पापियों को सुख, पुण्यात्माओं को दुख, यह देख हुए हैरान! स्कंद पुराण में है इस दुविधा का निदान- जरूर पढ़ें

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंबहूदक नामक का एक तीर्थ था. यहां नन्दभद्र वैश्य रहते थे. धर्माचारी, सदाचारी पुरूष. उनकी साध्वी पत्नी का नाम कनका था. नंदभद्र चंद्रमौलि भगवान् शंकर के बड़े भक्त थे.
बहुदक में कपिलेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध शिवलिंग था. नंदभद्र तीनों समय कपिलेश्वर की पूजा किया करते थे. नंदभद्र कम से कम लाभ लेकर माल बेचा करते थे और ग्राहकों के साथ बराबरी और ईमानदारी का व्यवहार रखते.
गलत माल और बुरा सामान नहीं बेचते और जो कुछ मिल जाता उसी में संतुष्ट रहते थे. नंदभद्र का जीवन संन्यासियों जैसा था, सब नंदभद्र का सदाचारी, सम्पन्न, सुखमय जीवन की प्रशंसा करते.
नंदभद्र के पड़ोस में रहने वाला सत्यव्रत जो बड़ा ही नास्तिक एवं दुराचारी था, उनसे जलता था. सत्यव्रत चाहता था कि किसी प्रकार नंदभद्र का कोई दोष दिख जाए तो उसे धर्म के मार्ग से गिरा दूं.
नंदभद्र पर झूठे आरोप लगाना और सदा उनके दोष ही ढ़ूंढते रहना उसका स्वभाव बन गया था. दुर्भाग्यवश अचानक नंदभद्र का इकलौता पुत्र गम्भीर रूप से बीमार हो गया. नंदभद्र ने दुर्भाग्य मान शोक नहीं किया.
पुत्र के बाद उनकी पत्नी कनका भी गंभीर रूप से बीमार हो गयी. नंदभद्र पर विपतियां आयी देखकर उनके पड़ोसी सत्यव्रत को बड़ी खुशी हुई. उसने सोचा कि शायद नंदभद्र को धर्म से भटकाने का यही अवसर है.उसने नन्दभद्र को सांत्वना देने का ढोंग करते हुए कहा- तुम्हारे जैसे धर्मात्मा को यह दु:ख उठाना पड़ रहा है. लगता है कि धर्म कर्म सब ढकोसला है. कई बार सोचा कि मैं तुमसे कहूं पर संकोचवश कहा नहीं.
दिन में तीन बार पूजा, स्तुति सब व्यर्थ है. भैया नंदभद्र! धर्म के नाम पर क्यों इतना कष्ट उठाते हो? जब से तुम इस पत्थर-पूजन में लगे हो, तब से कोई अच्छा फल तो मिला नहीं इकलौता पुत्र और पत्नी दोनों बीमार हैं. भगवान् होते तो क्या ऐसा फल देते?
पुण्य और पाप सब कुछ कल्पना है. नंदभद्र! तुम्हें तो मेरी यही सलाह होगी की झूठे धर्म को छोड़ आनंदपूर्वक खाओ, पीओ और भोगो, यही सत्य है.
सत्यव्रत की बातों का नंददभद्र पर कोई प्रभाव न पड़ा. वह बोले-सत्यव्रतजी! आप अपने आप को ही धोखा दे रहे हैं. क्या पापियों पर दु:ख नहीं आते? क्या उनके पुत्र, स्त्री बीमार नहीं होते?
जब सज्जन दु:खी होता है, तो लोग सहानुभूति जताते हैं. पर दुराचारी के दुःख पर कोई सहानुभूति नहीं दिखाता. अत: धर्म पालन करने वाला ही ठीक है. अंधा सूर्य को नहीं जानता, पर सूर्य तो है. ईश्वर के बिना संसार का संचालन नहीं हो सकता.
सत्यव्रत ने उसे टोक कर पूछा- देवता हैं तो दिखायी क्यों नहीं देते? नंदभद्र ने कहा- देवता आपके पास आकर याचना नहीं करेंगे कि हमें आप मानिए. बातचीत बहस में बदलने लगी.नंदभद्र अधिक विवाद नहीं चाहते थे, उठकर चले गये. पर उनके मन में यह विचार आया कि भगवान् सदाशिव का साक्षात् दर्शन करके पूछूं- आप आपके बनाये संसार सुख-दु:ख, जन्म-मरण आदि क्लेश क्यों है? यह दोषरहित क्यों नहीं है.
नंदभद्र शिवमंदिर आये. कपिलेश्वर लिंग की पूजा भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे. सोच लिया कि जब तक भोलेनाथ दर्शन नहीं देंगे, तब तक मैं ऐसे ही खड़ा रहूँगा. लगातार तीन दिन और तीन रात नंदभद्र वैसे ही खड़े रहे.
चौथे दिन एक बालक उस मंदिर में आया. वह गलितकुष्ठ का रोगी भयानक पीड़ा से कराह रहा था. उसने नंदभद्र से पूछा- आप इतने सुंदर एवं स्वस्थ हैं, फिर भी आप दुःखी क्यों लग रहे है? नंदभद्र ने अपना संकल्प उसे बताया.
बालक ने कहा- अनचाहे का मिलना और मनचाहे का बिछुड़ना, इससे मानसिक कष्ट होता है. रोग और परिश्रम से शरीर को कष्ट होता है. मानसिक कष्ट से शारीरिक एवं शारीरिक कष्ट से मानसिक कष्ट होता है. औषधि से शारीरिक कष्ट दूर होते है एवं ज्ञान से मानसिक.
बालक से ज्ञान भरी बात सुनकर नंदभद्र ने फिर पूछा- बालक! पापी मनुष्य भी इतने धनी और सुखी क्यों होते हैं? भगवान की दुनिया में यह दोष क्यों?बालक ने कहा- संसार में चार प्रकार के लोग हैं. पहले वह हैं जिनके लिए इस लोक में तो सुख सुलभ है परंतु परलोक में नहीं. उनके पूर्वजन्मों के पुण्य शेष हैं, उसे वह इस लोक में भोग रहे हैं लेकिन नए पुण्य नहीं कमाते. ऐसे लोगों का सुखभोग केवल इसी लोक तक है.
दूसरे, जिसके लिए परलोक में सुख का भोग सुलभ है, परंतु इस लोक में नहीं क्योंकि पिछले जन्म के पुण्य खत्म हैं. वह तपस्या करके नए पुण्य कमाता है. उसे परलोक में सुख का भोग प्राप्त होगा.
तीसरा वह जिसके लिए इस लोक और परलोक में भी सुख भोग मिलता है क्योंकि उसका पहले का किया हुआ पुण्य भी विद्यमान है और तपस्या से नये पुण्य बना रहा है. ऐसे विरले ही होते है.
चौथा वह जिसके लिये न तो इहलोक में सुख है और न परलोक में ही क्योंकि पहले का पुण्य तो है नहीं और इस लोक में भी पुण्य कमा नहीं रहा. ऐसे नीच को धिक्कार है.
सो आपको इस जन्म में भगवान सदाशिव के भजन में लग जाना चाहिए जिससे आप जन्म के बंधन से ही मुक्त हो सकते हैं.एक छोटे बालक के मुख से ऐसी ज्ञानमयी और रहस्यपूर्ण बातें सुनकर नंदभद्र चकित हो पूछने लगे- आप कौन हैं और यहां कैसे पधारे है? आपने मेरे सब संदेहों को दूर कर दिया.
बालक ने कहा- पूर्वजन्म में मैं अहंकारी, पाखण्ड़ी, व्याभिचारी था. जिसके चलते मैं वर्षो से नीच योनियों में भटका. भगवान व्यासदेव की ऐसी कृपा कि वे हर योनि में मुझे मुक्तिमार्ग बता देते हैं. उन्होंने ही मुझे आपके पास भेजा है.
अब मैं सात दिन के बाद इसी तीर्थ में मरुंगा. आप मेरा अन्तिम संस्कार कर दीजिएगा. सूर्य मंत्र का जप करते हुए सातवें दिन उस बालक ने अपने प्राण त्याग दिए. नंदभद्र ने विधिपूर्वक उसका अन्तिम संस्कार किया.
नंदभद्र को जीवन की सचाई और सार्थकता का बोध हो गया था. शेष जीवन उन्होने भगवान् शिव और सूर्य की उपासना में लगा दिया तथा अन्त में जीवन मरण से मुक्ति पाकर भगवान शिव का साक्षात प्राप्त किया. (स्कन्दपुराण की कथा)
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