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उत्तम कर्म ही धर्म है और धर्म परब्रह्म की प्राप्ति का माध्यमः वेद व्यास ने युधिष्ठिर को सुनाई शंख और लिखित की महाभारत की नीति कथा

उत्तम कर्म ही धर्म है और धर्म परब्रह्म की प्राप्ति का माध्यमः वेद व्यास ने युधिष्ठिर को सुनाई शंख और लिखित की महाभारत की नीति कथा

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महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर को रक्तपात की पीड़ा सताने लगी. उनका मन विचलित हो गया. महर्षि वेद व्यास उनसे मिलने आए. उन्होंने कहा- आप परब्रह्म को प्राप्त करने का प्रयास करो तो मन को शांति मिलेगी.

युधिष्ठिर ने इसका मार्ग पूछा तो व्यासजी बोले- परब्रह्म वानप्रस्थ पर नहीं ब्लकि गृहस्थ आश्रम पर टिका हुआ है. तुम शास्त्र अनुसार धर्म का पालन करो. मैं तुम्हें दो ऋषि भाइयों शंख और लिखित की कथा सुनाता हूं.

शंख और लिखित नाम दो ऋषिकुमार थे. दोनों धर्मशास्त्र के ज्ञाता थे. अध्ययन समाप्त होने के दोनों ने विवाह किया और अपने-अपने आश्रम बनाकर अलग-अलग कर रहने लगे.

एक बार लिखित अपने बड़े भाई शंख के आश्रम पर मिलने गए. आश्रम में उस समय कोई नहीं था. लिखित को भूख लगी थी. इसलिए उन्होंने बड़े भाई के बाग से फल तोडा और खाने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

खाना शुरू ही किया था कि शंख आ गए. शंख ने छोटे भाई का सत्कार और कुशलक्षेम पूछने के बाद कहा- तुम मुझे मिलने आए, मेरी अनुपस्थिति में इस बाग को अपना मानकर फल ले लिया, इससे मैं प्रसन्न हूं.

किन्तु तुमसे अधर्म हो गया है. धर्म ही ऋषियों की पूंजी है. तुमसे उसका नाश हुआ है. किसी की अनुपस्थिति में और बिना उसकी अनुमति के कुछ लेने को चोरी कहा जाता है.

लिखित को बात समझ में आ गई. वह बोले- मुझसे प्रमादवश यह अपकर्म हो गया है. इसके प्रायश्चित का मार्ग बताइए? शंख बोले- राजा से यदि इस कर्म का दंड प्राप्त कर लो तो पाप का प्रायश्चित हो जाएगा.

लिखित राजदरबार गए. राजा ने उन्हें सम्मानित करना चाहा तो लिखित ने रोकते हुए कहा-राजन! इस समय में आपका पूजनीय नहीं. एक अपराधी हूं और आपसे दंड की कामना के साथ आया हूं.

लिखित ने सारा अपराध बताया. सुनकर राजा ने कहा- जैसे राजा को दंड देने का अधिकार है, वैसे ही क्षमा करने का भी अधिकार है.

लिखित ने रोका- आप का काम अपराध के दंड का निर्णय करना नहीं है. शास्त्र आपको विधान निश्चित करने का अधिकार नहीं देते. आप विधान को केवल क्रियान्वित कर सकते हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

लिखित तरह-तरह के तर्कों से राजा को दंड देने के लिए विवश करने लगे. उस समय के विधान के अनुसार चोरी का दंड था, चोर के दोनों हाथ काट देना. राजा ने लिखत के दोनों हाथ कलाई तक कटवा दिए.

कटे हाथ लेकर लिखित संतुष्ट मन से बड़े भाई के पास लौटे और कहा- मैं दंड ले आया. शंख ने कहा- मध्यान्ह-स्नान-संध्या का समय हो गया है. चलो स्नान संध्या कर आएं.

लिखित ने भाई के साथ नदी में स्नान किया. अभ्यासवश तर्पण करने के लिए उनके हाथ जैसे ही उठे तो अचानक पहले की तरह पूरे हो गए.

उन्होंने बड़े भाई की तरफ देख कर कहा- भैया! जब यह ही करना था तो आप ने मुझे राजधानी तक क्यूं दौड़ाया? शंख बोले- अपराध का दंड तो शासक ही दे सकता है; किन्तु ब्रह्मण को कृपा करने का अधिकार है.

व्यासजी बोले- युधिष्ठिर! देवता, पितर, अतिथि एवं अन्य सभी प्राणियों का पालन गृहस्थ आश्रम से होता है. जो गृहस्थ धर्म का आचरण करते हैं वे सर्वश्रेष्ठ है. आपने सर्वश्रेष्ठ गृहस्थों के कल्याण के लिए युद्ध का निर्णय किया. इसलिए युद्ध की पीड़ा त्यागकर जनकल्याण में जुटें.

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प्रभु शरणम्

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