebook Page

धार्मिक चर्चा करने व भाग लेने के लिए कृपया प्रभु शरणम् Facebook Group Join करिए: Please Join Prabhu Sharnam Facebook Group

error: Content is protected !!