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श्रीहरि के सेवकों को मिला शाप, दैत्य बने और स्वयं हरि करें तेरा नाशः भागवत कथा में दिति के गर्भ से असुरों की उत्पत्ति की कथा

श्रीहरि के सेवकों को मिला शाप, दैत्य बने और स्वयं हरि करें तेरा नाशः भागवत कथा में दिति के गर्भ से असुरों की उत्पत्ति की कथा

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भागवत की कथा में इंद्र के प्रसंग के बाद, इंद्र के सौतेले भाइयों दैत्यों की उत्पत्ति का प्रसंग चल रहा है. कल की कथा में हमने पढ़ा कि किस पाप के कारण दिति के गर्भ में दैत्य आए. अब आगे…

दिति को पता था कि उनके गर्भ में स्थित शिशु नारायण के द्रोही होंगें और उनके अत्याचारों से समस्त संसार पीड़ित होकर त्राहि-त्राहि करेगा.

इसलिए दिति ने अपनी शक्तियों से गर्भ को 100 वर्षों तक बांधकर रखा. वह संतानों को उत्पन्न होने ही नहीं दे रही थीं. उनके गर्भ में पल रही आसुरी शक्तियों से संसार पीड़ित होने लगा.

सब ओर भयावह अंधेरा छा गया. देवता ब्रह्माजी के पास गए और संकट का कारण पूछा. ब्रह्मा ने बताया कि दिति के गर्भ में जुडवां बालक के रूप में नारायण के प्रमुख सेवक जय और विजय हैं. उनके कारण ही यह सब हो रहा है.

देवताओं को पता था कि दिति के गर्भ से पैदा होने वाली संतानें सबको त्रस्त करने वाली असुर होंगी. इसलिए उन्होंने ब्रह्मा से पूछा कि नारायण के सेवकों के भयंकर असुर होने का क्या कारण है?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

ब्रह्माजी ने देवताओं को जय-विजय को असुर होने के शाप की कथा सुनाई. एक बार चारों सनकादि ऋषि- सनक, सनातन, सनन्दन और सनतकुमार नारायण के दर्शन के लिए आए.

चारों सृष्टि के प्रथम पुत्र थे लेकिन उन्हें वरदान था कि वह हमेशा निश्छल रहेंगे. उनका स्वभाव पांच बरस के बालक जैसा ही रहेगा.

सभी देवताओं द्वारा पूजित सनतकुमारों या सनकादि को श्रीहरि का अंशावतार माना जाता है. वे बाल रूप में ही रहे और वस्त्र भी न पहनते थे.

बैकुण्ठ के छह द्वारों पर तो उन्हें किसी ने भी नहीं रोका लेकिन सातवें द्वार पर तैनात श्रीहरि के प्रिय पार्षद जय-विजय ने उन्हें प्रभु के दर्शन से रोक लिया.

जय-विजय ने सनकादि से कहा- श्रीहरि अभी माता लक्ष्मी के साथ एकांत में हैं. अभी हम आपको भीतर जाने की अनमुति नहीं दे सकते.

सनकादि ने जय विजय को अपना परिचय दिया फिर भी वे नहीं माने. उन्होंने जय-विजय को समझाने की तीन बार कोशिश की लेकिन वे सुनने को राजी न थे.

ऋषि कुमार क्रोधित हो गए. उन्होंने जय-विजय से कहा कि तुम श्रीहरि के सान्निध्य में रहने के योग्य नहीं हो. इतने वर्ष तक प्रभुसेवा से भी तुम्हें बुद्धि नहीं हुई.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

तुम्हें नारायण का प्रिय सेवक होने का अहंकार है. तुमने हमें मृत्युलोक का वासी समझकर रोका इसलिए तुम तीन बार मृत्युलोक में जन्म लोगे और नारायण के लिए शत्रुभाव रखोगे.

ऋषियों के शाप से जय और विजय दुखी हुए. वह उनसे क्षमा मांगते हुए नारायण के ह्रदय से दूर न करने की विनती करने लगे. कोलाहल सुनकर नारायण वहां आए.

नारायण ने कहा- ऋषिकुमारों का शाप व्यर्थ नहीं जा सकता. उस शाप को मैं स्वीकार करता हूं. मैं भी तीन बार अवतार लेकर इनका वध करके शापमुक्त करूंगा. फिर ये मेरी सेवा में तैनात होंगे.

ऋषि कुमारों ने भी नारायण से अपने क्रोध और उसके कारण हुई पीड़ा के लिए क्षमा मांगी और प्रभु की स्तुति करके लौट गए.

ब्रह्मा बोले- दिति के गर्भ में ये जय और विजय आए हैं. ये विष्णु द्रोही होंगे और इन्हें मारने के लिए स्वयं नारायण को आना होगा.

दिति अपने गर्भ को और न बांध सकीं. उनके शरीर से दो असुर हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष निकले जो जन्म लेते ही पर्वत के समान विशालकाय हो गए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

कश्यप के वचन के अनुसार हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद नारायण भक्त हुए जिनके कष्टों का निवारण करने के लिए श्रीहरि ने नरसिंह अवतार लिया.

कल भागवत कथा में हिरण्यकश्यपु और नरसिंह अवतार की विस्तार से चर्चा करेंगे.

अनुरोधः जो लोभ भी यह भागवत कथा पढ़ रहे हों, उनसे हाथ जोड़कर लगातार विनती कर रहा हूं. पहली तो आप तुरंत अपना एप्प अपडेट कर लें. पुराने वर्जन में हम गीता, मंत्र-संसार आदि सेक्शन इसी शनिवार से बंद करने वाले हैं.

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धर्म का कार्य है यह. भागवत सुनना और सुनाना दोनों बराबर पुण्य का है. भागवत के पहले स्कंध में धुंधली की कथा से पूर्व नारदजी ने यह उपदेश दिया है.

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संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्