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भगवान ने वसुदेव-देवकी से कहा- स्वयंभावु मन्वतंर में आपका पहला जन्म हुआ था. देवकी आप पृष्णि थीं और वसुदेवजी आप सुतपा प्रजापति थे. ब्रह्माजी ने आप लोगों को संतान उत्पत्ति का आदेश किया तो आप लोगों ने मुझे संतानरूप में पाने की इच्छा जताई.

ब्रह्माजी ने आपको आदेश किया कि आप तप से मुझे प्रसन्न करें. आप दोनों ने ऐसा घोर तप किया जो आसाधारण था और सामान्य लोगों के लिए संभव ही नहीं था. आखिरकार मैंने आप दोनों को दर्शन दिए.

आप दोनों संतानहीन थे. आपने मुझसे मोक्ष के स्थान पर मेरे जैसे पुत्र की तीन बार याचना की. मैंने आपकी याचना स्वीकार ली. आप संतान प्राप्ति हेतु विषय भोग में रत हो गए.

मैंने बहुत विचार किया लेकिन मुझे ऐसा कोई नजर नहीं आया जो मेरे ही समान हो. अंततः मुझे स्वयं आपके गर्भ में आना पड़ा. उस समय मैं पृश्निगर्भ के नाम से विख्यात हुआ.

अगले जन्म में आप अदिति हुई और वसुदेव आप कश्यप हुए. आपने अपने पुत्रों के उद्धार के लिए फिर से मेरी स्तुति की और पुत्ररूप में आकर कल्याण करने की याचना की. मैंने वामन रूप में आपके गर्भ से जन्म लिया. इंद्र के अनुज रूप में होने से उपेन्द्र भी कहलाया.

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