करवा चौथ पूजनः 10 स्टेप वाली सबसे सरल शास्त्रीय विधि व व्रत कथा

करवा चौथ पूजनः 10 स्टेप वाली सबसे सरल शास्त्रीय विधि व व्रत कथा

करवा चौथ पूजा विधि (Karva Chauth Pooja Vidhi): सबसे सरल और शास्त्रीय विधि: व्रत कथा, नियम और संपूर्ण जानकारी

करवा चौथ का व्रत भारतीय सनातन संस्कृति में सुहागिनों के लिए सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आने वाले इस व्रत को ‘करक चतुर्थी’ या ‘कड़वा चौथ’ भी कहा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और भगवान गणेश, माता शिव-पार्वती, कार्तिकेय तथा चंद्रमा का पूजन करती हैं।

यदि आप भी इस व्रत को विधि-विधान से करना चाहती हैं, तो यहाँ करवा चौथ पूजा विधि, पूजन मंत्र और प्रचलित कथा विस्तार से दी जा रही है।

करवा चौथ पूजा विधि और चंद्रमा को अर्घ्य देने का दृश्य
करवा चौथ पूजा विधि

 

करवा चौथ पूजा विधि 2026: तिथि, पूजा मुहूर्त और चंद्रोदय का समय

पंचांग के अनुसार, इस वर्ष करवा चौथ 29 अक्टूबर, गुरुवार को है। व्रत और पूजन से जुड़े मुख्य समय इस प्रकार हैं:

  • चतुर्थी तिथि का समय: कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि सुबह 01:06 बजे से शुरू होकर रात 10:09 बजे तक रहेगी।

  • पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 05:38 बजे से 06:56 बजे तक। इस समयावधि में माता गौरी, गणेश जी और शिव परिवार की विधि-विधान से पूजा कर कथा अवश्य सुनें।

  • चंद्रोदय (चांद निकलने) का समय: रात्रि लगभग 08:17 बजे चंद्रमा के दर्शन होने का अनुमान है। (नोट: विभिन्न शहरों के स्थानीय पंचांग के अनुसार इसमें कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।)


करवा चौथ पूजा विधिः इन 10 सरल स्टेप्स में करें पूजन

करवा चौथ पूजा विधिः सबसे सरल शास्त्रीय विधि और करवा चौथ की व्रत कथा
करवा चौथ पूजा विधि
  1. संकल्प और स्नान: प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन में व्रत का संकल्प लें। संकल्प के दौरान इस मंत्र का भाव रखें या उच्चारण करें:

    ‘मम् सुख सौभाग्य पुत्र पौत्र आदि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतं अहं करिष्ये।’ (अर्थात्: मैं अपने सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति के लिए इस करक चतुर्थी के व्रत का संकल्प करती हूँ।)

  2. निर्जला व्रत के नियम: इस दिन पूरे दिन निर्जला (बिना जल के) व्रत रखने का विधान है। हालांकि, यदि कोई महिला अस्वस्थ, रुग्ण या वृद्ध है, तो उनके लिए निर्जल रहना अनिवार्य नहीं है। स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए वे आवश्यकतानुसार जल या दवा ले सकती हैं, शास्त्रों में इसके लिए पूर्ण छूट दी गई है।
  3. दीवार पर करवा चित्रण (वर): घर के मंदिर या पूजा स्थल की दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे हुए चावलों के घोल से करवा (कलश) का चित्र बनाएं। इसे ‘वर’ कहा जाता है, और इसे चित्रित करने की पारंपरिक कला को ‘करवा धरना’ कहते हैं। वह चित्र पोस्ट में नीचे दिया गया है। यदि आप उसे बनाने में समर्थ न हों तो उसकी फोटो भी रख सकती हैं।
  4. सामग्री और मूर्तियां: आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ और सुहाग के पकवान बनाएं। मिट्टी से माता गौरी और पुत्र गणेश की प्रतिमा बनाएं या तस्वीर स्थापित करें। माता गौरी को लकड़ी के आसन पर विराजमान करें।
  5. चौक और कलश स्थापना: पूजा स्थान पर पवित्र चौक बनाकर आसन रखें। माता गौरी को चुनरी ओढ़ाकर, बिंदी, चूड़ी और सुहाग की अन्य सामग्री से उनका श्रृंगार करें। जल से भरा हुआ कलश स्थापित कर उसकी पूजा करें।
  6. पूजन और मंत्र जाप: रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएं। इसके बाद विधि-विधान से गौरी-गणेश और चित्रित करवा की पूजा करें। पति की दीर्घायु की कामना करते हुए इस पावन मंत्र का उच्चारण करें:
    ‘नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभम्‌। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥’
  7. कथा और चावल के दाने: करवा पर 13 बिंदियां रखें। हाथ में गेहूं या चावल के 13 दाने लेकर करवा चौथ की कथा सुनें या पढ़ें।
  8. सास का आशीर्वाद: कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सास के चरण स्पर्श करें और आशीर्वाद स्वरूप करवा उन्हें भेंट करें।
  9. अर्घ्य की तैयारी: पूजा के बाद तेरह दाने गेहूं के और जल का लोटा (या टोंटीदार करवा) चंद्र अर्घ्य के लिए सुरक्षित अलग रख लें।
  10. चंद्रदर्शन और व्रत पूर्ण करना: रात्रि में चंद्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से चंद्रमा को देखें और अर्घ्य दें। इसके बाद पति के हाथों जल ग्रहण कर और उनका आशीर्वाद लेकर व्रत खोलें तथा भोजन करें।

विशेष रूप से ध्यान देने की बात: जो करवा बनाया जाता है, उसमें दीवार पर या चित्र में चंद्रमा तथा उसके नीचे भगवान शिव और कार्तिकेय की प्रतिमा का अंकन होता है, और इसी सामूहिक रूप की पूजा की जाती है।

करवा चौथ पूजा विधिः जीवनभर का नियम और स्वास्थ्य प्राथमिकता

जब कोई स्त्री एक बार इस व्रत को करना आरंभ कर देती है, तो उसे यह व्रत जीवन पर्यंत करना पड़ता है। हालांकि, उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए यह आवश्यक नहीं है कि हर अवस्था में निर्जला ही रहा जाए। एक बार व्रत का विधिवत आरंभ करने के बाद, शारीरिक क्षमता और सुविधा को ध्यान में रखते हुए महिलाएं व्रत में जल और फलाहार भी ग्रहण कर सकती हैं।

करवा चौथ व्रत कथा

गौरी गणेश आदि पूजन आदि के बाद करवा चौथ के व्रत की कहानी का समूह पाठ करना चाहिए या श्रवण करना चाहिए.

करवा चौथ व्रत की कई कथाएं लोकजीवन में प्रचलित हैं। ‘प्रभु शरणम्’ के पाठकों के लिए यहाँ सबसे मुख्य और प्रचलित कथा प्रस्तुत है:

एक बार अर्जुन नीलगिरी पर्वत पर तपस्या करने गए. द्रौपदी ने सोचा कि अर्जुन तो हैं नहीं और यहां पर हर समय कोई न कोई बड़ी विघ्न-बाधाएं आती रहती हैं. आखिर अर्जुन के अभाव में रक्षा सुनिश्चित कैसे हो? कोई उपाय तो करना ही होगा.

यह सोचकर द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया. भगवान प्रकट हुए तो द्रौपदी ने अपनी चिंता बताकर निवारण का मार्ग पूछा. भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को इसका मार्ग बताया.

श्रीकृष्ण ने कहा- हे द्रौपदी एक बार पार्वतीजी ने भी भोलेनाथ से यही प्रश्न किया था कि किसी के दांपत्य जीवन में छोटी-मोटी बाधाएं लगातार आ रही हों तो उन्हें दूर करने का क्या उपाय है.

शिवजी ने पार्वतीजी से कहा कि वैवाहिक जीवन में थोड़े बहुत नोक-झोंक स्वाभाविक हैं. उन्हें अपने व्यवहार कौशल से जो दूर कर लेते हैं मैं वैसे गृहस्थों पर विशेष प्रसन्न रहता हूं. करवा चौथ का व्रत इन छोटी-मोटी बाधाओं को पार करने में सहयोगी होता है.

श्रीकृष्ण बोले- हे द्रोपदी जो स्त्री व्यवहार कुशल हो उसे शिवजी का संरक्षण मिलता रहता है. करवा चौथ का व्रत करने से पित्त का प्रकोप भी शांत होता है. तुम्हें मैं इस व्रत के महात्मय की कथा सुनाता हूं.

नोटः नीचे करवा माता पूजन चित्र दिया गया है जिसे बना लेना चाहिए या इसकी तस्वीर रख लेनी चाहिए.

 

करवा चौथ व्रत कथा- करवा माता का चित्र
करवा चौथ व्रत कथा- करवा माता का चित्र

करवा चौथ की कहानी

एक नगर में एक साहूकार रहता था. उसके सात लड़के और एक लड़की थी. कार्तिक महीने मे जब कृष्ण पक्ष की चतुर्थी आई. तो साहूकार के परिवार की महिलाओ ने भी करवा चौथ रखा.

जब रात्री के समय साहूकार के बेटे भोजन ग्रहण करने बैठे, तो उन्होने साहूकार की बेटी (अपनी बहन) को भी साथ में भोजन करने के लिए कहा. भाइयों के द्वारा भोजन करने का कहने पर उनकी बहन ने उत्तर दिया कि आज मेरा व्रत है.

मैं चांद के निकलने पर पूजा विधि सम्पन्न करके ही भोजन करूंगी. भाइयों के द्वारा बहन का भूख के कारण मुर्झाया हुआ चेहरा देखा नहीं गया. उन्होंने अपनी बहन को भोजन कराने के लिए प्रयत्न किया.

इसके लिए उन्होंने एक छल किया. दूर छलनी के पीछे दीपक जलाकर रख दिया और बहन तो घर के झरोखे से दिखाकर यह विश्वास दिला दिया कि चांद निकल गया है. मौसम खराब होने के कारण स्पष्ट नहीं दिख रहा पर चंद्रोदय तो हो गया है.

उस अग्नि का प्रकाश अपनी बहन को दिखाते हुए कहा की देखो बहन चाँद निकाल आया है. तुम चाँद को अर्ध्य देकर और अपनी पूजा करके भोजन ग्रहण कर लो. अपने भाइयों द्वारा चाँद निकलने की बात सुनकर बहन ने अपनी भाभियों के पास जाकर कहा.

भाभी चाँद निकल आया है चलो पूजा कर लें परंतु उसकी भाभी अपने पतियों द्वारा की गयी युक्ति को जानती थी.

उन्होंने अपनी ननद को भी इस बारे में बताया और कहा कि आप भी इनकी बात पर विश्वास ना करे परंतु बहन ने भाभियों की बात पर ध्यान ना देते हुए पूजन संपन्न कर भोजन ग्रहण कर लिया. इस प्रकार उसका व्रत टूट गया और गणेशजी उससे नाराज हो गए.

इसके तुरंत बाद उसका पति बीमार हो गया. वह तुरंत अपने घर की ओर भागी.

रास्ते में उसे भगवान शंकर पार्वती देवी के साथ मिले. पार्वती माता ने उसे बताया कि उसके पति की मृत्यु हो गई है क्योंकि उसने नकली चांद देखकर अपना व्रत तोड़ दिया था. स्त्री ने तुरंत क्षमा मांगी.

माता पार्वती ने कहा- तुम्हारा पति फिर से जिन्दा हो जायेगा लेकिन इसके लिए तुम्हें करवा चौथ का व्रत कठोरता से संपन्न करना होगा. तभी तुम्हारा पति फिर से जीवित होगा.

सच्चाई जानने के बाद उसने निश्चय किया कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी. अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी.

वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है. उसकी देखभाल करती है. उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है. एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आया.

उसकी सभी भाभियां चौथ का व्रत रखती हैं. जब भाभियां उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ ऐसा आग्रह करती, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती.

इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आई है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है. यह भाभी उसे बताती है कि चूंकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था.

अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना.

ऐसा कहकर वह चली गई. सबसे अंत में उसकी छोटी भाभी आई. करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करने लगी लेकिन वह भी टालमटोल करने लगी.

इसे देख करवा ने उन्हें जोर से पकड़ लिया और उससे अपने सुहाग को फिर से जीवन देने की विनती करने लगी. भाभी ननद से खुद को छुड़ाने के लिए बहुत प्रयास करती रही. उसने उसे नोचा-खसोटा थप्पड़ भी लगाए लेकिन उसने नहीं छोड़ा.

अपने पति के लिए ऐसी तपस्या देख आखिरकार उसकी भाभी भी पसीज ही गई और अपनी छोटी अंगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल दिया.

इतना करना था कि उसका पति भगवान श्री महागणेश की कृपा से तुरंत श्री गणेश-श्री गणेश कहता हुआ उठ बैठा.

इस प्रकार श्रीगणेश की कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से उसे अपना सुहाग वापस मिला. उसने श्रीगणेशजी का स्मरण करते हुए उनकी प्रार्थना की- हे भगवान श्रीगणेश! मां गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपकी कृपा से मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले.

उसके व्रत तथा श्रद्धाभक्ति को देखते हुए भगवान गणेश उस पर प्रसन्न हो गए. उसके पति को जीवनदान तो दिया ही था साथ ही उसके परिवार को धन-संपत्ति और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान किया.

इसलिए जो भी सुहागिन सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ करवा चौथ का व्रत करती है, उसके जीवन के सभी क्लेश दूर होते हैं और उसका सुहाग अमर रहता है।


करवा चौथ पूजा विधि से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यहाँ पाठकों द्वारा करवा चौथ पूजा विधि (Karva Chauth Puja Vidhi) और व्रत से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले कुछ प्रमुख प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं:

Q1: करवा चौथ पूजा विधि क्या है और इसे कब शुरू करना चाहिए?A1: करवा चौथ की सबसे सरल शास्त्रीय पूजा विधि (Karva Chauth Puja Vidhi) में संकल्प लेने के साथ शुरू होती है। इसके बाद दिन भर निर्जला व्रत रखकर शाम को मुहूर्त में शिव-पार्वती, गणेश और चंद्रमा की पूजा की जाती है। इस व्रत को जीवनभर करने का विधान है, लेकिन स्वास्थ्य के अनुसार इसमें छूट भी है।

Q2: वर्ष 2026 में करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?A2: वर्ष 2026 में करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 05:38 बजे से 06:56 बजे तक है। इस समय विधि-विधान से की गई करवा चौथ पूजा विधि (Karva Chauth Puja Vidhi) सबसे शुभ फलदायी मानी जाती है।

Q3: करवा चौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य कब और कैसे दें?A3: चंद्रोदय का समय रात्रि लगभग 08:17 बजे है। चंद्रमा के दर्शन करने के बाद छलनी में दीप रखकर उसे देखें और फिर ‘करक’ (लोटा) से जल का अर्घ्य देकर पति की लंबी उम्र की कामना करें। यह क्रिया भी संपूर्ण करवा चौथ पूजा विधि (Karva Chauth Puja Vidhi) का एक अहम् हिस्सा है।

Q4: क्या गर्भवती महिलाएं या बीमार व्यक्ति करवा चौथ का व्रत रख सकते हैं?A4: हाँ, शास्त्रों में स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी गई है। गर्भवती महिलाओं या बीमार व्यक्तियों के लिए निर्जला रहना अनिवार्य नहीं है। वे अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार जल और फलाहार ग्रहण करके भी पूरी श्रद्धा के साथ करवा चौथ पूजा विधि (Karva Chauth Puja Vidhi) का पालन कर सकती हैं।


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