जिनके भाग्य में नहीं है धनयोग उन पर भी कोजागरा को होती है लक्ष्मीकृपा
कोजागरा व्रत या कोजागरी लक्ष्मी पूजा क्यों को जाती है? कोजागरा की व्रत कथा, कोजागिरी पौर्णिमा 2026 कब है?
कोजागरा यानी आश्विन मास की शरद पूर्णिमा की पावन रात्रि। सनातन परंपरा में यह केवल एक पूर्णिमा नहीं, बल्कि मां महालक्ष्मी के साक्षात वरदान की रात मानी गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अमृतमयी रात्रि में माता लक्ष्मी यह देखने के लिए पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं कि ‘को जागर्ति’—अर्थात कौन जाग रहा है? जो भी साधक रात्रि जागरण कर माता लक्ष्मी का ध्यान और स्मरण करते हैं, मां उन पर अपनी असीम कृपा बरसाती हैं।
यदि किसी जातक की जन्मकुंडली में प्रबल धनयोग न भी हो, तो भी विधिवत कोजागरा का व्रत, पूजन और कोजागरा व्रत कथा का श्रवण करने से दरिद्रता का नाश होता है और घर में स्थायी लक्ष्मी का वास होता है।
कोजागरा और कोजागरी लक्ष्मी पूजा का आध्यात्मिक महत्व
भारत के विभिन्न अंचलों में मां लक्ष्मी की आराधना की भिन्न-भिन्न तिथियां और परंपराएं हैं। जहां उत्तर भारत में दीपावली की अमावस्या को दीप जलाकर महालक्ष्मी का आह्वान होता है, वहीं पूर्वी भारत—विशेषकर बंगाल, ओडिशा, बिहार और मिथिलांचल में—आश्विन पूर्णिमा के दिन कोजागरी लक्ष्मी पूजा अत्यंत धूमधाम और श्रद्धा से मनाई जाती है।
नवरात्रि के विजयादशमी उत्सव के ठीक बाद पड़ने वाली इस पूर्णिमा को ‘कौमुदी उत्सव’ या ‘शरद पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। ‘को जागर्ति’ से ही इस पावन पर्व का नाम कोजागरा पड़ा। शास्त्रों का वचन है कि वर्ष में केवल इसी रात चंद्रमा अपनी समस्त सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर आकाश से अमृत वर्षा करता है।
कोजागिरी पौर्णिमा 2026: शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय समय

वर्ष 2026 में आश्विन मास की कोजागिरी पौर्णिमा 2026 का पर्व विशेष शुभ योगों में मनाया जा रहा है। इस पावन तिथि पर मां लक्ष्मी के पूजन और रात्रि जागरण का विशेष फल प्राप्त होता है:
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पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 25 अक्टूबर 2026, प्रातःकाल से
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पूर्णिमा तिथि समाप्त: 26 अक्टूबर 2026 तक
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कोजागरा निशिता काल पूजा मुहूर्त: 25 अक्टूबर 2026 की मध्यरात्रि (रात 11:40 से 12:31 तक)
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शरद पूर्णिमा चंद्रोदय समय: सायं 05:42 बजे
(शास्त्रों के अनुसार, कोजागरा व्रत में जिस रात्रि पूर्णिमा तिथि विद्यमान हो, उसी रात जागरण और लक्ष्मी पूजन करने का विधान है।)
कोजागरा लक्ष्मी पूजा विधि एवं नियम (Step-by-Step)
शास्त्रसम्मत विधि से पूजन करने पर मां लक्ष्मी साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं:
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इंद्रदेव एवं महालक्ष्मी का पूजन: इस दिन ऐरावत हाथी पर सवार देवराज इंद्र और कमलासना महालक्ष्मी का षोडशोपचार या पंचोपचार विधि से संयुक्त पूजन करें।
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दीपदान का नियम: रात्रि के समय गाय के शुद्ध घी के 100 दीपक (या अपनी सामर्थ्य अनुसार 11, 21 अथवा 51 दीपक) प्रज्वलित करें। इन दीपों को पूजाघर, तुलसी चौरा, मुख्य द्वार, छत और पीपल वृक्ष के नीचे रखें।
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पाठ एवं दशांश हवन: कोजागरी लक्ष्मी पूजा के दिन श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र और महालक्ष्मी स्तोत्र का पाठ अवश्य करें। इसके उपरांत कमलगट्टा, बेलपत्र, पंचमेवा अथवा खीर की आहुतियों से दशांश हवन संपन्न करें।
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अमृतमयी खीर का भोग: गाय के दूध, मखाने और शर्करा (मिश्री) से युक्त खीर बनाएं। चंद्रोदय के पश्चात चांदी, कांसे या मिट्टी के पात्र में खीर भरकर खुले आकाश/चांदनी में रखें। रात्रि के प्रथम प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद यह खीर मां लक्ष्मी को अर्पित करें और फिर परिवार सहित प्रसाद रूप में ग्रहण करें। इससे चंद्रमा संबंधी मानसिक और शारीरिक दोष शांत होते हैं।
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पारण व दान: अगले दिन प्रातः स्नान-ध्यान के पश्चात ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराएं और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें।
पौराणिक कोजागरा व्रत कथा
कोजागरा के दिन परिजनों के साथ बैठकर व्रत कथा का श्रवण करने से घर की दरिद्रता दूर होती है। शास्त्रों में वर्णित पावन कथा इस प्रकार है:
प्राचीन काल की बात है। एक प्रजाहितैषी और उदारहृदय राजा राज्य करते थे। वे अपनी प्रजा का पालन संतान की भांति करते थे। राजा के मन में अपने राज्य के निर्धन शिल्पकारों और दस्तकारों के प्रति गहरी चिंता रहती थी, क्योंकि वे अपनी कला से पर्याप्त धन उपार्जन नहीं कर पा रहे थे।
शिल्पकारों को आर्थिक संकट से उबारने के लिए राजा ने एक घोषणा कराई—“सप्ताहिक हाट में जो भी शिल्प या वस्तुएं नहीं बिकेंगी, उन्हें राजकोष से स्वयं राजा खरीद लेंगे, ताकि किसी भी परिवार को भूखा न सोना पड़े।”
एक बार एक शिल्पकार ने लोहे से अलक्ष्मी (दरिद्रता) की एक कुरूप प्रतिमा बनाई। अमंगलकारी होने के कारण बाजार में उस प्रतिमा को किसी ने नहीं खरीदा। राजाज्ञा के अनुसार, राजसेवक उस अनबिकी प्रतिमा को खरीदकर महल में ले आए। राजा ने भी शिल्पकार के सम्मान की रक्षा हेतु उस लोहे की प्रतिमा को पूजा कक्ष के एक कोने में रखवा दिया।
उसी रात राजा ने पूजा कक्ष से किसी स्त्री के अत्यंत कारुणिक विलाप की ध्वनि सुनी।
राजा व्याकुल होकर तुरंत पूजा कक्ष में पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि एक अत्यंत दिव्य और ज्योतिर्मयी स्त्री बैठकर अश्रु बहा रही हैं। राजा ने हाथ जोड़कर पूछा, “हे देवी! आप कौन हैं और इस प्रकार क्यों रो रही हैं?”
उस दिव्य स्त्री ने कहा, “हे राजन! मैं धन और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हूँ। मैं यहां अत्यंत दुखी हूँ, क्योंकि मैं और दरिद्रता की देवी अलक्ष्मी कभी एक छत के नीचे नहीं रह सकतीं। जहां अलक्ष्मी का वास होता है, मुझे वहां से विदा होना पड़ता है।”
राजा ने धर्मसंकट समझकर अलक्ष्मी की प्रतिमा को महल से तुरंत बाहर निकालने का निर्णय लिया। इस पर देवी लक्ष्मी प्रसन्न हुईं। किंतु जब राजा उस लोहे की प्रतिमा को बाहर ले जाने लगे, तभी उनके मन में विचार आया—“यदि मैंने इस शिल्प को फेंक दिया, तो यह उस निर्धन शिल्पकार की कला और श्रम का घोर अपमान होगा।” अतः राजा ने प्रतिमा को फेंका नहीं, बल्कि महल के एक अप्रयुक्त कक्ष में सुरक्षित रख दिया।

अलक्ष्मी का महल में प्रभाव इतना प्रबल था कि धीरे-धीरे राजा को छोड़कर सभी दैवीय शक्तियां जाने लगीं। प्रत्येक रात एक-एक करके ऐश्वर्य, यश, पराक्रम और बुद्धि की देवियां विलाप करते हुए विदा हो गईं। समृद्ध राज्य धीरे-धीरे दरिद्रता और संकटों से घिर गया।
अंत में एक रात राजा ने देखा कि स्वयं ‘धर्म के देवता’ विदा होने की आज्ञा मांग रहे हैं। राजा भयभीत होकर उनके चरणों में गिर पड़े और बोले, “हे धर्मदेव! यदि आप भी चले जाएंगे, तो राज्य में कुछ शेष नहीं बचेगा। कृपया मुझे मार्ग बताएं। मैंने तो केवल एक गरीब शिल्पकार के सम्मान की रक्षा के लिए वह प्रतिमा स्वीकार की थी।”
राजा का सत्य और प्रजाप्रेम देखकर धर्मदेव संतुष्ट हुए। उन्होंने कहा, “हे राजन! तुम्हारी नीति निष्कलंक है। इस संकट से मुक्ति का एक ही उपाय है। यदि तुम्हारी धर्मपत्नी आश्विन पूर्णिमा को विधिपूर्वक कोजागरा व्रत रखकर रात्रि जागरण करें और मां लक्ष्मी की आराधना करें, तो रूठी हुई समस्त देवियां पुनः लौट आएंगी।”
शरद पूर्णिमा की तिथि आई। रानी ने पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ कोजागरा का कठिन उपवास रखा। रात्रि में उन्होंने एक क्षण के लिए भी आंखें नहीं झपकाईं और अखंड दीप प्रज्वलित कर मां लक्ष्मी का स्मरण करती रहीं। रानी की अखंड भक्ति और तपोबल से वह चमत्कार हुआ कि अलक्ष्मी की कठोर लोहे की प्रतिमा स्वतः गलकर भस्म हो गई।
प्रतिमा के गलते ही राज्य से अलक्ष्मी का प्रभाव समाप्त हो गया। मां लक्ष्मी अपने समस्त वैभव के साथ महल में पुनः पधारीं और राजा का राज्य पहले से भी अधिक वैभवशाली और सुखी हो गया।
तभी से लोककल्याण की भावना से कोजागरा व्रत कथा का वाचन और श्रवण घर-घर में प्रचलित हुआ।
शरद पूर्णिमा पर अमृत वर्षा और खीर का रहस्य
कोजागरा की इस पूर्णिमा को आकाश से केवल चांदनी नहीं, बल्कि औषधीय अमृत कण बरसते हैं। आयुर्वेद और ज्योतिष दोनों के अनुसार, आश्विन मास की शरद पूर्णिमा पर पित्त दोष का शमन करने के लिए खुले आकाश के नीचे रखी गई खीर अत्यंत लाभकारी होती है। इस प्रसाद को ग्रहण करने से आरोग्य और समृद्धि दोनों की प्राप्ति होती है।
कोजागरा और कोजागरी लक्ष्मी पूजा से जुड़े मुख्य प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: कोजागरा पूजा में रात्रि जागरण क्यों किया जाता है?
उत्तर: ‘को जागर्ति’ का अर्थ होता है ‘कौन जाग रहा है’। मान्यता है कि आश्विन पूर्णिमा की मध्यरात्रि में माता लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और जो भक्त जागकर उनका भजन-कीर्तन व ध्यान करते हैं, उन्हें धन-धान्य और अखंड सौभाग्य का वरदान देती हैं।
प्रश्न 2: कोजागरी पौर्णिमा 2026 पर खीर कब और कैसे रखनी चाहिए?
उत्तर: कोजागरी पौर्णिमा 2026 के दिन चंद्रोदय के बाद शुद्ध गाय के दूध और मखाने से बनी खीर को खुले आकाश के नीचे महीन जाली या सफेद कपड़े से ढककर रखें। प्रथम प्रहर बीतने के बाद (लगभग 3 घंटे) मां लक्ष्मी को भोग लगाकर इसे प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
प्रश्न 3: क्या कुंडली में धनयोग न होने पर भी कोजागरा व्रत फलदायी है?
उत्तर: जी हां, ज्योतिषीय और पौराणिक मान्यता है कि जिनकी कुंडली में दरिद्रता या धन का अभाव हो, वे भी यदि निष्ठापूर्वक कोजागरा व्रत कथा का श्रवण और रात्रि में दीपदान करते हैं, तो अलक्ष्मी का प्रभाव नष्ट होता है और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
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