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रात के अंधेरे में पाप पुण्य को ठेंगा दिखाते आगे के दरवाजे पर पहुंचे. पाप हरने के प्रयासों का संकल्प लिया और मदिरा की कई प्यालियां चढ़ा लीं. अब वह तीन प्रकार के नशे में थे. धन काफी था साथ में तो उन्हें धन का नशा हो चुका था. हिरण का मांस खाकर आए थे तो मांसाहार का नशा भी था. अब तो पाप को बढ़ाने वाली मदिरा भी आ चुकी थी.
कंचन के बाद कुछ का, सुरा के बाद सुन्दरी का, ध्यान आना स्वाभाविक है. फिर पाप पुण्य के विचारों का संघर्ष शुरू हुआ.
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वेश्या ने रमण का न्योता दिया था. पंडितजी सोचने लगे कामपीड़िता का रति निमंत्रण ठुकराना पाप है. अब दिमाग मदिरा चढ़ गई थी सो यह भूल गए कि किन परिस्थितियों में रतिनिमंत्रण ठुकराना नहीं चाहिए. पाप पुण्य के मापदंड अपने वाले गढ़ लिए, शास्त्र तो पीछे छूट गया.
फिर ध्यान आया कि वेश्यागमन भी शास्त्रों में पाप कहा गया है. क्या करें? तीन प्रकार के नशे में धुत थे. सोचा कि जैसे इतने पाप हुए वैसे एक पाप और सही. सभी पाप का निवारण इक्ठठे ही कर लूंगा. पहले दरवाजे पर पहुंचे और वेश्या के यहां जा विराजे. वेश्या ने उन्हें संतुष्ट किया और उसके बदले जुए में जीता सारा धन ले लिया.
एक पूरा दिन चारों द्वारों पर व्यतीत करके दूसरे दिन प्रातःकाल ब्राह्मण महोदय उठे. वेश्या ने उन्हें घृणा के साथ देखा. कंगले का किसी वेश्या के यहां क्या काम. नौकरों को बुलवाकर घर से बाहर फिंकवा दिया.
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इधर राजा को सारी सूचना पहुंच चुकी थी. ब्राह्मण फिर चारों दरवाजों पर गया. इस बार उसने हर द्वार पर खुद ही कहा कि मैं शर्तें मानने को तैयार हूं, मुझे अंदर आने दो. पर आज वहां का नियम बदला हुआ था. शर्तों के साथ भी कोई अंदर जाने देने को राजी न हुआ. सब जगह से उन्हें दुत्कार दिया गया.
वह महल के प्रवेशद्वार के बाहर बैठा सोच रहा था- राजा से धन तो न मिला, हाथ का एक रुपया भी गया.
ब्राह्मण को न माया मिली न राम. “जरा सा” पाप करने में कोई बड़ी हानि नहीं है, यही समझने की भूल में उसने धर्म और धन दोनों गंवा दिए.
अपने ऊपर विचार करें कहीं ऐसी ही गलतियां हम भी तो नहीं कर रहे हैं. किसी पाप को छोटा समझकर उसमें एक बार फंस जाने से फिर छुटकारा पाना कठिन होता है. जैसे ही हम बस एक कदम नीचे की ओर गिरने के लिए बढ़ा देते हैं फिर पतन का प्रवाह तीव्र होता जाता है. अन्त में बड़े से बड़े पापों के करने में भी हिचक नहीं होती.
हर पाप के लिए हम खोखले तर्क भी तैयार कर लेते हैं पर याद रखें जो खोखला है वह खोखला है. छोटे पापों से भी वैसे ही बचना चाहिए जैसे अग्नि की छोटी चिंगारी से सावधान रहते है. सम्राटों के सम्राट परमात्मा के दरबार में पहुंचकर अनन्त रूपी धन की याचना करने के लिए जीव रूपी ब्राह्मण जाता है.
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प्रवेश द्वार काम, क्रोध लोभ, मोह के चार पहरेदार बैठे हुए हैं. वे जीव को तरह-तरह से बहकाते हैं और अपनी ओर आकर्षित करते हैं. यदि जीव उनमें फंस गया तो पूर्व पुण्यों रूपी गांठ की कमाई भी उसी तरह दे बैठता है जैसे कि ब्राह्मण अपने घर का एक रुपया भी दे बैठा था.
जीवन इन्हीं पाप जंजालों में व्यतीत हो जाता है और अन्त में वेश्या रूपी ममता के द्वार से दुत्कारा जाकर रोता पीटता इस संसार से विदा होता है. रखना कही आप भी उस ब्राह्मण की नकल तो नहीं कर रहे हैं.
कोई भी व्यक्ति दो के समक्ष कुछ नहीं छुपा सकता. एक तो वह स्वयं और दूसरा ईश्वर. आपकी अंतरात्मा आपको कई बार हल्का सा ही सही एक संकेत देती जाती है कि आप जो कर रहे हैं वह उचित नहीं है परंतु लालच में फंसे हम अंतरात्मा की उस आवाज को दबाते जाते हैं. अंतरात्मा की आवाज धीरे-धीरे धीमी होती जाती है. एक दिन ऐसा भी होता है कि आपकी अंतरात्मा आपको टोकना भी बंद कर देती है. बस समझ लीजिए कि उस दिन से आप पूर्णरूप से पापी बन चुके हैं.
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क्या पाप करने वाले पापी सचमुच फलते-फूलते हैं?
बहुत से लोग कहते हैं कि इस संसार में पापी ही फूलते हैं. यह उनका वहम है. उन पापियों के पूर्वजन्म के कुछ ऐसे पुण्य होते हैं जिनके प्रताप से उन्हें छोटी-छोटी सफलता मिलती रहती है. आप ऐसे समझ लें कि वे अपने बैंकबैलेंस में से खा रहे हैं. अगर उन्होंने अपने कर्म अच्छे रखे होते तो उस बैंक बैंलेस में वृद्धि करके वह संसार के स्वामी बन सकते थे पर वह तो उसे नष्ट करते जा रहे हैं.
हर जीव अपने कर्म के लिए उत्तरदायी होता है. उसे अपना कर्म अच्छा रखना है. आपको चारों द्वारों पर बैठे चार मायावी तो बहकाने आएंगे ही. आपने उनकी माया को जीत लिया तो अनंत कोष आपके लिए खुला है, अन्यथा संसार से विदा नहीं होंगे, दुत्कार कर भगाए जाएंगे.
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सत्य वचन प्रभु जी
सर्वोत्तम विचार साधुवाद