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भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथाः पुरी मंदिर के अद्भुत रहस्य

भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथाः पुरी मंदिर के अद्भुत रहस्य

भगवान जगन्नाथ प्रतिमा के हाथ-पांव क्यों नहीं बनाए जाते? श्रीक्षेत्र इतना पावन क्यों कहा गया? मंदिर से जुड़ी इतनी विचित्रताएं क्यों हैं? कौन बनते हैं यहां के पुजारी? भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथा और पूरी मंदिर के अद्भुत रहस्य जो आपने पहले न सुने हों

स्कंद पुराण के अनुसार भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथा और उनकी रथयात्रा की कथा जितनी विस्तृत है, उतनी ही रोमांचक भी है। इस लीलाकथा के सूत्रधार बनते हैं देवर्षि नारद। श्री राधा जी के प्रति भगवान के निश्छल, निर्विकार प्रेम की पृष्ठभूमि से यह अद्भुत कथा आरंभ होती है।

रोमहर्षक प्रसंगों से भरी यह कथा प्रेम, भक्ति और समर्पण की सबसे मनोहर गाथाओं में से एक है। यह इतनी सरस है कि एक बार पढ़ना शुरू कीजिए, आप पूरा पढ़े बिना रह नहीं पाएंगे। जिसने भी इसे पढ़ा, वह भावविभोर हुए बिना नहीं रहा। इंटरनेट पर मौजूद तमाम जानकारियों में यह भगवान जगन्नाथ की सबसे विस्तृत, प्रामाणिक और सबसे सटीक पौराणिक कथा है, जिसे पढ़ने के बाद आपके मन का हर संशय दूर हो जाएगा।

कई बार तो पाठक इसे दोबारा पढ़ने की इच्छा व्यक्त करते हैं, क्योंकि कथा के दृश्यों में ऐसा लगता है मानो भगवान की लीलाएं आँखों के सामने घट रही हों।

आइए, भगवान जगन्नाथ, बलभद्रजी और बहन सुभद्राजी को नमन करते हुए कथा आरंभ करें।

कथा की शुरुआत

एक बार भगवान श्रीकृष्ण सो रहे थे। निद्रावस्था में उनके मुख से अचानक निकला — “राधे”। यह सुनते ही भगवान की पटरानियों के मन में अनेक प्रश्न उठने लगे। सहज स्त्रीभाव से वे सोचने लगीं कि हम प्रभु की दिन-रात इतनी सेवा करती हैं, फिर उन्हें राधाजी का स्मरण इतना अधिक क्यों रहता है।

रुक्मिणीजी एवं अन्य रानियों के मन में अनेक प्रश्न उठ खड़े हुए —
राधाजी के साथ प्रभु के प्रेम का संबंध कैसा था? यह अनुराग किस प्रकार का था? प्रभु ने उनके प्रति प्रेम का प्रदर्शन कैसे किया? स्वयं राधाजी भगवान के प्रति प्रेमभाव कैसे प्रकट करती थीं? राधाजी और श्रीकृष्ण का वह मिलन किस भावभूमि पर खड़ा था, जिसमें नाम भी अमृत बन जाता है और स्मरण भी साधना?

पर उनकी जिज्ञासा शांत करे कौन?

बहुओं को अपनी सास और ननद की याद आई। सभी रोहिणीजी के पास पहुँचीं और उनसे राधारानी-श्रीकृष्ण के प्रेम तथा भगवान की ब्रज-लीलाएँ सुनाने की प्रार्थना की।

बहुओं की जिद पर माता ने कथा सुनाने की हामी तो भर दी, पर एक शर्त भी रख दी। रोहिणीजी ने कहा — कथा सुनाऊँगी जरूर, लेकिन सभी रानियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि श्रीकृष्ण या बलराम को इसकी भनक भी न लगे। पहले इसका प्रबंध करो, फिर मेरे पास आओ।

रुक्मिणी ने माता से पूछा कि आखिर उन्होंने ऐसी शर्त क्यों रखी है?

रोहिणीजी ने बताया — मुझे भय है कि यदि उन दोनों ने ब्रज के प्रसंग सुन लिए, तो वे फिर से व्रज की ओर चले जाएंगे। तुम सब मिलकर भी उन्हें रोक न पाओगी। फिर द्वारकापुरी कौन संभालेगा?

यह सुनकर रानियाँ भी घबरा गईं। न तो वे स्वयं को ब्रज की कथा सुनने से रोक पा रही थीं और न ही भगवान से दूर होने का सोच पा रही थीं। लेकिन उन्होंने एक रास्ता निकाल लिया।

तय हुआ कि सभी रानियाँ रोहिणीजी के साथ एक गुप्त स्थान पर जाएँगी। वहीं सारी श्रीकृष्ण-लीला कथा कही-सुनी जाएगी। माता की शर्त के अनुसार वहाँ कोई और न आए, इसके लिए सुभद्राजी उस स्थान पर पहरा देंगी। सुभद्राजी ने पहले तो आनाकानी की, लेकिन भाभियों के मनुहार पर आखिर मान गईं।

सुभद्राजी को माता ने आदेश दिया कि यदि स्वयं श्रीकृष्ण या बलराम भी आएँ, तो उन्हें भी भीतर न आने देना।

सुभद्रा द्वार पर तैनात थीं। माता रोहिणी ने भगवान की शैशव-लीला का बखान शुरू किया। भगवान नवजात शिशु के रूप में कैसे लगते थे, किस प्रकार सोते थे, और कैसे बालसुलभ हठ करते थे — रोहिणीजी इतने भाव से सुना रही थीं जैसे कथा नहीं, सब कुछ उसी समय घट रहा हो।

यही कारण है कि भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथा को सच्चे मन से पढ़ने या सुनने मात्र से ही मनुष्य के सारे संशय दूर हो जाते हैं और उसे प्रभु की भक्ति प्राप्त होती है।

कथा सुनकर सुभद्राजी भी स्वयं को बालरूप में अनुभव करने लगीं। वे किसी नवजात शिशु की तरह वहीं द्वार पर पड़ गईं। उन्हें कुछ होश ही न था।

थोड़ी देर में श्रीकृष्ण एवं बलराम वहाँ आ पहुँचे। सुभद्राजी को द्वार पर ऐसे देखकर उन्हें कुछ संदेह हुआ। अपनी सूक्ष्मशक्ति से वे बाहर से ही माता द्वारा सुनाई जा रही ब्रज-लीला का आनंद लेने लगे। बलरामजी भी चुपके से कथा सुन रहे थे।

पटरानियाँ तो डूबी ही थीं, भगवान भी विभोर होकर सुध-बुध खो बैठे। वे ऐसे भावावेश में आए कि मूर्ति के समान जड़ प्रतीत होने लगे। बड़े ध्यान से देखने पर भी उनके हाथ-पैर दिखाई नहीं देते थे।

यहाँ तक कि उनके चक्र-सुदर्शन ने भी द्रवित होकर लंबा रूप धारण कर लिया। बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो गई।

तभी अचानक देवर्षि नारद वहाँ पहुँच गए। वे भी भगवान के इस रूप को देखकर आश्चर्यचकित होकर निहारते रह गए। क्या रानियाँ, क्या श्रीकृष्ण-बलभद्र, क्या सुदर्शन और क्या नारद — कोई सुध में ही न था।

कुछ समय बाद नारद की तंद्रा टूटी। वे भक्तिभाव से बोले —
“प्रभु, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरी एक इच्छा पूरी कर दीजिए। आज जो रूप आपका मैंने देखा है, उसी रूप के दर्शन पृथ्वी पर आपके भक्तों को भी मिलें। आप इसी रूप में पृथ्वी पर प्रकट हों। इस बालभाव से भरे रूप के दर्शन का आनंद सबको प्राप्त हो।”

भगवान मुस्कराए। नारद की प्रार्थना में जो निष्कपट भक्ति थी, वह उन्हें प्रिय लगी। उन्होंने करुण भाव से कहा — तथास्तु। कलियुग में मैं इसी रूप में नीलांचल क्षेत्र में प्रकट होऊँगा। आपने मुझे जैसे देखा है, उसी भाव का विग्रह वहाँ प्रकट होगा।

भगवान से यह वरदान सुनकर नारद गदगद हो गए। उन्होंने भगवान से पूछा — वह भाग्यशाली कौन होगा, जिसे यह सुअवसर मिलेगा? आप तो जानते ही हैं, मेरी कमजोरी है मेरा कौतूहल। इस बात को यदि न जान जाऊँ, तो मैं व्याकुल रहूँगा। प्रभु, क्या आप चाहेंगे कि आपका यह भक्त कलियुग के आने तक व्याकुल रहे?

भगवान नारद की चतुराई पर हँस पड़े।

भगवान बोले — आपको इस दुर्लभ स्वरूप के पुनः दर्शन के लिए प्रतीक्षा तो करनी ही पड़ेगी, देवर्षि। फिर भी पूछते हो, तो सुनो — समुद्र के उत्तर दिशा और महानदी के दक्षिण दिशा में स्थित श्रीक्षेत्र में मालवराज इंद्रद्युम्न एक भव्य मंदिर का निर्माण कराएँगे। वहाँ मेरी प्रतिमा धातु या पाषाण की न होकर स्वयं कल्पवृक्ष से बनी होगी। वहाँ मेरा स्वरूप वही होगा, जो आपने देखने की लालसा प्रकट की है।

नारदजी का कौतूहल शांत हो गया। वे प्रसन्न होकर भगवान की स्तुति करके अपने लोक को चले गए। श्रीक्षेत्र यानी श्रीजगन्नाथपुरी क्षेत्र में इंद्रद्युम्न द्वारा भगवान जगन्नाथ मंदिर की स्थापना की कथा यहीं से आरंभ होती है। भगवान नीलमाधव के इस पुरुषोत्तम क्षेत्र पर सुदूर मालव में राज करने वाले इंद्रद्युम्न कैसे पहुँचे? कैसे हुई मंदिर की स्थापना? क्यों कहा जाता है इसे पुरुषोत्तम क्षेत्र?

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बहुत सरस कथा आती है राजर्षि राजा इंद्रद्युम्न की। विभोर करने वाली यह कथा स्कंदपुराण में भी आती है। कथा को आगे बढ़ाने से पहले मैं आपको श्रीक्षेत्र के बारे में बताऊँगा। आखिर भगवान ने इसी क्षेत्र को क्यों चुना? इस क्षेत्र की इतनी महिमा क्यों है? यह कथा स्वयं लक्ष्मीजी ने बताई है।

इंद्रद्युम्न को भगवान का वरदान

राजा इंद्रद्युम्न एक बार ऋषियों की सभा में पहुँचे। राजा ने ऋषियों से पूछा —
“ऋषियों, आपने समस्त तीर्थों का सेवन किया है। मुझे कोई ऐसा तीर्थ बताइए जिसके सेवन से बड़े-से-बड़ा पापी भी निष्कलंक हो जाए। जिसके दर्शन से संचित पुण्यों का नाश न हो। जिस क्षेत्र में प्रवेश करते ही हृदय में नारायण का वास हो जाए। मेरी वहाँ जाने की लालसा है।”

राजा के प्रश्न से सभा में शांति छा गई। कोई भी एक स्थान के बारे में तुरंत ऐसा निर्णय नहीं कर पाया।

तभी एक वृद्ध संत उठ खड़े हुए और बोले —
“राजन, आप श्रीक्षेत्र जाइए। वहाँ भगवान नारायण का साक्षात वास है। स्वयं ब्रह्माजी और समस्त देवता प्रतिदिन वहाँ दर्शन को आते हैं। वहाँ रोहिणी कुंड के पास एक कल्पवृक्ष है। उस सरोवर में भूल से भी स्नान कर लेने वाला भगवान श्रीकृष्ण का सायुज्य प्राप्त कर लेता है।”

राजा और वहाँ उपस्थित सभी विद्वान यह सुनकर आश्चर्य में पड़ गए। संत ने कथा आगे बढ़ाई —

“एक बार एक कौवे को जलक्रीड़ा की सूझी। वह मस्ती में डूबकर रोहिणी कुंड के पास पहुँचा और कुंड के जल में एक डुबकी लगाई। जल का स्पर्श करते ही चमत्कार हुआ। नीच योनि वाला वह पशु तत्काल पवित्र हो गया। उसे श्रीकृष्ण का सायुज्य प्राप्त हो गया। वह श्रीकृष्ण के समान दिव्य और पवित्र हो गया।”

“हे परमनारायण भक्त इंद्रद्युम्न! आप उस पुरुषोत्तम क्षेत्र में जाइए। वहाँ भगवान के नीलकंठ स्वरूप का दर्शन करें। वहाँ आपको एक साथ समस्त देवताओं के दर्शन हो जाएँगे। देवगण अपने-अपने लोक से प्रतिदिन भगवान के लिए सुंदर पुष्प और भोग अर्पित करते हैं। आप उस दिव्यभूमि में अवश्य जाएँ।”

उस ऋषि ने श्रीक्षेत्र की महिमा का इतना वर्णन किया कि राजा व्याकुल हो गया। उसके मन में बस भगवान नीलमाधव के उस छवि के दर्शन की उत्कंठा रहने लगी। राजा का किसी काम में मन न लगता। वह भगवान के मंदिर में पहुँचा और करुण प्रार्थना करने लगा —

“हे नारायण, यदि मैं आपका सच्चा भक्त हूँ, यदि मैंने निष्ठापूर्वक प्रजा-पालन किया है, यदि मैं धर्म पर दृढ़ हूँ, तो आप मुझे दर्शन दीजिए। प्रभु, उन महात्मा द्वारा सुने आपके रूप के दर्शन के बिना यह जीवन व्यर्थ लगता है। यदि आप मुझे दर्शन न देंगे, तो मैं प्राण त्याग दूँगा।”

भगवान के सामने करुण प्रार्थना करते-करते राजा इंद्रद्युम्न अचेत हो गए। वे गहरी निद्रा में चले गए। राजा ने एक सुंदर सपना देखा।

वह ऐसा कैसा सपना था कि राजा ने उसी दिन सब कुछ छोड़ दिया और उसी समय पृथ्वी पर मौजूद सर्वश्रेष्ठ शिल्पियों की तलाश में निकल पड़े?

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भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथाः भाग दो

 

संकलनः

राजन प्रकाश