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मानव ही सभी रोगों की जड़ है- महर्षि मुद्गल

मानव ही सभी रोगों की जड़ है- महर्षि मुद्गल

मनुष्य या मनुष्य की संगति में रहने वाले ही बीमार होते हैं. आपने ऐसा अनुभव किया है? महर्षि मुद्गल के शिष्य ने इसे अनुभव किया और कारण पूछा. मुद्गल ने सुंदर निदान दिया.

shankracharya
महर्षि मुद्गल अन्नदान के लिए जाने जाते थे. उन्होंने स्वर्ग का सुख भोगने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि उन्हें बताया गया कि स्वर्ग में सभी संपन्न हैं. वहां दान लिया दिया नहीं जाता.

मुद्गल ने स्वर्ग में रहने के स्थान पर पृथ्वी पर ही कुरुक्षेत्र तीर्थ में रहकर शिक्षा देने लगे. उनसे शिक्षा लेने की लालसा में देवपुत्र भी आते थे किंतु मुद्गल का शिष्य बनने के लिए एक कड़ी शर्त थी. उनके आश्रम में शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने के बाद व्यावहारिक सामाजिक ज्ञान पर शोध भी करना होता था.

उसके बिना गुरुकुल से जाने की अनुमति नहीं होती थी. गुरू अपनी दक्षिणा के रूप छात्रों से शोधकार्य ही कराते थे जो आगे किसी के काम आ सके.

मुद्गल का एक शिष्य शाकुंतल गुरु की आज्ञा से कई वर्ष तक देश-विदेश में घूमता रहा. भ्रमण शिक्षा का समय पूरा होने पर वह मुद्गल के आश्रम पहुंचा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.शाकुंतल ने महर्षि मुद्गल को अपनी यात्रा का विवरण विस्तार से सुनाया.

महर्षि ने उससे पूछा- तुमने अपनी यात्रा में सबसे अचरज या महत्व की बात क्या देखी?

शाकुंतल ने कहा- गुरुदेव! मैंने एक आश्चर्य देखा. धरती या पेड़ों पर रहने वाले, पानी या आकाश में विचरने वाले, सभी पशु पक्षियों को मैंने बिना बीमारी के निरोग जीवन जीते देखा.

उन्हें कहीं चोट लग जाए या वे घायल हो जाएं, यह अलग बात है, परंतु जुकाम, खांसी, बुखार जैसे सामान्य रोग भी उन्हें नहीं होते. श्वास, हृदय रोग, क्षय जैसे रोगों का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. आखिर ऐसा कैसे?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.महर्षि ने पूछा- जो पशु पक्षी मनुष्य के साथ रहने वाले हैं क्या उन पालतू पशु−पक्षियों को भी तुमने रोगी होते नहीं देखा?

इस प्रश्न पर शाकुंतल बोला- हाँ, गुरुदेव उनमें से बहुतों को मैंने बीमार होते और उनकी चिकित्सा होते भी देखा है परंतु वे ज्यादातर साधारण रोगों से ही ग्रस्त होते हैं. उचित चिकित्सा मिलने पर अपने पालक यानी मनुष्य की तुलना में जल्दी ठीक भी हो लेते हैं.

बहुत बार तो वे अपनी चिकित्सा स्वयं भी कर लेते हैं. उन्हें पालक के सहयोग की आवश्यकता ही नहीं होती. ऐसी विचित्रता क्यों है? गुरूवर कहते हैं कि मनुष्य ब्रह्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना है फिर ऐसा क्या मनुष्य से श्रेष्ठ रचना पशु-पक्षी हैं? क्या जो बात कही गई वह सत्य नहीं? क्या मैंने गलत सुना है गुरूदेव?

महर्षि मुद्गल ने शाकुंतल को समझाया-शांकुतल निःसंदेह तुमने जो सुना है वह सत्य ही सुना है. मनुष्य तो प्रजापति ब्रह्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना है ही. उसे ब्रह्मदेव ने बहुत से ऐसे गुण दिए जो पशु-पक्षियों में नहीं हैं. उसे विशेष प्रेम और लगाव से विधाता ने रचा.

शांकुतल ने विस्मय में पूछा- क्या प्रजापति ने अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना को रोगी होने का दंड दिया गुरूवर?क्या ब्रह्मदेव उसमें स्वतः निरोग करने का गुण देना भूल गए या कोई और बात है? मेरा कौतूहल शांत करें देव.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.महर्षि ने कहा- पुत्र ब्रह्मदेव न तो भूले न ही कोई दंड दिया. अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना में कोई भूल होने या दंड का प्रश्न ही नहीं है.  तुमने मानव के जिस लक्षण को देखा उसके लिए मनुष्य ही उत्तरदायी है. वत्स! मनुष्य को प्राकृतिक नियमों की अनदेखी या उल्लंघन के कारण बीमारी के रूप में दंड मिलता है. यह दंड उसके अपराध के अनुसार कम-ज्यादा हो सकता है.

मनुष्य के अलावा दूसरे जीवों में प्रकृति का उल्लंघन करने जितनी समझदारी, चालाकी या नासमझी नहीं है इसलिए वे प्रकृति के अनुरूप जीते हैं, निरोग हैं. परंतु जब कभी उनसे भी भूल होती है, वे भी अस्वस्थ होते हैं पर शरीर द्वारा जब भी रोग का संकेत उन्हें मिलता है, वे अपनी मर्यादा में आ जाते हैं और जल्दी ही ठीक हो जाते हैं.

महर्षि ने आगे कहा- शाकुंतल! चिकित्सालयों और कुशल चिकित्सकों की संख्या कितनी भी बढा दी जाए, जब तक मनुष्य संयम से, मर्यादा से दूर रहेगा, उसे रोगों से मुक्ति नहीं मिलेगी. जब तक हर मानव प्रकृति से छेड़छाड़ बंद नहीं करता, संयम से जीना नहीं सिखता यही होगा.

उसे संयम और प्रकृति प्रेमी होने की आवश्यकता है. तभी उसे रोग और दुःखों से नहीं बचाया जा सकता है.

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