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बोपदेव को लगा उनकी समस्या का समाधान मिल गया. सीधे गुरूजी के पास पहुंचे और तन मन से पढाई में लग गए. बोपदेव ने कई ग्रन्थ लिखे और उनकी पण्डिताई का डंका बजने लगा.
अब बोपदेव वेद-वेदांग में परांगत कृष्णभक्त के रूप में प्रसिद्ध होने लगे. वह वृदांवन-तीर्थ पहुंचे और वृंदावन के कण-कण में श्रीकृष्ण को देखने लगे. इस भाव से प्रभु प्रसन्न हो गए.
श्रीकृष्ण ने उनके ह्रदय में भागवत कथा का उदय कराया. यह वही कथा थी जो श्रीशुकदेवजी ने राजा परीक्षित को सुनाई थी लेकिन बोपदेव को इसका विस्तृत ज्ञान नहीं था. बोपदेव उस कथा को हरि-लीलामृत नाम से फिर से सुनाने लगे.
भक्त की भक्ति से मुग्ध भगवान श्रीकृष्ण इस बार साक्षात प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा. बोपदेव ने कहा- प्रभु भागवत ज्ञान तो आपने मुझे प्रदान किया, यदि वर देना चाहते हैं तो उस भागवत का माहात्म्य मुझसे कहें.
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