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क्या बल से भाग्य बदला जा सकता है?

क्या बल से भाग्य बदला जा सकता है?

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इस लाइन के नीचे हमारे फेसबुक पेज का लिंक है उसे क्लिक करके लाइक कर लें.आपको रामायण की एक क्षेपक कथा सुनाते हैं. क्षेपक कथाएं मुख्य ग्रंथ में तो नहीं होतीं लेकिन इन्हें मुख्य कथाओं को बल देने के लिए रचा जाता है. इन्हें प्रामाणिक मानें न मानें पर इनमें भक्ति का भाव भरपूर होता है.

रावण हठी था. तप की उसमें अद्भुत क्षमता थी. उसने शिवजी को तो तप से प्रसन्न ही कर रखा था. ब्रह्माजी को भी तप से कई बार प्रसन्न किया. एक बार रावण ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और उनसे अमरत्व का वरदान मांगा.

ब्रह्माजी ने कहा- अमरत्व का वरदान देना संभव ही नहीं है. पृथ्वी मृत्यु लोक है. यहां जो आएगा उसे जाना ही पड़ेगा. यह नियम तो परमात्मा तक पर लागू है. कुछ और मांग लो.

रावण ने कहा- यह तो बताना संभव है कि मेरी मृत्यु किसके हाथों होगी, यही बताइए. ब्रह्माजी दुविधा में पड़ गए. कैसे बताया जाए, मृत्यु का कारण, वह समझाते रहे लेकिन रावण माना ही नहीं. कुछ और वरदान लेने को तैयार ही न था.

विवश होकर ब्रह्मा जी ने उसे बता ही दिया कि त्रेता युग में श्रीहरि राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम के रूप में अवतार लेंगे. उनके हाथों ही तुम्हारी मृत्यु लिखी गई है.

ज्ञानी होने के बावजूद रावण में अहंकार इतना आ गया कि उसने ब्रह्मा को ही चुनौती देने की ठान ली. उसने तय किया कि वह अपनी शक्तियों से ब्रह्मा का लिखा बदलकर रहेगा.

उसने श्रीराम का जन्म ही न हो, इसको ध्यान में रखकर कई प्रयास किए. उस समय अयोध्या में श्रीराम के परदादा राजा रघु शासन करते थे. रावण महाराज रघु के पास पहुंचा और उनको युद्ध के लिए ललकारा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रघु पुलस्त्यवंशी होने के कारण उसका सम्मान करते रहे. उन्होंने बहुत विनम्रता दिखाई और उसे प्रेम और सम्मान देकर युद्ध टालने की भरसक कोशिश की. रावण ने समझ लिया कि शायद रघु उससे भयभीत हैं.

उसने उनके राजा होने और क्षत्रिय होने को चुनौती दी. राज-पाट त्यागकर वन में जाकर रहने की बात करने लगा. आयोध्यावासियों का अपमान करने लगा कि उनका दुर्भाग्य है कि वह ऐसे कायर राजा से शासित हैं.

वह अपमान करने में सारी सीमाएं लांघ गया तो रघु युद्ध के लिए तैयार हो गए. उन्होंने युद्ध के लिए आतुर रावण को दंड देने के सिए विवश होकर रावण पर प्रयोग करने के लिए अमोघ शक्ति प्रयोग करने की ठानी.

रघु ने अमोघ बाण का धनुष पर संधान किया ही था कि तभी वहीं ब्रह्माजी प्रकट हो गए. उन्होंने रघु से कहा कि वह रावण के वध का विचार तत्काल त्याग दें क्योंकि विधि ने इसके अंत का विधान कुछ और ही तय कर रखा है.

ब्रह्माजी बोले- यह बाण निष्फल नहीं होता पर इसकी मौत आपके हाथ से नही लिखी है. रघु मान गए पर समस्या यह थी कि जो बाण रावण के अंत के संकल्प से साधा गया था वह वापस तरकस नहीं जा सकता. छूटेगा तो रावण का अंत ही हो जाएगा.

ब्रहमाजी ने कहा- यह अमोघ बाण आप मुझे दे. दो रावण की मौत इसी बाण से समय आने पर हो जाएगी. जिसके द्वारा इसका अंत होना है, उसके पास यह बाण मैं पहुंचा दूंगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.ब्रह्माजी ने रघु से वह बाण लिया और ले जाकर अगस्त्य मुनि को दे दिया. वनवास काल मे जब श्रीराम अगस्त्य मुनि के पास आए तो उन्होंने श्रीराम को वह बाण दिया जिससे रावण का वध हुआ.

रघु के आगे विवश होने के बाद भी रावण नहीं माना. रघु के बाद अज राजा बने. रावण महाराज अज के पास भी पहुंचा और उन्हें युद्ध के लिए ललकारा. उस समय महाराज अज संध्यापूजन कर रहे थे.

अज बोले- मेरे परम पराक्रमी पिताजी ने आपसे युद्ध नहीं किया. हम पुलस्त्यवंशियों का सम्मान करते हैं. मैं अपने पिता से विमुख कैसे हो सकता हूं. मैं अभी संध्या कर रहा हूं. आप युद्ध का विचार टाल दें.

अज समझाते रहे लेकिन हठी रावण किसी की सुनता कहां था. उसपर तो ब्रह्माजी का लिखा विधान बदलने की धुन सवार थी सो वह युद्ध के लिए अड़ा रहा. उसने कहा कि संध्यावंदन के बाद युद्ध करो, मैं प्रतीक्षा करूंगा.

विवश होकर अज मान गए. रावण वहीं प्रतीक्षा करने लगा. अचानक उसने देखा कि अज ने दो चावल के दाने अलग-अलग दिशा में फ़ेके. रावण बड़ा कर्मकांडी था. यह देख उसे आश्चर्य हुआ.

उसे भी मालूम था कि संध्या की इस विधि में चावल फ़ेंकने का विधान नही है तो उसने अज से पूछा कि ये चावल फ़ेकने विधान तो इस कर्म में नही है फिर आपने चावल क्यों फ़ेंके. आपकी पूजा खंडित हो गई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.महाराज अज ने कहा कि ये चावल के दाने मैंने अभिमंत्रित करके फ़ेके हैं क्योकि यहां से दस कोस दूर जंगल में एक गाय को शेर खाने वाला था. तो एक दाने से शेर को मारा और एक से गाय की रक्षा की.

रावण ने कहा- यह कैसे हो सकता है. मुझे विश्वास नहीं कि यहां बैठकर आपने शेर को चावल के दाने से मारकर गौ की रक्षा की है. तो अज ने कहा आप स्वयं जाकर देख लें और तसल्ली कर लें.

अज ने स्थान बता दिया. रावण बताये हुये स्थान पर पहुंचा तो सच में वहां शेर मरा हुआ पड़ा था और गाय घास खा रही थी.

रावण ने अज की यह चमत्कारिक शक्ति देखी तो वह बुरी तरह डर गया और पुन: कभी अज के पास ही नही गया.

रावण ने विधि का विधान बदलने की कई बार कोशिशें की थीं. ऐसा विभिन्न स्थानों पर आया है.

ये क्षेपक कथाएं हैं जो लोकप्रिय होती हैं. बेशक ये कथाएं मुख्य ग्रंथों में नहीं होतीं इसलिए इन्हें प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता पर इनकी रचना मुख्य कथाओं के समानांतर होती हैं जिनका उद्देश्य कथाओं को स्थापित करने में होता है.

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संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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