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अगर बिना पढाई किए ही प्राप्त हो जाए सारा ज्ञान! क्या है ऐसा विधान?

अगर बिना पढाई किए ही प्राप्त हो जाए सारा ज्ञान! क्या है ऐसा विधान?

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भरद्वाज मुनि के बेटे यवक्रीत को पढ़ने-लिखने में बिलकुल मन नहीं लगता था. धीरे-धीरे उसके सभी मित्र बड़े ज्ञानी हो गए और उन्हें सम्मान मिलने लगा. तब यवक्रीत को लगा कि उसे भी पढ़ाई करके वेद-शास्त्रों का ज्ञान हासिल करना चाहिए था.

उसने सोचा कि अगर वह पढ़ाई शुरू करता है तो फिर ज्ञान प्राप्त करने में तो जाने कितने साल लग जाएंगे. इसलिए उसने सोचा कि अगर देवताओं के राजा इंद्र को तपस्या से प्रसन्न कर ले तो वह सारा ज्ञान उसे दे देंगे. यवक्रीत गंगा के किनारे ध्यान लगाकर बैठ गया.

इंद्र को बात पता चल गई. वह ब्राह्मण का वेश बनाकर आए और यवक्रीत के नजदीक ही बैठकर दोनों हाथों से गंगा में बालू(रेत) फेंकने लगे. यवक्रीत को बड़ा आश्चर्य हुआ. उसने पूछा कि आप नदी में ऐसे बालू क्यों फेंक रहे हैं?

ब्राह्मण वेशधारी इंद्र ने पूछा, “तुम क्यों तपस्या कर रहे हो?” यवक्रीत ने बताया कि वह पढ़ने-लिखने में समय व्यर्थ नहीं करना चाहता इसलिए वह तपस्या कर रहा है ताकि इंद्र प्रसन्न हो जाएं और दुनिया का सारा ज्ञान उसे दे दें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इंद्र ने कहा, “ऐसा नहीं होता. अगर ज्ञान तपस्या से ही मिलने लगे तो कोई अध्ययन क्यों करे, सभी तप करने लगेंगे. खुद देवताओं ने अध्ययन से ज्ञान प्राप्त किया है.”

यवक्रीत ने उनकी बात को अनसुना करते हुए कहा, “खैर, आप बताइए आप बालू क्यों फेंक रहे हैं?”

इंद्र ने कहा, “मैं बालू फेंककर गंगा पर मजबूत पुल बना रहा हूं.”

उनकी बात सुनकर यवक्रीत जोर से हंसा. उसने कहा, “आप उम्र में बड़े हैं, ज्ञानी हैं फिर भी कैसी बातें कर रहे हैं. ऐसे कहीं गंगा पर पुल बन सकता है?”

इंद्र ने उत्तर दिया, “तुम्हारी बात तो ठीक है बेटा कि बालू से पुल नहीं बन सकता लेकिन तुम्हीं बताओ बिना पढ़े ज्ञान कैसे मिल सकता है? जिस प्रकार बिना अक्षर के कोई शब्द नहीं बन सकता, बिना बीज के पौधा नहीं उग सकता उसी तरह बिना अध्ययन के ज्ञान भी नहीं मिल सकता.”

इंद्र की बात सुनकर यवक्रीत समझ गया कि वह ब्राह्मण कोई साधारण मानव नहीं हैं. उसने हाथ जोड़कर कहा, “आपने मेरी आंखें खोल दीं. आप कौन हैं?”हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.इंद्र अपने असली रूप में आ गए. उन्होंने यवक्रीत को समझाया कि अगर तपस्या करके किसी देव को प्रसन्न करके ज्ञान मिल भी गया तो तुम्हें उतना ही ज्ञान मिलेगा जितना कि खुद उस देवता के पास है. बाकी का ज्ञान तो फिर भी नहीं मिल सकता. लेकिन अगर तुम खुद से अध्ययन करोगे तो दुनिया का कोई भी ज्ञान प्राप्त कर सकते हो.
यवक्रीत ने खूब लगन से अध्ययन किया. समस्त ज्ञान प्राप्तकर बाद में तपोदत्त के नाम से विख्यात हुए.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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