इंद्र ने डाला विघ्न पर अग्नि ने दे दिया दंभ को देवताओं को हराने वाले पुत्र का वरदानः महिषासुर की जन्मकथा

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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंदैत्यराज दनु के रम्भ और करम्भ नामक दो शक्तिशाली पुत्र थे. रम्भ और करम्भ दोनों का विवाह हो चुका था लेकिन उनके कोई संतान न थी. दोनों संतानहीन थे तो वंश खत्म होने का संकट आ गया.
दोनों ने संतान प्राप्ति के लिए तप करना आरंभ किया. दोनों कठोर तप करने लगे. करम्भ जल के अंदर समाकर तप करने लगा तो रम्भ ने एक वृक्ष के नीचे अग्नि जलाई और साधना करने लगा.
इंद्र को इस तप के बारे में पता चला तो चिंतित हो गए. उन दैत्यों की तपस्या भंग करने के लिए देवराज इंद्र करम्भ के सामने प्रकट हुए. उसने उन्हें नहीं देखा तो इंद्र ने एक मगरमच्छ का रूप धरा.
मगरमच्छ रूपी इंद्र ने करम्भ के पैर पकड़ लिए औऱ दोनों में घोर युद्ध होने लगा. करम्भ हार गया और अंततः उसने हिम्मत छोड़ दी. मगरमच्छ ने उसे खा लिया. भाई की मृत्यु से रंभ दुखी था.उसकी तपस्या भी सिद्ध नहीं हो रही थी और भाई भी उसने खो दिया. वह निराश हो गया और उसने अग्नि में ही अपना सिर काटकर सौंप देने का निर्णय किया. रम्भ ने अपनी तलवार निकाल ली.
वह अपना सिर काटकर अग्नि में डालने ही वाला था कि अग्निदेव प्रकट हो गए. उन्होंने रम्भ से कहा- यह कैसी मूर्खता करने जा रहे हो? आत्महत्या से बड़ा कोई नीच कर्म नहीं होता. इस कर्म के कारण कई जन्मों में दुख भोगना पडता है.
रम्भ ने कहा- मैं जानता हूं कि आत्महत्या के कारण कई जन्मों तक मुझे नीच योनि भोगनी पड़ेगी किंतु मैं निराश हूं. अग्निदेव ने कहा- तुम्हारा तप पूर्ण हो चुका था. तुममें धैर्य का अभाव है. खैर, मांगो क्या मांगते हो?
हे देव आप प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसे महाबली पुत्र का वरदान दीजिए जो तीनों लोक को जीतने वाला हो. मुझे ऐसा पुत्र चाहिए जिसके सामने शत्रुओं की सेना टिक न सके. देव, दानव, गंधर्व, मानव कोई उसे पराजित न कर सके.अग्निदेव ने उसे अभीष्ट वरदान दे दिया. रम्भ प्रसन्न होकर अपने महल लौटा. रम्भ महिषी नामक एक असुर कन्या पर मोहित हो गया. उसका शरीर भैंस का था. रम्भ ने महिषी से विवाह कर लिया.
महिषी गर्भवती हुई. एक बार महिषकुल का एक अन्य असुर महिषी पर मोहित हो गया. असुरों में अपहरण कर विवाह करना मान्य होता है. उस असुर ने महिषी का अपहरण कर लिया.
रम्भ ने उस महिष कुल के असुर को युद्ध के लिए ललकारा. दोनों में भयंकर युद्ध हुआ. अंत में रम्भ उस महिष दैत्य के सींगों के गहरे प्रहारों से मारा गया. महिषी अपनी रक्षा के लिए यक्षों की शरण में चली गई.
यक्षों ने शरणागत नारी की रक्षा का निश्चय किया. उन्होंने अपनी संपूर्ण शक्तियां एकत्र कीं और महिष दैत्य पर एक बार में असंख्य विषैले बाणों का प्रहार किया. बाण उसके शरीर के प्रत्येक रोम में धंसे और वह मर गया.रम्भ का शव चिता पर रखा गया तो महिषी उसके साथ सती होने के लिए तैयार हो गई. वह भी चिता पर बैठ गई. अग्निदेव ने रम्भ को पुत्र का वरदान दिया था इसलिए वह उसे कैसे जलाते.
उसी समय महिषी के गर्भ से असुर का जन्म हुआ जिसका नाम पड़ा महिषासुर. पुत्र की रक्षा के लिए प्राण देने वाले रम्भ को भी नया शरीर मिला और वह रक्तबीज के रूप में चिता से निकला.
इस प्रकार महिषासुर और रक्तबीज की उत्पत्ति हुई. महिषासुर बाद में असुरों का राजा बना और रक्तबीज सेनापति.
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