यदि आशंका हो कि किसी पितर को मिली होगी नर्क, इस व्रत से दिलाएं मुक्ति
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इस व्रत की महिमा और विधि का वर्णन देवर्षि नारद ने किया है. हम पहले आपको व्रत की कथा सुनाते हैं फिर व्रत की वह विधि भी बताएंगेजो नारदजी ने राजा इंद्रसेन को कही थी.
इंदिरा एकादशी व्रत कथाः-
सतयुग के समय की बात हैं इंद्रसेन नामक राजा हुआ करते थे. राजा भगवान विष्णु के प्रचंड भक्त थे. यज्ञ एवम उपवास के सभी धार्मिक कार्य पूरी श्रद्दा से करते थे.
उनके नगर में भी इन नियमों का पालन होता था. नगर में सुख शांति एवम उन्नति का कारण शायद सभी का धार्मिक एवम् कर्मठ होना ही था. इस कारण इंद्रसेन बहुत खुश थे.
एक दिन आकाश विचरण करते नारद मुनि ने इंद्रसेन के दरबार में प्रवेश किया. उन्हें आता देख इंद्रसेन राजा अपने स्थान से उठ खड़े हुए और पूरे आदर के साथ उन्होंने नारद जी को आसन प्रदान किया.
देवर्षि के चरणों को धोकर उनकी विधिवत पूजा की. स्तुति आदि के उपरांत उन्हें उत्तम भोग प्रदान किया और सारी स्वयं राजा और रानी स्वयं करते रहे, सेवकों और दासों को नहीं सौंपा.
राजा द्वारा इस प्रकार मिले पूजा-सम्मान से नारद मुनि बहुत प्रसन्न हुए. कुछ देर बाद नारद मुनि ने राजा से पूछा कि आपके जीवन एवम् राज्य में सब सकुशल तो हैं?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजा इन्द्रसेन ने कहा- हे देवर्षि आपसे क्या छिपा है. भगवान विष्णु की कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल-मंगल है. प्रजा भी प्रसन्न है तो मैं अत्यंत प्रसन्न हूं,
नारद मुनि ने फिर से पूछा- हे राजा इंद्रसेन आपके राज्य में धार्मिक सत्संग एवं यज्ञ आदि के कार्य भी नियमित हो रहे हैं या नहीं?
राजा ने बताया- सभी धार्मिक अनुष्ठान यहां नियमपूर्वक किए जाते हैं. राजपरिवार के साथ-साथ प्रजा भी धर्मनिष्ठ है.
नारदजी संतुष्य थे. संतुष्ट देखकर इन्द्रसेन ने नारद मुनि से उनके दरबार में पधारने का कारण पूछा.
तब नारद मुनि ने कहा- राजन! मैं यमलोक गया था. वहां मैंने तुम्हारे पिताजी को देखा. वह बेहद दुखी थे. उन्होंने तुम्हारे लिए संदेशा भेजा है. मैं उनका संदेश लेकर तुम्हारे पास आया हूं.
इंद्रसेन को बड़ा आश्चर्य हुआ. उन्होंने पितरों का हाल-समाचार पूछा तो नारद बताने लगे.
नारदजी बोले- मृत्यु के उपरांत तुम्हारे पिता को मोक्ष की प्राप्ति नहीं हुई हैं इसलिए वह चाहते हैं तुम उनके लिए कुछ करो. उन्होंने बताया कि उनके पूर्व जन्म में उन से एकादशी का व्रत भंग हुआ था. इसके कारण ही उन्हें मोक्ष नहीं मिला है. तुम इसका निदान करो.
राजा इन्द्रसेन ने नारद मुनि से पूछा- हे मुनिवर मैं ऐसा कौन सा प्रयत्न करूं जिससे मेरे दिवंगत पिता को सुख-शांति और मोक्ष प्राप्त हो. मैं सब कुछ करने को तैयार हूं. आप कहें मुझे क्या करना होगा?हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तब नारद मुनि ने कहा- श्राद्ध पक्ष में ही पितरों को मोक्ष मिलता है इसलिए तुम श्राद्ध पक्ष की एकादशी का व्रत करो. इस व्रत को करने से तुम्हारी कई पुश्तों को मोक्ष की प्राप्ति होगी.
राजा इन्द्रसेन ने नारदजी से व्रत का विधि विधान पूछा.
नारदजी ने राजा को इस एकादशी की पूरी विधि बतलाई. राजा ने उस विधि से एकादशी की व्रत-पूजा की तो उसके पिता दोषमुक्त हुए और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई. धर्मराज ने उन्हें स्वर्ग भेज दिया.
नारदजी ने जो विधि बताई थी, संक्षेप में वह इस प्रकार से है-
यह व्रत आश्विन कृष्ण पक्ष की दशमी से ही शुरू हो जाता है. दशमी के दिन प्रातः स्नान कर घर में पूजा पाठ करें.
एकादशी के दिन सुबह स्नान करें एवम् पूरे दिन के निराहार व्रत का संकल्प लें. व्रत के संकल्प की विधि वही होती है जो अन्य संकल्पों में होती है. एप्प में इसका वर्णन है.
फिर विधिवत श्राद्ध तर्पण करें एवं ब्राह्मणों को फलाहार करायें.
इसके बाद गाय, कौए एवं कुत्ते को आहार का एक हिस्सा दें.
स्वयं यदि फलाहार करना है तो वह रात्रि में ही करें, दिन में नहीं.
दिन में शालिग्रामजी का पूजन करें. यदि शालिग्रामजी नहीं है तो भगवान विष्णु, श्रीराम, श्रीकृष्ण की छवि का पूजन करें
विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ अवश्य करें.
दूसरे दिन पूजा करके ब्राहमणों को भोजन कराएं एवं दक्षिणा दें. पूरे कुटुंब के साथ भोजन ग्रहण करें.
इस इंदिरा एकादशी के प्रताप से राजा इंद्रसेन को भी वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति हुई.
जिनके पितर नर्क के भागी बने हों उनके निमित्त इस व्रत को करने से उन्हें मुक्ति मिलती है. नर्क का भागी मनुष्य अपने कर्मों के कारण बनता है अतः किसी के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि उनके किस पितर की क्या संभावित गति रही होगी.
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